चीन हे सर्वदा से भारत का सबसे बड़ा शत्रु

वस्तुतः चीन कभी नहीं चाहता कि भारत आर्थिक सामरिक सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर उस के समकक्ष कभी भी आ पाए, चीन अच्छी तरह समझता है कि एशिया में केवल 125 करोड़ मानवशक्ति व् प्रचूर खनिज कृषि संसाधन से युक्त भारत में ही उसे चुनोती देने का सामर्थ्य हो सकता है.

अन्तराष्ट्रिय प्रबंधन और प्रोधोगिकी के व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा स्तर में हमेशा भारतीयों ने चीनियो को पछाड़ा हे, इससे उसे अपनी भविष्य की बादशाहत खतरे में लगती है, चीन की शक्ति से अमेरिका योरोप और रूस भी चिंतित हो भारत को तटस्थ बन, संतुलित तौर पर उठाना चाहते है, चीन यह अच्छी तरह समझता है, इसलिए वो भी एक तरफ भारत को प्रोधोगिकी में मदद का दिखावा कर, खनिजो रॉ मटेरियल का ओने पौने दाम पर भारत से आयात कर,भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार पर अपना घटिया सस्ता माल को निर्यात कर , देश के मूल उत्पादन को लगभग नष्ट कर चुका है, वो बड़ी मात्रा में हमारी विदेशी मुद्रा का भंडार भी हड़प लेता है.

भारत में उच्च से लेकर नीचे तक चीनी एजेंटो का जाल बिछाया हे जो बहरूपिये विभिन्न स्वरूपो में , नोकरशाही को देश हित के निर्णय लेने में अवरोध करते हे, हमारे राजनीतिक नेतृत्व को विचलित त्रस्त करने और अपनी शरण में लेने के लिए वो अपने पालतू कुत्ते पाकिस्तान को हमेशा भारत पर छू करा रहता है और इससे हमारा देश, देशवासी और कथित राष्ट्रभक्त सदैव ही एक स्तरहीन मामूली निकृष्ट पाकिस्तान को, जो अब तक वस्तुतः एक देश भी नहीं बन सका से, सैन्य असैन्य तौर पर व्यर्थ प्रलाप में लिप्त रहते आये हैं, इस प्रपंच से देश की आर्थिक प्रगति का विनाश करने में चीन सफल होता है साथ ही देश में स्थायित्व व्यवधान होने से विदेशी बैंक संस्थान देश में पूँजी निवेश पर जोखिम उठाने के स्थान पर चीन में अपना निवेश फायदेमंद मानते है.

ऐसा नहीं की चीन केवल अपने पिछलग्गू पाकिस्तान को ही छू किये हुए हे, वरन् अंतराष्ट्रीय तौर पर उसकी अपनी भूमिका को भी इस्लामी आतंकियो से बचा ले रहा है, वो देश में स्थित 25 करोड़ मुस्लिमो को भी अपनी इन करतूतों से भड़काकर विद्रोह या कुछ हद तक सरकार का विरोध करने का षड्यंत्र बुनता हे, इससे देश में सामुदायिक मनमुटाव पैदा होता है जो राष्ट्र हेतू लाभदायक तो बिल्कुल ही नहीं है, इन स्थितियो में क्रूर चीन भारत के प्रति मुलायम रहने हेतू अच्छी खासी कीमत हमारे विशाल उपभोक्ता बाज़ार को , मुश्किलो से थोड़ी बहुत आयी आर्थिक खुशहाली को जी भरकर लूट कर, बसूलता रहता है, इसीलिए नेतृत्व शायद सब कुछ जानकर चीनी माल पर प्रतिबन्ध लगाने के स्थान पर उसे बढ़ाबा देने में विवश हैं.

अन्य देश भी इस स्थिति का दोहन करते रहते हैं, कुछ भारत को सुरक्षा परिषद् में लाने और कुछ विरोध की नूरा कुश्ती करते रहते है, सब कुछ जानकर भी व्यवस्थाएं अपनी छवि की चिंता में लूटी पिटी जाती रहती है, कोउ भी अपवाद नहीं है, लेक़िन आप और हम तो मजबूर नहीं है, ये सब जानते समझते भी फिर क्यों नष्ट करें अपने देश के उत्पादन को, उत्पादकों को, क्यों लाभ पहुचाए दुष्ट क्रूर कुटिल चीनियो को, बहिष्कृत करे चीन को , उसकी प्रत्येक उत्पादित वस्तु को, मात्र भाषण और शब्दों के शेर न् बने, बल्कि अपने आचरण में देशभक्ति लाएं या फिर शूतुरमुर्ग की तरह सरकारों की तरह मुँह छुपा चुप हो जाए और धिक्कारने दे दुनियां को भारतीय कौम की नपुंसकता पर ?