“चरैवेति चरैवेति”

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इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र की पुत्र-कामना की कथा ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद की ऋचाओं पर आधारित वैदिक कर्मकांडों से संबंधित ग्रंथ है ।

इसमें एक कथा का उल्लेख है इक्ष्वाकुवंशीय राजा हरिश्चन्द्र और उनके पुत्र रोहित से संबंधित । इस कथा में पांच श्लोकों का उल्लेख है, जिनके अंतिम चरण का अंत “चरैवेति” से होता है ।कथा के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र की कई रानियां थीं, किंतु उनको किसी से भी पुत्र की प्राप्ति न हो सकी । शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार निष्पुत्र मनुष्य का मृत्योपरांत तारण या उद्धार बिना पुत्र के नहीं होता । राजा को यही चिंता सताती रहती थी ।
एक बार उनके राजमहल में पर्वत एवं नारद नाम के दो ऋषियों ने रात्रि-विश्राम किया । उस अवसर पर राजा ने अपनी चिंता व्यक्त की और ऋषि नारद से पुत्रप्राप्ति का उपाय पूछा । ऋषि ने उनसे कहा कि वे वरुण देवता की प्रार्थना-अर्चना करें जो प्रसन्न होकर उन्हें पुत्रोत्पत्ति का वरदान देंगे ।राजा ने वही मार्ग अपनाया । कालांतर में वरुण देवता प्रकट हुए और राजा ने उनसे कहा कि वे उन्हें पुत्र का वरदान दें जिसको लेकर वे उनका यजन (यज्ञ) करेंगे ।

टिप्पणी – जहां तक मैं जानता हूं वैदिक काल में यज्ञ में किसी प्रकार के जीवधारी की बलि देना आवश्यक नहीं होता था । फिर भी पशुबलि का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है । लेकिन जिस कथा का मैं जिक्र कर रहा हूं उसमें वर्णित घटनाक्रम से प्रतीत होता है कि राजा का विचार अपने भावी पुत्र की ही बलि देने का था । कदाचित वे मतिभ्रम में एक अनुचित वचन वरुणदेव को दे बैठे । इसी कथा में यह उल्लेख भी पढ़ने में आता है कि निंद्य कहते हुए नरबलि को संपन्न करने को कोई तैयार नहीं था ।
कालांतर में राजा के यहां पुत्र जन्म हो गया । तब वरुण देवता प्रकट होकर राजा को उनके संकल्प की याद दिलाई और नवजात को लेकर यज्ञ संपन्न करने को कहा । राजा ने कहा, “अभी तो अशौच की स्थिति है अतः उससे यज्ञ अनुमत नहीं है ।” देवता वरुण मान गये । 10-दिनी अशौच पूर्ण होने पर वे पुनः प्रकट हुए और उन्होंने राजा को यज्ञ की याद दिलाई । राजा ने इस बार कहा, “किसी पशु की बलि तब तक नहीं दी जाती जब तक उसके दांत न निकल आवें । अतः दांत तो निकलने दीजिए ।” ठीक है कहते हुए देवता चले गये । जब उस बच्चे के दांत कुछ वर्षों में निकल गये वे पुनः आए और राजा को संकल्प की याद दिलाई । इस बार राजा ने फिर बहाना बनाया और कहा, “जब पशु के आरंभिक (दूध के) सभी दांत गिर जावें तभी उसे यज्ञ में दिया जा सकता है ।”

तथास्तु कहते हुए देवता लौट गये । जब उसके दांत गिर गए तो वरुणदेव ने पुनः राजा को वादे की याद दिलाई । राजा को पुत्रमोह हो चला था, अतः उन्होंने नया बहाना पेश किया । वे बोले, “जब बालक के स्थाई दांत निकल आवें तभी उसका यजन किया जाना चाहिए ।”
इस बार फिर वरुण देवता लौट गए । समयांतर पर बालक के स्थाई दांत आ गये । राजा को उसका संकल्प स्मरण कराने देवता प्रकट हुए । राजा बोले, “हे देव, जब बालक धनुर्विद्या, युद्धकला आदि क्षत्त्रियोचित संस्कार प्राप्त कर ले तो उसके बाद मैं उससे आपका यजन करूंगा ।”

बालक का नाम रोहित था और जब वह उक्त प्रकार से सुसंस्कृत हो गया तो वरुण ने अपनी मांग पुनः दोहराई । इस बार राजा कोई बहाना नहीं बना सके । उन्होंने पुत्र रोहित को पास बुलाकर कहा, “बेटा, मैंने वरुण देवता के वरदान से तुम्हें प्राप्त किया । तब मैंने उन्हें वचन दिया था कि मैं तुम्हें बलि के रूप उन्हें सोंप दूंगा । निःसंदेह यह मेरे पाप-वचन थे । अब मुझे यजन करना ही है ।”
कुमार रोहित को यह प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं था । उसने अपना धनुषादि आयुध उठाए और चला गया वन की ओर । एक वर्ष तक वह देशाटन करता रहा । अलग-अलग स्थलों पर गया, विभिन्न घटनाओं का अनुभव किया । इसी दौरान वरुणदेव के रोष के फलस्वरूप राजा हरिश्चंद्र रोगग्रस्त हो गए । वर्ष बीतते-बीतते रोहित ने पिता के अस्वस्थ होने का समाचार लोगों के मुख से सुना । वह घर लौटने को उद्यत हुआ । वापसी के मार्ग में ब्राह्मण भेष धारण करके इंद्र देवता उससे मिले, जिन्होंने उसे घर जाने के बजाय पुनः पर्यटन-देशाटन करते रहो की सलाह दी ।
ब्राह्मण ने उसको ज्ञानोपदेश दिया –

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम ।
पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति ॥
(ऐतरेय ब्राह्मण, अध्याय 3, खण्ड 3)
(रोहित, श्रान्ताय नाना श्रीः अस्ति इति शुश्रुम, नृषद्वरः जनः पापः, इन्द्रः इत् चरतः सखा, चर एव इति ।)
अर्थ – हे रोहित, परिश्रम से थकने वाले व्यक्ति को भांति-भांति की श्री यानी वैभव/संपदा प्राप्त होती हैं ऐसा हमने ज्ञानी जनों से सुना है । एक ही स्थान पर निष्क्रिय बैठे रहने वाले विद्वान व्यक्ति तक को लोग तुच्छ मानते हैं । विचरण में लगे जन का इन्द्र यानी ईश्वर साथी होता है । अतः तुम चलते ही रहो (विचरण ही करते रहो, चर एव) ।
‘श्री’ से यहां मतलब केवल भौतिक संपदा से नहीं है बल्कि स्थान-स्थान पर विचरण करने से प्राप्त ज्ञान, भांति-भांति के लोगों से प्राप्य अनुभव, उनसे सीखे गए कर्म-संपादन का कौशल, आदि से होगा । इंद्र रोहित को बताना चाहते हैं कि सम्मान उसी को मिलता है जो कर्मठ हो, अपने लिए संपदा स्वयं अर्जित करे, दूसरों पर आश्रित न हो । वह स्वयं को अकेला न समझे बल्कि दैव (ईश्वर) पर भरोसा करे ।
ब्राह्मण के उपदेशों से प्रभावित होकर रोहित पुनः देश-प्रदेश में विचरण करने लगा । विचरण का यह सिलसिला चार बार और चलता है । प्रत्येक वर्ष के बाद जब रोहित घर लौटने की सोचता है तो मार्ग में फिर ब्राह्ण रूपधारी इन्द्र मिलते हैं जो पुनः “चरैवेति” की सलाह देते हैं ।