योग एक आध्यात्मिक प्रकिया

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मंत्रयोगों हष्ष्चैव लययोग स्तृतीयकः, चतुर्थो राजयोगः (शिवसंहिता) योग एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम योग होता है !
महर्षि पंतजलि ने योगदर्शन में कहा ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’, योग शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। स्वामी विवेकानंद इस सूत्र को अनुवाद करते हुए कहते है,”योग बुद्धि (चित्त) को विभिन्न रूपों (वृत्ति) लेने से अवरुद्ध करता है, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ‘योग: कर्मसु कौशलम्‌’ कर्मो में कुशलता को योग कहते हैं।
अष्टांग योग” हे
यम (पांच “परिहार”): अहिंसा, झूठ नहीं बोलना, गैर लोभ, गैर विषयासक्ति और गैर स्वामिगत.
नियम (पांच “धार्मिक क्रिया”): पवित्रता, संतुष्टि, तपस्या, अध्ययन और भगवान को आत्मसमर्पण.
आसन:मूलार्थक अर्थ “बैठने का आसन” और पतांजलि सूत्र में ध्यान
प्राणायाम (“सांस को स्थगित रखना”): प्राणा, सांस, “अयामा “, को नियंत्रित करना या बंद करना. साथ ही जीवन शक्ति को नियंत्रण करने की व्याख्या की गयी है।
प्रत्यहार (“अमूर्त”):बाहरी वस्तुओं से भावना अंगों के प्रत्याहार.
धारणा (“एकाग्रता”): एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना.
ध्यान (“ध्यान”):ध्यान की वस्तु की प्रकृति गहन चिंतन.
समाधि(“विमुक्ति”):ध्यान के वस्तु को चैतन्य के साथ विलय करना। इसके दो प्रकार है – सविकल्प और अविकल्प। अविकल्प समाधि में संसार में वापस आने का कोई मार्ग या व्यवस्था नहीं होती। यह योग पद्धति की चरम अवस्था है।
सांख्य दर्शन के अनुसार – पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।
विष्णुपुराण के अनुसार – योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने। अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।
भगवद्गीता के अनुसार – सिद्दध्यसिद्दध्यो समोभूत्वा समत्वंयोग उच्चते ।अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है।
भगवद्गीता के अनुसार – तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्। अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल योग है।
आचार्य हरिभद्र के अनुसार – मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो। मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग है।
बौद्ध धर्म के अनुसार – कुशल चितैकग्गता योगः। अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।
जैन तत्त्वार्थसूत्र, के अनुसार मन, वाणी और शरीर सभी गतिविधियों का कुल योग है !
अन्तराष्ट्रीय योग दिवस पर शुभकामनाये