भगवान् परशुराम

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जन्म कथा
भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषयमें जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथाअपनीपुत्रवधू से वर माँगनेकोकहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथाअपनी माता के लिएपुत्र जन्म की कामना की।भृगु ने उन दोनों को ‘चरु’भक्षणार्थ दियेतथा कहा किऋतुकालके उपरान्त स्नान करके सत्यवती गूलर के पेडत्र तथाउसकीमाता पीपलके पेड़ काआलिंगन करे तोदोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरुखानेमें उलट-फेर हो गयी।दिव्यदृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहाँ पधारेतथाउन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता कापुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगातथातुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनयकरने पर भृगु ने मानलिया किसत्यवती का बेटाब्राह्मणोचित रहेगा किंतुपोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा।
सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनिहुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित कीपुत्री रेणुकासे विवाह किया। रेणुकाके पाँच पुत्र हुए—
1. रुमण्वान
2. सुषेण
3. वसु
4. विश्वावसु तथा
5. पाँचवेंपुत्र कानामपरशुराम था।
वही क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला पुत्र था।एक बार सद्यस्नाता रेणुकाराजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गयी। उसके आश्रम पहुँचने पर मुनिकोदिव्यज्ञान से समस्त घटनाज्ञात हो गयी।उन्होंने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारबेटोंकोमाँकीहत्या करने काआदेश दिया। किंतु कोईभीतैयारनहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों कोजड़बुद्ध होने काशापदिया। परशुराम ने तुरन्त पिता कीआज्ञा का पालनकिया। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर माँगनेके लिएकहा। परशुराम ने पहले वर से माँ कापुनर्जीवन माँगा और फिर अपने भाईयों कोक्षमा कर देने के लिएकहा। जमदग्नि ऋषिने परशुराम से कहा किवोअमर रहेगा। एक दिनजब परशुराम बाहर गये थे तोकार्तवीर्य अर्जुन उनकीकुटिया पर आये। युद्ध के मद में उन्होंने रेणुकाकाअपमान किया तथाउसके बछड़ोंका हरण करक चले गये। गायरंभाती रह गयी। परशुराम कोमालूमपड़ातो क्रुद्ध होकर उन्होंने
सहस्रबाहु हैहयराज कोमारडाला। हैहयराज के पुत्र ने आश्रम पर धावा बोला तथा परशुराम कीअनुपस्थितिमें मुनिजमदग्नि कोमारडाला। परशुराम घर पहुँचे तो बहुत दुखीहुए तथा पृथ्वी काक्षत्रियहीन करने कासंकल्प किया। अतः परशुराम ने इक्कीस बारपृथ्वी के समस्त क्षत्रियों कासंहार किया। समंत पंचक क्षेत्र में पाँच रुधिर के कुंड भर दिये। क्षत्रियों के रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों कातर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए तथा उन्होंने परशुराम कोऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों कोदक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की।ब्राह्मणों ने कश्यप कीआज्ञा से उस वेदीको खंड-खंड करके बाँटलिया, अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदीकोपरस्पर बाँटलिया था,खांडवायन कहलाये।
कथा
एक बारउनकीमाँजल का कलश लेकर भरने के लिए नदीपर गयीं।वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ाकर रहा था। उसे देखने में रेणुकाइतनी तन्मय हो गयीकिजल लानेमें विलंबहो गयातथा यज्ञ कासमय व्यतीत हो गया।उसकीमानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों कोउसकावध करने के लिएकहा। परशुराम के अतिरिक्त कोईभीऐसाकरने के लिएतैयारनहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँकावध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदानस्वरूप उनकाजीवित होना माँगा। परशुराम के पिता ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटोंकोमाँकीहत्या करने काआदेश दिया। परशुराम के अतिरिक्त कोईभी तैयारन हुआ। अत: जमदग्नि ने सबको संज्ञाहीन कर दिया। परशुराम ने पिता कीआज्ञा मानकरमाता काशीश काट डाला। पिता ने प्रसन्न होकर वर माँगनेको कहा तोउन्होंने चार वरदानमाँगे-
1. माँपुनर्जीवितहो जायँ,
2. उन्हें मरने कीस्मृति न रहे,
3. भाईचेतना-युक्त हो जायँ और
4. मैं परमायुहोऊँ।
जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदानदे दिये।
क्रोधीस्वभाव
दुर्वासाकीभाँति ये भीअपने क्रोधीस्वभाव के लिए विख्यात है। एक बार
कार्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थितिमें आश्रम उजाड़ डाला था,जिससेपरशुराम ने क्रोधितहो उसकी सहस्त्र भुजाओंकोकाट डाला। कार्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोधकी भावना से जमदग्नि कावध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बारपृथ्वी कोक्षत्रिय-विहीन कर दिया (हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियाँ जीवित रहीं और नई पीढ़ी कोजन्म दिया) और पाँचझीलों कोरक्त से भर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करनाछोड़करतपस्या की ओर ध्यान लगाया। रामावतार में
रामचन्द्र द्वाराशिवकाधनुष तोड़नेपर ये क्रुद्ध होकर आये थे। इन्होंने परीक्षा के लिएउनकाधनुष रामचन्द्र कोदिया। जब रामने धनुष चढ़ा दिया तोपरशुराम समझ गये कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं। इसलिएउनकीवन्दना करके वे तपस्या करने चले गये। ‘कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपतिगए बनहि तप हेतु॥’ यह वर्णन ‘राम चरितमानस’, प्रथम सोपान में 267 से 284 दोहे तक मिलता है।
रामके पराक्रम की परीक्षा
रामकापराक्रम सुनकर वे
अयोध्यागये। दशरथने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा।उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनीचाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्यधनुष कीप्रत्यंचा चढ़ाने के लिएकहा। रामके ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्यबाणचढ़ाकर दिखाने के लिएकहा। रामने वह बाणचढ़ाकरपरशुराम के तेज़ पर छोड़दिया। बाण उनके तेज़ कोछीनकरपुनः रामके पासलौटआया।रामने परशुराम कोदिव्यदृष्टि दी। जिससेउन्होंने रामके यथार्थ स्वरूपके दर्शन किये।परशुराम एक वर्ष तक लज्जित,तेजहीन तथा अभिमानशून्यहोकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकरउन्होंने वधूसर नामकनदीके तीर्थ पर स्नान करके अपनातेज़ पुनः प्राप्त किया।
परशुराम कुंड
असम राज्यकीउत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ
ब्रह्मपुत्र नदीभारतमें प्रवेश करतीहै, वहीं
परशुराम कुण्ड है, जहाँ तप करके उन्होंने शिवजी से परशु प्राप्त किया था।वहीं पर उसे विसर्जित भीकिया। परशुराम जीभीसात चिरंजीवियों में से एक हैं। इनकापाठकरने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँचकुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों कासंहार करके उन कुंडोंकीस्थापनाकी थीतथाअपने पितरों से वर प्राप्त किया थाकिक्षत्रिय संहार के पापसे मुक्त हो जायेंगे।
रामकथा में परशुराम
चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त राजा दशरथअपनी विशाल सेनाऔर पुत्रों के साथ
अयोध्यापुरीके लियेचल पड़े। मार्ग में अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले।उन्होंने रामसे कहा किवे उसकीपराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर राम उनके हाथ काधनुष चढ़ाकरदिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रम से संतुष्ट होकर वे रामकोद्वंद्व युद्ध के लिएआमंत्रित करेंगे। दशरथअनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि ‘विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दोधनुषोंका निर्माणकिया था।उनमें से एक तोदेवताओंने शिवकोअर्पित कर दिया थाऔर दूसराविष्णु को।एक बारदेवताओंके यह पूछने पर किशिव और विष्णु में कौनबलबान है, कौननिर्बल-
ब्रह्मा ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूपविष्णु कीधनुष टंकारके सम्मुख शिवधनुष शिथिल पड़ गयाथा, अतः पराक्रम कीवास्तविक परीक्षा इसीधनुष से हो सकतीहै। शान्त होने पर शिवने अपनाधनुष विदेह वंशज देवरातको और विष्णु ने अपनाधनुष भृगुवंशीऋचीककोधरोहर के रूप में दिया था,जोकिमेरे पाससुरक्षित है।’
रामने क्रुद्ध होकर उनके हाथ से धनुष बाणलेकर चढ़ादिया और बोले- ‘विष्णुबाणव्यर्थ नहीं जा सकता।अब इसकाप्रयोग कहाँ पर किया जाये।’ परशुराम काबल तत्काल लुप्त हो गया।उनके कथनानुसार रामने बाणका प्रयोग परशुराम के तपोबलसे जीतेहुए अनेक लोकों पर किया, जोकिनष्ट हो गये। परशुराम ने कहा – ‘हे राम, आप निश्चय ही साक्षात विष्णु हैं।’ तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वत के लिएप्रस्थान किया। रामआदिअयोध्याकीओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष
वरुणदेव कोदे दिया। परशुराम कीछोड़ी हुई सेनाने भीराम आदिके साथप्रस्थान किया।
कथा:पिता काआदेश
नारायण ने ही भृगुवंश में परशुराम रूप में अवतारधारण किया था।उन्होंने जंभासुर कामस्तक विदीर्णकिया। शतदुंदभिकोमारा। उन्होंने युद्ध में हैहयराज अर्जुन कोमारा तथाकेवल धनुष कीसहायता से
सरस्वती नदीके तट पर हज़ारों ब्राह्मण वेशी क्षत्रियों कोमारडाला। एक बारकार्तवीर्य अर्जुन ने बाणों से समुद्र कोत्रस्त कर किसी परम वीरके विषयमें पूछा।समुद्र ने उसे परशुराम से लड़ने कोकहा। परशुराम कोउसने अपने व्यवहार से बहुत रुष्ट कर दिया। अतः परशुराम ने उसकीहज़ार भुजाएँकाट डालीं। अनेक क्षत्रिय युद्ध के लिएआ जुटे। परशुराम क्षत्रियों से रुष्ट हो गये, अतः उन्होंने इक्कीस बारपृथ्वी कोक्षत्रिय विहीन कर डाला। अंत में पितरों कीआकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करनाछोड़करतपस्या की ओर ध्यान लगाया।
वे सौवर्षों तक सौमनामक विमान पर बैठे हुए शाल्व से युद्ध करते रहे किंतु गीतगीतगाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुंह से यह सुनकर किशाल्वका वध प्रद्युम्न और साँबको साथलेकर विष्णु करेंगे, उन्हें विश्वास हो गया, अतः वे तभीसे वन में जाकरअपने अस्त्र शस्त्र इत्यादिपानी में डुबोकर
कृष्णावतारकीप्रतीक्षा में तपस्या करने लगे।
परशुराम और यज्ञ
परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए।यज्ञ करने के लिएउन्होंने बत्तीस हाथ ऊँचीसोनेकी वेदीबनवायी थी।महर्षि
कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदीकोले लिया तथाफिरपरशुराम से पृथ्वी छोड़करचले जानेके लिए कहा। परशुराम ने समुद्र पीछेहटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।
रामऔर परशुराम
भृगुनंदन परशुराम क्षत्रियों कानाशकरने के लिएसदैव तत्पर रहते थे। दशरथ पुत्र रामकापराक्रम सुनकर वे अयोध्यागये। दशरथने उनके स्वागतार्थ रामचन्द को भेजा।उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनीचाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्यधनुष की प्रत्यंचा चढ़ानेके लिए कहा। रामके ऐसाकर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्यबाणचढ़ाकरदिखाने के लिएकहा। रामने वह बाणचढ़ाकरपरशुराम के तेज़ पर छोड़दिया। बाणउनके तेज़ कोछीनकरपुनः रामके पास लौटआया।रामने परशुराम को दिव्यदृष्टि दी।जिससे उन्होंने रामके यथार्थ स्वरूपके दर्शन किये। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित,तेजहीन तथा अभिमानशून्यहोकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकरउन्होंने वधूसर नामकनदीके तीर्थ पर स्नान करके अपनातेज़ पुनः प्राप्त किया।
गाधि और ऋचीक
गाधि नामकमहाबली राजा अपने राज्यकापरित्याग करके वन में चले गये। वहाँ उनकीएक पुत्री हुई जिसका वरण ऋचीक नामकमुनिने किया। गाधि ने ऋचीकसे कहा किकन्या कीयाचना करते हुए उनके कुल में एक सहस्र पांडुबर्णीअश्व, जिनकेकान एक ओर से कालहों, शुल्क स्वरूपदियेजातेहैं, अतः वे शर्ते पूरीकरें। ऋचीकने वरुणदेवतासे उस प्रकार के एक सहस्र घोड़ेप्राप्त कर शुल्कस्वरूप प्रदान किये।गाधि कीसत्यवती नामकपुत्री काविवाह ऋतीकसे हुआ।
कथा:शिव द्वारा दिव्यास्त्र
बड़े होने पर परशुराम ने शिवाराधन किया। उस नियमका पालनकरते हुए उन्होंने शिवकोप्रसन्न कर लिया। शिवने उन्हें दैत्यों काहनन करने की आज्ञा दी।परशुराम ने शत्रुओं से युद्ध किया तथा उनकावध किया। किंतुइस प्रक्रिया में परशुराम काशरीर क्षत-विक्षत हो गया।
शिवने प्रसन्न होकर कहा किशरीरपर जितने प्रहार हुए हैं, उतना ही अधिकदेवदत्व उन्हें प्राप्त होगा। वे मानवेतरहोते जायेंगे। तदुपरान्त शिवने परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान किये, जिनमेंसे परशुराम ने कर्ण पर प्रसन्न होकर उसे दिव्यधनुर्वेद प्रदान किया।
जमदग्नि ऋषिने रेणुकाके गर्भ से अनेक पुत्र प्राप्त किए।उनमें सबसे छोटे परशुराम थे। उन दिनों हैहयवंश काअधिपति अर्जुन था।उसने विष्णु के अंशावतार दत्तात्रेय के वरदान से एक सहस्र भुजाएँ प्राप्त कीथीं।एक बारनर्मदा में स्नान करते हुए मदोन्मत्त हैहयराज ने अपनीबाँहों से नदीकावेग रोकलिया, फलतः उसकीधारा उल्टीबहने लगी, जिससे
रावणकाशिविर पानी में डूबने लगा।दशाननने अर्जुन के पासजाकरउसे भला-बुरा कहा तोउसने रावणको पकड़कर कैद कर लिया।
पुलस्त्य के कहने पर उसने रावणकोमुक्त कर दिया। एक बारवह वन में जमदग्नि के आश्रम पर पहुँचा। जमदग्नि के पास कामधेनुथी।अतः वे अपरिमित वैभव क भोक्ता थे। ऐसादेखकर हैहयराज सहस्र बाहु अर्जुन ने कामधेनुकाअपहरण कर लिया। परशुराम ने फरसा उठाकरउसकापीछा किया तथा युद्ध में उसकीसमस्त भुजाएँतथासिरकाटडाले।
तीर्थाटन
उसके दस हज़ार पुत्र भयभीतहोकर भागगये। कामधेनुसहित आश्रम लौटनेपर पिता ने उन्हें तीर्थाटनकर अपने पापधोने के लिएआज्ञा दीक्योंकि उनकीमतिमें ब्राह्मण का धर्म क्षमादान है। परशुराम ने वैसाही किया। एक वर्ष तक तीर्थ करके वे वापसआये। उनकीमाँजल का कलश लेकर भरने के लिए नदीपर गयीं।वहाँ गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ाकर रहा था। उसे देखने में रेणुकाइतनी तन्मय हो गयीकिजल लानेमें विलंबहो गयातथा यज्ञ कासमय व्यतीत हो गया।उसकीमानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने अपने पुत्रों कोउसकावध करने के लिएकहा। परशुराम के अतिरिक्त कोईभीऐसाकरने के लिएतैयारनहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माँऔर सब भाइयों कावध कर दिया। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने वरदानस्वरूप उन सबकाजीवित होना माँगा, अतः सब पूर्ववत् जीवित तथास्वस्थ हो गये। हैहयराज अर्जुन के पुत्र निरंतरबदलालेने का अवसर ढूँढते रहते थे। एक दिनपुत्रों कीअनुपस्थिति में उन्होंने ऋषिजमदग्नि कावध कर दिया। परशुराम ने उन सबकोमारकर
महिष्मति नगरीमें उनके कटे सिरों से एक पर्वत का निर्माणकिया। उन्होंने अपने पिता कोनिमित्तबनाकर इक्कीस बारपृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया। वास्तव में परशुराम श्रीविष्णु के अंशावतार थे, जिन्होंने क्षत्रिय नाशके लिएही जन्म लिया था।उन्होंने अपने पिता के धड़ कोसिरसे जोड़करयजन द्वाराउन्हें स्मृति रूप सकल्पमय शरीर कीप्राप्ति करवादी।
श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णन
रेणुकाके गर्भ से जमदग्नि ऋषिके वसुमानआदिकई पुत्र हुए। उनमें सबसे छोटे परशुरामजी थे। उनका यश सारेसंसारमें प्रसिद्ध है। कहते हैं कि
हैहयवंश काअन्त करने के लियेस्वयं भगवान ने कीपरशुराम के रूप में अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बारक्षत्रियहीन कर दिया। यद्यपि क्षत्रियों ने उनकाथोड़ा-सा ही अपराध किया था-फिर भीवे लोगबड़े दुष्ट, ब्राह्मणों के अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारणथाकिवे
पृथ्वी के भारहो गये थे और इसीके फलस्वरूप भगवानपरशुराम ने उनकानाश करके पृथ्वी काभारउतार दिया।
राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन! अवश्य ही उस समय के क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये थे; परन्तु उन्होंने परशुरामजी काऐसाकौन-सा अपराधकर दिया, जिसकेकारणउन्होंने बार-बार क्षत्रियों के वंश का संहार किया।
श्री शुकदेवजीकहने लगे- परीक्षित! उन दिनों हैहयवंश काअधिपति थाअर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था।उसने अनेकोंप्रकार कीसेवा-शुश्रूषा करके भगवाननारायण के अंशावतार दत्तात्रेयजी को प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हज़ार भुजाएँतथाकोई भीशत्रु युद्ध में पराजित न कर सके- यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथही
इन्द्रियों काअबाधबल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता,वीरता, कीर्तिऔर शारीरिक बल भी उसने उनकीकृपासे प्राप्त कर लियेथे। वह योगेश्वर हो गयाथा।उसमें ऐसा ऐश्वर्य थाकिवह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, स्थूल-से-स्थूल रूप धारणकर लेता। सभीसिद्धियाँ उसे प्राप्त थीं। वह संसारमें वायुकी तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता।एक बारगले में वैजयन्ती माला पहने सहस्त्रबाहु अर्जुन बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियों के साथनर्मदा नदीमें जल-विहार कर रहा था। उस समय मदोन्मत्त सहस्त्रबाहु ने अपनी बाँहों से नदीकाप्रवाह रोकदिया। दशमुख रावणका शिविर भीवहीं कहीं पास में ही था।नदीकीधारा उलटी बहने लगी, जिससेउसका शिविर डूबने लगा।रावणअपने कोबहुत बड़ावीरतोमानता ही था,इसलिये सहस्त्रार्जुन कायह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ। जब रावण सहस्त्रबाहु अर्जुन के पासजाकरबुरा-भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियों के सामनेही खेल-खेल में रावणकोपकड़ लिया और अपनीराजधानी
माहिष्मती में ले जाकर बंदर के समानकैद कर लिया। पीछेपुलस्त्यजी के कहने से सहस्त्रबाहु ने रावणकोछोड़दिया।
कामधेनुके लिए संघर्ष
एक दिनसहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलने के लिये बड़े घोरजंगल में निकलगया था।दैववश वह जमदग्नि मुनिके आश्रम पर जा पहुँचा। परम तपस्वी जमदग्नि मुनिके आश्रम में
कामधेनुरहती थी।उसके प्रताप से उन्होंने सेना, मन्त्री और वाहनों के साथ हैहयाधिपति कादेखाकि जमदग्नि मुनिकाऐश्वर्य तो मुझसे भीबढ़ा-चढ़ा है। इसलियेउसने उनके स्वागत-सत्कार कोकुछ भीआदर न देकर कामधेनुकोही ले लेनाचाहा। उसने अभिमानवश जमदग्नि मुनिसे माँगा भीनहीं, अपने सेवकों कोआज्ञा दीकिकामधेनुको छीनले चलो।उसकीआज्ञा से उसके सेवक बछड़े के साथ’बाँ-बाँ’ डकराती हुई कामधेनुकोबलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये। जब वे सब चले गये, तब परशुरामजी आश्रम पर आये और उसकीदुष्टता का वृत्तान्त सुनकर चोटखाये हुए साँपकीतरह क्रोध से तिलमिला उठे। वे अपनाभयंकर फरसा,तरकस, ढालएवं धनुष लेकर बड़े वेग से उसके पीछेदौड़े-जैसे कोई किसी से न दबने वाला सिंह हाथी पर टूट पड़े।
सहस्त्रबाहु अर्जुन अभीअपने नगर में प्रवेश कर ही रहा थाकिउसने देखापरशुरामजी महाराज बड़े वेग से उसीकीओर झपटे आ रहे हैं। उनकीबड़ीविलक्षण झाँकी थी।वे हाथ में धनुष-बाण और फरसालियेहुए थे, शरीरपर काला मृगचर्म धारण कियेहुए थे और उनकी जटाएँसूर्य कीकिरणों के समानचमक रही थीं। उन्हें देखते ही उसने गदा,खड्ग बाण,ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधोंसे सुसज्जितएवं हाथी, घोड़े,रथ तथापदातियों से युक्त अत्यन्त भयंकर सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी।भगवानपरशुराम ने बात-की-बात में अकेले ही उस सारी सेनाकोनष्ट कर दिया। भगवानपरशुरामजी की गतिमन और वायुके समान थी।बस, वे शत्रु कीसेना काटतेही जारहे थे। जहाँ-जहाँ वे अपने फरसे काप्रहार करते, वहाँ-वहाँ सारथि और वाहनों के साथबड़े-बड़े वीरों कीबाँहें, जाँघेंऔर कंधे कट-कटकर पृथ्वीपर गिरते जातेथे।
सहस्त्रबाहु अर्जुन कावध
हैहयाधिपति अर्जुन ने देखाकिमेरीसेनाके सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढालभगवानपरशुराम के फरसे और बाणों से कट-कटकर ख़ून से लथपथ रणभूमिमें गिर गये हैं, तब उसे बड़ाक्रोध आयाऔर वह स्वयं भिड़नेके लिये आ धमका।उसने एक साथ ही अपनीहज़ार भुजाओं से पाँचसौधनुषोंपर बाण चढ़ायेऔर परशुरामजी पर छोड़े।परन्तु परशुराम जीतो समस्त शस्त्रधारियोंके शिरोमणि ठहरे। उन्होंने अपने एक धनुषपर छोड़े हुए बाणों से ही एक साथसबकोकाटडाला। अब हैहयाधिपति अपने हाथों से पहाड़ और पेड़ उखाड़करबड़े वेग से युद्ध भूमिमें परशुरामजी कीओर झपटा।परन्तु परशुरामजी ने अपनीतीखी धारवाले फरसे से बड़ीफुर्ती के साथउसकीसाँपों के समानभुजाओंकोकाट डाला। जब उसकीबाँहें कट गयीं,तब उन्होंने पहाड़ कीचोटी कीतरह उसका ऊँचासिरधड़ से अलग कर दिया। पिता के मर जानेपर उसके दस हज़ार लड़के डरकर भग गये।
प्रायश्चित
परीक्षित! विपक्षी वीरों के नाशकपरशुरामजी ने बछड़े के साथकामधेनुलौटा ली।वह बहुत ही दु:खीहो रही थी।उन्होंने उसे अपने आश्रम पर लाकर पिताजी कोसौंपदिया। और माहिष्मती में सहस्त्रबाहु ने तथा उन्होंने जोकुछ किया था, सब अपने पिताजी तथाभाइयों कोकह सुनाया। सब कुछ सुनकर जमदग्नि मुनिने कहा- ‘हाय, हाय, परशुराम!तुमने बड़ापापकिया। राम, राम!तुम बड़े वीरहो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेव का तुमने व्यर्थ ही वध किया। बेटा!हमलोग ब्राह्मण हैं। क्षमा के प्रभाव से ही हम संसारमें पूजनीयहुए हैं। और तोक्या,सबके दादा ब्रह्माजी भीक्षमा के बल से ही ब्रह्मपद कोप्राप्त हुए हैं। ब्राह्मणों कीशोभा क्षमा के द्वाराही सूर्य कीप्रभा के समानचमक उठतीहै। सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि भीक्षमावानोंपर ही शीघ्र प्रसन्न होते हैं। बेटा!सार्वभौमराजा का वध ब्राह्मण कीहत्या से भीबढ़कर है। जाओ, भगवानकास्मरण करते हुए तीर्थोंकासेवन करके अपने पापों कोधोडालो’।