वृक्ष, ब्रम्हांड की विषाक्तता हरने वाले “नीलकंठ महादेव”

11885177_1039654086067633_8990185467728203168_n

वृक्ष, ब्रम्हांड की विषाक्तता हरने वाले “नीलकंठ महादेव”
भारतीय संस्कृति में वृक्षारोपण का विशिष्ट स्थान है। कोई भी ऐसा वृक्ष नहीं जिसका उपयोग आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित न हो। वृक्ष जीव-मात्र के उपकारी हैं और सर्वपूज्य भी हैं। सनातन भारतीय संस्कृति की सर्व प्रथम पुस्तक ऋग्वेद है, जिसमें किसी भी मंगल-कृत्य के समय वृक्ष के कोमल पत्तों का स्मरण किया गया है, ऋचा इस प्रकार है-‘काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परूषः परूषस्परि’ (यजुर्वेद 13/20)। इसी प्रकरण में ईश्वर की महिमा भी कही गई है-‘अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता’ (ऋग्वेद 10/97/5)। ऋगवेद में प्रजा के कल्याण के लिए वनस्पति मात्र की स्तुति की गई है-‘शिवो भव प्रजाभ्यो मानुषीभ्यस्त्वमगिंरः’(यजुर्वेद 11/45)। शमी वृक्ष समस्त अमंगलों का नाशक माना गया है तथा दुःस्वप्नों का नाशक भी- ‘अमंगलानां शमनी दुःस्वप्ननाशिनी (गोपथ-ब्राह्मण)।
वेदों में वृक्षों की महिमा एवं उनका स्पर्श का महात्म्य, स्मृतियों में वृक्ष लगाने का महात्म्य व वृक्ष नष्ट करने वाले के लिए दण्ड-विधान भी लिखा है। वृक्षों को समूह रूप से रक्षित कर बगीचों का रूप देने का पहला वर्णन स्मृतियों में ही मिलता है। अठारह पुराण, छः शाश्त्रो में वृक्षों की विभिन्न गाथाएँ उपलव्ध होती हैं। वृक्षों को भी जीव मानकर मानव-सृष्टि द्वारा उनकी उत्पत्ति का वर्णन पुराणों की प्रथम गवेषणा है। धरती में इनका जो स्थान है, उससे भी बढ़कर देवताओं के धाम में भी है, नन्दनवन, पुष्पकवन इसके उदाहरण हैं।
दक्ष प्रजापति की साठ में से तेरह कन्याएँ कश्यप ऋषि की पत्नी बनीं। उनमें से अदिति से देवता, दिति से दैत्य, दनु से दानव, सुरसा से सर्प तथा इला से भूरूह (वृक्ष) पैदा हुए-‘इलाया भूरूहाः सर्वे’ (श्रीमद्भागवत 6/6/28)। अतः एक वृक्ष एक संतान के समान माना जाता है। मत्स्य पुराण (154/512) में लिखा है-‘एक वृक्ष दस पुत्र उत्पन्न करने के बराबर है- ‘दसकुपसमा वापी दसवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो दश पुत्रसमो द्रुमः।’ दश कूप निर्माण करवाने का पुण्य एक वापी के बनवाने से प्राप्त होता है तथा दस बावडीयांँ बनवाने का पुण्य एक तालाब बनवाने से और एक पुत्र का जन्म दस तालाबों के तुल्य तथा एक वृक्ष दस पुत्रों के तुल्य है। मनु जी का कथन है कि ‘पुत्रवान लभते स्वर्गमं’ अर्थात ‘संतानवान को स्वर्ग मिलता है’ और असंतानवान को अशुभ गति (‘नापुत्रस्य गतिर्शुभा’)। यह वाक्य पितरों की तृप्ति या मानव-जीवन की सार्थकता के महात्म्य का बोधक है। अतः सात संतानों का उल्लेख प्राप्त होता है- कूपस्तडागमुद्यानं मण्डपं च प्रपा तथा। जलदानमन्नदानमश्वत्थारोपणं तथा। पुत्रश्चेति च संतानं सप्त वेदविदो विदुः।(स्क.पु.)
कुआँ, तालाब, बगीचा, आराम-भवन, प्याऊ, जल और अन्नदान तथा पीपल के वृक्ष का लगाना-ये सात संतान कहलाती हैं। पीपल के वृक्ष को लगाने वाला हजारों वर्ष तक तपोलोक में निवास करता है- अश्वस्थवृक्षमारोप्य प्रतिष्ठां च करोति यः। स याति तपसो लोकं वर्षाणामयुतं परम्। (ब्र.वै.पु.) इसी प्रकार स्कन्द पुराण में कहा गया है कि इस वृक्ष के लगाने वाला सर्वदेव पूजन के पुण्य का अधिकारी होता है। संतान प्राप्ति के लिए आँवले का पूजन अमोघ साधन है। इतना ही नहीं तो वृक्षारोपण सम्बन्धी पुराणों में अनेक राजाओं की कथाएँ हैं तथा भगवान कृष्ण ने स्वयं वृक्षों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की तथा इन्हें सब प्राणियों का उपजीव्य बताया।
अतः वृक्ष लगाना तीर्थ, व्रत, उपवास से कम नहीं, वहीं वृक्षों को काटना बहुत बड़ा पाप है, क्योंकि शास्त्रों में इन्हें जीव की संज्ञा दी है। स्मृतियों के अनुसार ‘‘हरे वृक्षों का सर्वनाश करना, अपने कुलनाश के समान है।
वृक्षारोपण काल- हस्त, पुष्य, अश्वनी, विशाखा, उत्तरा, चित्रा, अनुराधा आदि सभी नक्षत्र वृक्षारोपण के लिए श्रेष्ठ हैं। शुभ् तिथि, वार में पूजन कर निम्न मन्त्र से वृक्ष की स्थापना करें- ‘‘ऊँ वसुधेति च शीतेति पुण्यदेति धरेति च। नमस्ते सुभगे देवि द्रुमोऽयं त्वयि रोपते।।’’
एक व्यक्ति को अपनी ऑक्सीजन जरूरतों को पूरा करने के लिए 650 वर्ग मीटर हरी भरी जगह की जरूरत होती है . वृक्ष पृथ्वी पर रहने वाले सबसे बड़े और सबसे ज्यादा उम्र वाले प्राणी हैं | केलिफोर्निया में स्थित दुनिया के सबसे बड़े वृक्ष लगभग तीन हज़ार साल से भी ज्यादा आयु के हैं और उनको काटने में आदमी को सिर्फ तीन घंटे का समय चाहिए | अगर उस एक वृक्ष को काट दिया जाए तो हज़ारो नए लगाए गए पेड उसकी जगह नहीं ले सकते .
कार्बन डाइ ऑकसाइड ही वो गैस है जो धरती के तापमान को बढ़ा कर सबके लिए एक मुसीबत बनी हुई है. साल के 365 दिन चौबीस घंटे वृक्ष चुपचाप स्रष्टि की निस्वार्थ सेवा में लगे रहते हैं, फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया में नुकसानदायक कार्बन डाइ ऑकसाइड को सोखते हैं और करोडों रुपयों की जीवन दायिनी ऑक्सीजन को बाहर निकालते हैं, इसलिए वृक्ष को ब्रम्हांड की विषाक्तता हरने वाले “महादेव नीलकंठ” की उपमा दी जाती हे .
मानव वृक्षों के बिना नहीं जी सकता जबकि वृक्ष मानव के बिना मजे से जी सकते हैं .यह एक बड़ा कारण है कि हम जानें कि भगवान ने जो खूबसूरत दुनिया बनायीं है और जिसको हमारे हवाले कर दिया है उसको हम अपने लालच और लापरवाही से खराब न करें |
हर वर्ष एक पोधा अवश्य लगाये और जीवन का क़र्ज़ चुकाए !!