दुनिया के सबसे ऊंचे दुर्गम और निर्मम युद्धक्षेत्र सियाचिन पर भारतीय सेना की मोजुदगी कितनी जटिल और चुनोतिपूर्ण

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यह काराकोरम के पांच बडे हिमनदों में सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हिमनद है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई इसके स्रोत्र इंदिरा कोल पर लगभग 5753 मीटर और अंतिम छोर पर 3620 मीटर है। यह लगभग 70 किमी लम्बा है।
निकटवर्ती क्षेत्र बाल्टिस्तान की बोली बाल्टी में “सिया” का अर्थ है एक प्रकार का “जंगली गुलाब” और “चुन” का अर्थ है “बहुतायत”, इसी से यह नाम प्रचलित हुआ।
सामरिक रुप से यह भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यह विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है। इस पर सेनाएँ तैनात रखना दोनों ही देशों के लिए अत्यधिक महंगा साबित होता रहा है।
सूत्रों का कहना है कि सियाचिन में भारत के 10 हजार से अधिक सैनिक तैनात हैं और इनके रखरखाव पर प्रतिदिन 5 करोड़ रुपये का खर्च आता है।
यहां तापमान शून्य से 55 डिग्री सेल्सियस (- 55 डिग्री सेल्सियस) से भी नीचे चला जाता है. यहां जितने सैनिक गोलियों से नहीं मरते उससे कहीं अधिक हिमस्खलन और आवागमन की दुष्कर परिस्थिति के कारण शहीद हो जाते हैं.
कई सैनिक अकेलेपन के कारण अवसाद का शिकार हो जाते हैं. इस युद्ध क्षेत्र को याद करते हुए एक सैनिक ने कहा था, ‘मुझे कौए पसंद हैं, क्योंकि हमारे अलावा वे ही एकमात्र जीवित प्राणी होते हैं, जिन्हें हम यहां देख सकते हैं. भीषण ठंड के मौसम में जब वे चले जाते हैं तो उस दौरान के अकेलेपन को मैं बयां नहीं कर सकता. यह बहुत ही भयावह जगह है, जहां हमारे अलावा न कोई दूसरा आदमी है और न कोई अन्य साधन. यह सीमाओं की रक्षा की जंग नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और खुद को जीवित बचाए रखने की जंग है.
वर्ष 1984 से ही दुनिया के इस सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र पर दोनों देशों की सेनाएं जमी हुई हैं। हालांकि वर्ष 2003 में युद्ध विराम लागू होने के बाद से यहां बंदूकें शांत हैं, लेकिन ग्लेशियर पर प्रतिकूल मौसम ने दोनों पक्षों के सेंकडो लोगों की जान ली है।