गायत्री मंत्र साधना

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गायत्री महामंत्र (ऋग्वेद ४,६२,१०)

ॐ भूर्भुव स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

भावार्थ उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

यह मंत्र सर्वप्रथम ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है। इसके ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता सविता हैं। वैसे तो यह मंत्र विश्वामित्र के इस सूक्त के १८ मंत्रों मे केवल एक है, किंतु अर्थ की दृष्टि से इसकी महिमा का अनुभव आरंभ में ही ऋषियों ने कर लिया था और संपूर्ण ऋग्वेद के १० सहस्र मंत्रों मे इस मंत्र के अर्थ की गंभीर व्यंजना सबसे अधिक की गई। इस मंत्र में २४ अक्षर हैं। उनमें आठ आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। किंतु ब्राह्मण ग्रंथों में और कालांतर के समस्त साहित्य में इन अक्षरों से पहले तीन व्याहृतियाँ और उनसे पूर्व प्रणव या ओंकार को जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप इस प्रकार स्थिर हुआ:

(१) ॐ (२) भूर्भव: स्व: (३) तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

मंत्र के इस रूप को मनु ने सप्रणवा, सव्याहृतिका गायत्री कहा है और जप में इसी का विधान किया है।

गायत्री तत्व क्या है और क्यों इस मंत्र की इतनी महिमा है, इस प्रश्न का समाधान आवश्यक है।

आर्ष मान्यता के अनुसार गायत्री एक ओर विराट् विश्व और दूसरी ओर मानव जीवन, एक ओर देवतत्व और दूसरी ओर भूततत्त्व, एक ओर मन और दूसरी ओर प्राण, एक ओर ज्ञान और दूसरी ओर कर्म के पारस्परिक संबंधों की पूरी व्याख्या कर देती है। इस मंत्र के देवता सविता हैं, सविता सूर्य की संज्ञा है, सूर्य के नाना रूप हैं, उनमें सविता वह रूप है जो समस्त देवों को प्रेरित करता है। जाग्रत् में सवितारूपी मन ही मानव की महती शक्ति है। जैसे सविता देव है वैसे मन भी देव है (देवं मन: ऋग्वेद, १,१६४,१८)। मन ही प्राण का प्रेरक है। मन और प्राण के इस संबंध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सब कर्मों का अधिष्ठाता है, यह सत्य प्रत्यक्षसिद्ध है। इसे ही गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है।

ब्राह्मण ग्रंथों की व्याख्या है-कर्माणि धिय:, अर्थातृ जिसे हम धी या बुद्धि तत्त्व कहते हैं वह केवल मन के द्वारा होनेवाले विचार या कल्पना सविता नहीं किंतु उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यही उसकी चरितार्थता है। किंतु मन की इस कर्मक्षमशक्ति के लिए मन का सशक्त या बलिष्ठ होना आवश्यक है। उस मन का जो तेज कर्म की प्रेरण के लिए आवश्यक है वही वरेण्य भर्ग है। मन की शक्तियों का तो पारवार नहीं है। उनमें से जितना अंश मनुष्य अपने लिए सक्षम बना पाता है, वहीं उसके लिए उस तेज का वरणीय अंश है। अतएव सविता के भर्ग की प्रार्थना में विशेष ध्वनि यह भी है कि सविता या मन का जो दिव्य अंश है वह पार्थिव या भूतों के धरातल पर अवतीर्ण होकर पार्थिव शरीर में प्रकाशित हो। इस गायत्री मंत्र में अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं पाई जाती। यहाँ एक मात्र अभिलाषा यही है कि मानव को ईश्वर की ओर से मन के रूप में जो दिव्य शक्ति प्राप्त हुई है उसके द्वारा वह उसी सविता का ज्ञान करे और कर्मों के द्वारा उसे इस जीवन में सार्थक करे।

गायत्री के पूर्व में जो तीन व्याहृतियाँ हैं, वे भी सहेतुक हैं। भू पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है। भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है। स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है। इस त्रिक के अन्य अनेक प्रतीक ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराणों में कहे गए हैं, किंतु यदि त्रिक के विस्तार में व्याप्त निखिल विश्व को वाक के अक्षरों के संक्षिप्त संकेत में समझना चाहें तो उसके लिए ही यह ॐ संक्षिप्त संकेत गायत्री के आरंभ में रखा गया है। अ, उ, म इन तीनों मात्राओं से ॐ का स्वरूप बना है। अ अग्नि, उ वायु और म आदित्य का प्रतीक है। यह विश्व प्रजापति की वाक है। वाक का अनंत विस्तार है किंतु यदि उसका एक संक्षिप्त नमूना लेकर सारे विश्व का स्वरूप बताना चाहें तो अ, उ, म या ॐ कहने से उस त्रिक का परिचय प्राप्त होगा जिसका स्फुट प्रतीक त्रिपदा गायत्री है।

विविध धर्म-सम्प्रदायों मे गायत्री महामंत्र का भाव 

हिन्दू – ईश्वर प्राणाधार, दुःखनाशक तथा सुख स्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें। जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर बढ़ाने के लिए पवित्र प्रेरणा दें।

यहूदी – हे जेहोवा (परमेश्वर) अपने धर्म के मार्ग में मेरा पथ-प्रदर्शन कर, मेरे आगे अपने सीधे मार्ग को दिखा।

शिंतो – हे परमेश्वर, हमारे नेत्र भले ही अभद्र वस्तु देखें परन्तु हमारे हृदय में अभद्र भाव उत्पन्न न हों। हमारे कान चाहे अपवित्र बातें सुनें, तो भी हमारे में अभद्र बातों का अनुभव न हो।

पारसी – वह परमगुरु (अहुरमज्द-परमेश्वर) अपने ऋत तथा सत्य के भंडार के कारण, राजा के समान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गये परोपकारों से मनुष्य प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।

दाओ (ताओ) – दाओ (ब्रह्म) चिन्तन तथा पकड़ से परे है। केवल उसी के अनुसार आचरण ही उ8ाम धर्म है।

जैन – अर्हन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार तथा सब साधुओं को नमस्कार।

बौद्ध धर्म – मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ, मैं धर्म की शरण में जाता हूँ, मैं संघ की शरण में जाता हूँ।

कनफ्यूशस – दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार न करो, जैसा कि तुम उनसे अपने प्रति नहीं चाहते।

ईसाई – हे पिता, हमें परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सदा तेरी ही है।

इस्लाम – हे अल्लाह, हम तेरी ही वन्दना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा, उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपापात्र बने, न कि उनका, जो तेरे कोपभाजन बने तथा पथभ्रष्ट हुए।

सिख – ओंकार (ईश्वर) एक है। उसका नाम सत्य है। वह सृष्टिकर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भय, र्निवैर, जन्मरहित तथा स्वयंभू है। वह गुरु की कृपा से जाना जाता है।

बहाई – हे मेरे ईश्वर, मैं साक्षी देता हूँ कि तुझे पहचानने तथा तेरी ही पूजा करने के लिए तूने मुझे उत्पन्न किया है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमात्मा नहीं है। तू ही है भयानक संकटों से तारनहार तथा स्व निर्भर।

गायत्री उपासना का विधि-विधान

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है। हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है। तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है। शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए।

उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है –

(१) ब्रह्म सन्ध्या – जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है। इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं।

(अ) पवित्रीकरण – बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें।

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

(ब) आचमन – वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें। हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा।

(स) शिखा स्पर्श एवं वंदन – शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे। निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

(द) प्राणायाम – श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है। श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।

(य) न्यास – इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके। बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें।

ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु। (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु। (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु। (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु। (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु। (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु। (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु। (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि सााधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो। पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं।

(२) देवपूजन – गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है। उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें। भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है।

ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि।
गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥

ॐ श्री गायत्र्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि।

(ख) गुरु – गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है। सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः।
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।

(ग) माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है। इन्हें विधिवत् संपन्न करें। जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं। एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें। जल का अर्थ है – नम्रता-सहृदयता। अक्षत का अर्थ है – समयदान अंशदान। पुष्प का अर्थ है – प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास। धूप-दीप का अर्थ है – सुगंध व प्रकाश का वितरण, पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है – स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश।

ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं। कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है।

(३) जप – गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए। अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम। होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें। जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं। दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है।

(४) ध्यान – जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है। साकार ध्यान में गायत्री माता के अंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है। निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है।

(५) सूर्यार्घ्यदान – विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में र्अघ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है।

ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः॥

भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है।

इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए। जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए। सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है। मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है। माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें।

गायत्री मंत्र की महत्ता से अधिकांश लोग वाकिफ होते ही हैं। यह पूर्णरूप से सिद्ध वैदिक मंत्र है, जिसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य है मोक्ष प्राप्ति की पात्रता प्रदान करना। हालांकि इस मंत्र को आप जिस भी कामना से वशीभूत होकर जपेंगे, वह कामना अवश्य पूरी होती है।  हम इस मंत्र से आपका साक्षात्कार करवाएंगे,
गायत्री साधक जितना ही गहरे इसमें उतरता जाएगा, यदि वह मोक्ष की कामना से इसमें शामिल हुआ है तो ये मंत्र उस साधक को दुनियावी संसाधनों से मुक्त कर देता है। मोक्ष की कामना वाला साधक इस भौतिक जीवन के जितने भी आयाम हैं, उन्हें पछोप देता है।
 वह गायत्री मंत्र का जितना अधिक जपा करेगा, उतना ही अधिक वह मोह-माया के बंधनों को काटकर उनसे ऊपर आ जाएगा।इसे ठीक से समझें। गायत्री मंत्र की करिश्माई शक्ति ये है कि आप इसे जिस उद्देश्य से साधेंगे, ये उसे अवश्य पूरा करेगी। यदि आपने भौतिक सुखों की चाह में साधा तो ये आपको समृद्ध बनाएगी…………..यदि मुक्ति व मोक्ष की कामना से साधा तो आपके सभी पूर्व संचित कर्मों (पाप व पुण्य दोनों) का नाश करके आपको परमात्मशरण में ले जाएगी। सभी दुनियावी साधन परमात्मा से दूर करते हैं जबकि गायत्री उपासना आपको परमात्मा की शरण में सहज रूप से ले जा पाने में सक्षम है………..मंत्र:- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र को वेदों का सर्वश्रेष्ठ मंत्र बताया गया है। इसके जप के लिए तीन  संन्धया  काल सर्व श्रेष्ठ  समय बताए गए हैं।.मौन जप उतम् है।

गायत्री प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
सुख-शान्ति प्राप्त करने के लिए समूची मानव जाति लालायित है । वह किसी ऐसे कल्पवृक्ष की खोज में है जिसके द्वारा उसकी इच्छाएँ आकाँक्षायें आसानी से पूरी हो सकें । सुरलोक में अवस्थित एक ऐसे ही कल्पवृक्ष का वर्णन पुराणों में मिलता है जिसके नीचे बैठकर जिस भी वस्तु की कामना की जाय वहीं वस्तु तुरन्त सामने उपस्थित हो जाती है । जो भी इच्छा की जाय, तुरन्त पूर्ण हो जाती है ।
पृथ्वी पर भी एक ऐसा कल्पवृक्ष है , जिसमें सुरलोक के कल्पवृक्ष की सभी संभावनायें छिपी हुई हैं । अध्यात्म विद्या के अनुसंधानकर्ता मनीषी वैज्ञानिकों ने उस कल्पवृक्ष को ढूँढ़ निकाला है और प्रमाणित कर दिया है कि वह सर्वसुलभ है । उसे जो चाहे सो आसानी से पा सकता है और मनोवाँछित देवी सुख-सम्पदा का स्वामी बन सकता है । धरती के इस कल्पवृक्ष का नाम है-महाशक्ति गायत्री । गायत्री महामंत्र को स्थूल दृष्टि से देखा जाय तो चौबीस अक्षरों और नो पदों की एक शब्द-शृंखला मात्र है । परन्तु यदि गंभीरतापूर्वक अवलोकन किया जाय तो उसके प्रत्येक पद और अक्षर में ऐसे तत्वों का रहस्य छिपा हुआ मिलेगा, जिनके द्वारा कल्पवृक्ष के समान ही समस्त इच्छाओं की पूर्ति हो सकती है ।
शास्त्रों में गायत्री कल्पवृक्ष का वर्णन मिलता है । इसमें बताया गया है कि – “ॐ“ ईश्वर अर्थात् अर्थात् आस्तिकता ही भारतीय धर्म का मूल है । इससे आगे बढ़कर उसके तीन विभाग होते हैं भूः, भुवः , स्वः । भूः का अर्थ है – आत्मज्ञान । भुवः का अर्थ है- कर्मयोग स्वः का तात्पर्य है- स्थिरता , समाधि। इन तीन शाखाओं में से प्रत्येक में तीन-तीन टहनियाँ निकलती है , उनमें से प्रत्येक के भी अपने-अपने तात्पर्य हैं । तत्-जीवन विज्ञान । सवितु-शक्ति संचय वरेण्यं-श्रेष्ठता । भर्गो-निर्मलता । देवस्य-दिव्य दृष्टि । धीमहि-सद्गुण । धियो-विवेक । योनः-संयम प्रचोदयात्-सेवा । भौतिक नौ रत्नों की तुलना में इन गुणों की महिमा-महत्ता कहीं अधिक है । गायत्री महाशक्ति हमारी मनोभूमि में इन्हीं को बोती है, फलस्वरूप अन्तराल रूपी खेत में जो उगता है, वह कल्पवृक्ष से किसी भी प्रकार कम नहीं होता ।
इनमें से प्रथम-जीवन विज्ञान की जानकारी होने से मनुष्य जन्म-मरण के रहस्य को समझ जाता है । उसे मृत्यु का भय नहीं लगता, सदा निर्भय रहता है । उसे शरीर का तथा साँसारिक वस्तुओं का लोभ भी नहीं होता । फलस्वरूप जिन साधारण हानि-लाभों के लिए लोग बेतरह दुख के समुद्र में डूबते और हर्ष के मद में उछलते-फिरते हैं, उन उन्मादों से वह बच जाता है ।
गायत्री कल्पवृक्ष की दूसरी देन है-शक्ति संचय की प्रेरणा । शक्ति संचय की नीति अपनाने वाला दिन-दिन अधिक स्वस्थ, विद्वान, प्रतिभाशाली, धनी, सहयोग सम्पन्न प्रतिष्ठावान बनता जाता है । निर्बलों पर प्रकृति के बलवानों के तथा दुर्भाग्य के आये दिन जो आक्रमण होते रहते हैं, उनसे वह बचा रहता है और शक्ति सम्पादन के कारण जीवन के नाना-विधि आनन्दों को स्वयं भोगता तथा अपनी शक्ति द्वारा दुर्बलों की पीड़ितों की सहायता करके पुण्य का भागीदार बनता है । अनीति वहीं पनपती है जहाँ शक्ति का सन्तुलन नहीं होता । शक्ति संचय का स्वभाविक परिणाम है-अनीति का अंत जो कभी के लिए कल्याणकारी है ।
वरेण्यं-अर्थात् श्रेष्ठता गायत्री की तीसरी उपलब्धि है । श्रेष्ठता का अस्तित्व परिस्थितियों में नहीं विचारो में होता है । जो व्यक्ति साधन सम्पन्नता में बढ़े-चढ़े हुए हैं, परन्तु लक्ष्य, सिद्धान्त, आदर्श एवं अंतःकरण की दृष्टि से गिरे हुए हैं , उन्हें निकृष्ट ही कहा जायगा । ऐसे व्यक्ति अपनी आत्मा की दृष्टि में और दूसरे सभी विवेकवान व्यक्तियों की दृष्टि में, नीची श्रेणी के ठहरते हैं और अपनी नीचता के दण्ड स्वरूप आत्म-प्रताड़ना, ईश्वरीय दण्ड और बुद्धिभ्रम के कारण मानसिक अशान्ति में डूबते रहते हैं । इसके विपरीत गायत्री कल्पतरु का आश्रय लेने वाला साधक भले ही गरीब एवं साधनहीन क्यों न हो, उसका अन्तः करण उच्च तथा उदार बनता जाता है और वह श्रेष्ठता की श्रेणी में जा बैठता है । यही श्रेष्ठता उसके लिए इतने आनन्द का उद्भव करती रहती है जो बड़ी साँसारिक सम्पदा से भी संभव नहीं ।
निर्मलता-गायत्री कल्पतरु की चौथी उपलब्धि है- निर्मलता अर्थात् सौंदर्य, वह वस्तु है जिसे मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी एवं कीट-पतंग तक पसन्द करते हैं । कुरूपता एवं रुग्णता का कारण गन्दगी ही है, चाहे वह बाहरी हो अथवा आभ्यंतरिक । शारीरिक गन्दगी जब मनुष्य को अस्वस्थ, निकृष्ट एवं निन्दनीय बनाती है, तो यदि यही मलिनता मनमें, बुद्धि में, अन्तःकरण में भरी हुई हो तब कहना ही क्या । ऐसे व्यक्ति का स्वरूप हैवान और शैतान से भी बुरा हो जाता है । इन विकृतियों से बचने का एकमात्र उपाय सर्वतोमुखी ‘निर्मलता’ है । गायत्री का ‘भर्ग’ तत्व भीतर-बाहर सब ओर से अपने उपासक को निर्मल बनाता है । शरीर, मन एवं कर्म से जो शुद्ध है, निर्मल है, वह सब प्रकार सुन्दर, प्रसन्न , प्रफुल्ल, मृदुल एवं सन्तुष्ट दिखाई देगा ।
पांचवीं उपलब्धि है-दिव्य दृष्टि । दिव्य दृष्टि से देखने का अर्थ है संसार के दिव्य तत्वों के साथ अपना संबंध जोड़ना । हर पदार्थ अपने सजातीय पदार्थों को अपनी ओर खींचता है और उन्हीं की ओर खुद खिंचता है । जिनका दृष्टिकोण संसार की अच्छाइयों को देखने-समझने और अपनाने का है, वह चारों ओर अच्छे व्यक्तियों को देखते हैं । जिनकी दृष्टि दूषित है, उनके लिए प्रत्येक प्राणी बुरा है, पर जो दिव्य दृष्टि वाले हैं वे ईश्वर की इस परम-पुनीत फुलवारी में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बरसता देखते हैं ।
सद्गुणों-का उन्नयन एवं अवधारण इस कल्प वृक्ष की सबसे बड़ी देन है । गायत्री का अवलम्बन लेने वाले अपने में अच्छी आदतें , अच्छी योग्यतायें अच्छी विशेषतायें धारण करते और आनन्दमय जीवन व्यतीत करते हैं । विनयशीलता , नम्रता , शिष्टाचार, मधुरभाषण, उदार व्यवहार, सेवा-सहयोग, ईमानदारी, परिश्रमशीलता, समय की पाबन्दी, नियमितता , कर्तव्यपरायणता , जागरुकता, धैर्य, साहस, पराक्रम, पुरुषार्थ, आशा , उत्साह आदि सद्गुण हैं । इस प्रकार की सम्पदा जिसके पास है, वह आनन्दमय जीवन बितायेगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है ।
धियो-विवेक एक प्रकार का वह आत्मिक प्रकाश है जिसके द्वारा सत्य-असत्य की , उचित-अनुचित की , आवश्यक-अनावश्यक की, हानि-लाभ की परीक्षा होती है । इस सम्बन्ध में देशकाल, परिस्थिति, उपयोगिता, जनहित आदि बातों को ध्यान में रखते हुए सद्बुद्धि से निर्णय किया जाता है, वही प्रामाणिक एवं ग्राहय होता है । जिसने उचित निर्णय कर लिया तो समझना चाहिए उसने सरलतापूर्वक सुख-शान्ति के लक्ष्य तक पहुँचने की सीधी राह पाली ।
संयम-अर्थात् तप स्वयं में कल्पवृक्ष के समान फलदायी है । गायत्री के यो नः अक्षर मानवी मनोभूमि को संयम की हर कसौटी पर कसने योग्य खरा बनाने की प्रेरणा देते हैं । जीवनी शक्ति का , विचार शक्ति का , अर्थ, समय एवं श्रम का, भोगेच्छा का सन्तुलन ठीक रखना ही संयम है । मानव शरीर आश्चर्यजनक शक्तियों का केन्द्र है । यदि उन शक्तियों का अपव्यय रोककर उपयोगी दिशा में लगाया जाय तो अनेक आश्चर्यजनक सफलतायें मिल सकती हैं और जीवन की प्रत्येक दिशा में उन्नति हो सकती है ।
गायत्री कल्पवृक्ष का नवाँ नवरत्न है-प्रचोदयात् सेवा। सहायता, सहयोग ,प्रेरणा, उन्नति की ओर, सुविधा की ओर किसी को बढ़ाना यह उसकी सबसे बड़ी सेवा है । इसी दिशा में हमारा शरीर और मन-मस्तिष्क सबसे अधिक हमारी सेवा का पात्र है क्योंकि वह हमारे सबसे अधिक निकट है । आमतौर से दान देगा , समय देना या बिना मूल्य अपनी शारीरिक मानसिक शक्ति किसी को देना सेवा कहा जाता है और यह अपेक्षा नहीं की जाती कि हमारे इस त्याग से दूसरों में कोई क्रिया शक्ति , आत्म निर्भरता, स्फूर्ति-प्रेरणा जाग्रत हुई या नहीं । दूसरों को आलसी , परावलम्बी और भाग्यवादी बनाने वाली हानिकारक सेवा भी एक प्रकार की सेवा है । सेवा वही उत्तम है जो दूसरों में उत्साह, आत्म-निर्भरता और क्रियाशीलता को सतेज करने में सहायक हो । सेवा का फल है-उन्नति । सेवा द्वारा अपने को तथा दूसरों को समुन्नत बनाना, संसार को अधिक आनन्दमय बनाना सबसे महान पुण्य कार्य है । इस प्रकार के सेवाभावी पुण्यात्मा साँसारिक और आत्मिक दृष्टि से सदा सुखी और सन्तुष्ट रहते हैं ।
यही है पृथ्वी का वह कल्पवृक्ष जो अपने उपासक को, आश्रित को भौतिक एवं आध्यात्मिक सम्पदाओं से भरा पूरा बनाता है । जिनके पास गायत्री के उक्त आध्यात्मिक नवरत्न हैं वे इस भूतल के कुबेर हैं । भले ही उनके पास धन-दौलत , जमीन-जायदाद न हो। यह नवरत्न मण्डित कल्पवृक्ष जिनके पास है वह विवेकयुक्त मनुष्य सदा सुरलोक की सुख, सम्पदा भोगता है । उसके लिए यह भूलोक ही स्वर्ग है । गायत्री को ‘सर्वकामधुक्’ अर्थात् समस्त कामनाओं को पूरा करने वाला कहा गया है । यही वह कल्पतरु है जो हमें चारों फल देता है । धर्म , अर्थ, काम , मोक्ष की चारों सम्पदाओं से स्थायी सुख-शान्ति से हमें परिपूर्ण कर देता है ।

पुराणों में उल्लेख है कि सूर्यलोक में देवताओं के पास कामधेनु गौ है, वह अमृतोपम दूध देती है ।। जिसे पीकर देवता लोग सदा सन्तुष्ट, प्रसन्न तथा सुसम्पन्न रहते हैं, इस गौ में यह विशेषता है कि उसके समीप कोई अपनी कुछ कामना लेकर आता है, तो उसकी इच्छा तुरन्त पूरी हो जाती है ।। कल्पवृक्ष के समान कामधेनु गौ भी अपने निकट पहुँचने वालों की मनोकामना पूरी करती है ।।

यह कामधेनु गौ गायत्री ही है ।। इस महाशक्ति की जो देवता, दिव्य स्वभाव वाला मनुष्य उपासना करता है ।। वह माता के स्तनों के समान आध्यात्मिक दुग्ध धारा का पान करता है, उसे किसी प्रकार कोई कष्ट नहीं रहता ।। आत्मा स्वतः आनंद स्वरूप है ।। आनंद मग्न रहना उसका प्रमुख गुण है ।। दुःखों के हटते और मिटते ही वह अपने मूल स्वरूप में पहुँच जाता है ।। देवता स्वर्ग में सदा आनंदित रहते हैं ।। मनुष्य भी भूलोक में उसी प्रकार आनन्दित रह सकता है, यदि उसके कष्टों का निवारण हो जाए ।। गायत्री कामधेनु मनुष्य के सभी कष्टों का समाधान कर देती

निधियों की प्राप्ति

शौचं शान्तिर्विवेकश्चैतल्लाभ त्रयमात्मिकम् ।।
पश्चादावाप्यते नूनं सुस्थिरं तदुपासकम् ॥

(सुस्थिर) मन को वश में रखने वाले (तदुपरान्त) उस गायत्री के उपासक को (पश्चात्) बाद में (शौचं) पवित्रता (शान्तिः) शान्ति (च) और (विवेकः) विवेक (एतत्) ये (आत्मिकं) आत्मिक (लाभत्रयं) तीन लाभ (नूनं) निश्चय से (अवाप्यते) प्राप्त होते हैं ।।

कार्येषु साहसः स्थैर्यं कर्मनिष्ठा तथैव च ।।
एते लाभाश्चवै तस्माज्यन्तेमानसास्त्रयः ॥

(कार्येषु साहसः) कार्यों में साहस (स्थैर्यं) स्थिरता (तथैव च) और वैसे ही (कार्यनिष्ठा) कार्यनिष्ठा (एते) ये (त्रयः) तीन (लाभाः) लाभ (मानसाः) मन सम्बंधी (सम्मत्वै) उससे (जायन्ते) प्राप्त होते हैं ।।

पुष्कलं धनसमृद्धिः सहयोगश्च सर्वतः ।।
स्वास्थ्यं वा त्रय एतेस्युस्तस्माल्लाभाश्चलौकिकाः ॥

(पुष्कलं) पर्याप्त (धन समृद्धि) धन की समृद्धि (सर्वतः) सब ओर से (सहयोगः) सहयोग (च) और (स्वास्थ्यं वा) स्वस्थता (एते) ये (त्रयः) तीन (लौकिक) सांसारिक (लाभाः) लाभ (तस्मात्) उससे (स्युः) होते हैं ।।

साधारण शारीरिक बल से सम्पन्न व्यक्ति अपने बाहुबल से बड़े- बड़े कठिन कार्य कर डालता है और आश्चर्यजनक सफलतायें प्राप्त कर लेता है, फिर आत्म- बल सम्पन्न व्यक्ति के बारे में तो कहना ही क्या है? शरीर जड़ पदार्थों का बना हुआ है, उसका बल भी जड़ एवं सीमित है ।। यह सीमा इतनी छोटी है कि पशु- पक्षी और छोटे दर्जे के जीव- जन्तु भी इस दृष्टि से बलवान मनुष्य की अपेक्षा अधिक बलवान होते हैं, कुत्ते की सी प्राणशक्ति, हिरन की- सी चौकड़ी, बैल जैसी मजबूती, सिंह जैसी वीरता, मनुष्य में कहाँ होती है? और मछली की तरह जल में तथा पक्षियों की तरह हवा में वह आवागमन कहा कर सकता है? फिर भी मनुष्य सब प्राणियों से श्रेष्ठ- सृष्टि का मुकुटमणि बना बैठा है ।। इसका कारण उसका आत्मिक बल ही है ।।

यह आत्मिक बल, गायत्री तत्व को अधिक मात्रा में धारण करने से प्राप्त होता है ।। इस धारणा के और भी अनेक उपाय हैं जिनके द्वारा संसार के महापुरुषों ने अपने को आत्मिक बल से सम्पन्न बनाकर बड़े- बड़े पुरुषार्थ किये हैं, उन अनेक उपायों में से एक सर्व सुलभ उपाय अध्यात्म विद्या के पारंगत आचार्यों ने ढूँढ़ निकाला है ।। उस उपाय का नाम है- गायत्री साधना ।। इस साधना से आत्मा में सात्त्विक चैतन्यता की मात्रा बढ़ती जाती है, फलस्वरूप जीवन की सभी दिशाओं में उसका प्रगति- परिचय मिलने लगता है ।।

जब शरीर में रक्त बढ़ता है तो हाथ, पाँव, छाती, नाक, गाल, ओठ सभी चैतन्यता, पुष्टि और लालिमा दृष्टिगोचर होने लगती है ।। जब कमरे में प्रकाश जलता है तो सभी खिड़कियों में से उसकी रोशनी बाहर निकलती है ।। आत्मा में जब बल बढ़ता है तो वह भी कई दिशाओं में उत्साहवर्धक ढंग से प्रगट होता है ।।

जीवन की प्रमुख दिशाएँ तीन होती हैं (1)आत्मिक (2) बौद्धिक, (3) सांसारिक ।। इन तीनों दिशाओं में आत्म- बल बढ़ने से आनन्ददायक परिणाम प्राप्त होते हैं ।। इन तीनों दिशाओं में तीन- तीन लक्षण ऐसे दिखाई पड़ते हैं जिनसे जीवन सर्व सुखी बन जाता है ।। इन नौ सम्पदाओं को नव निद्धि भी कह सकते हैं ।। सिद्धियाँ देवताओं को प्राप्त होती हैं, ऋद्धियाँ असुरों को मिलती हैं और निधियाँ मनु की सन्तान मानव प्राणी को प्राप्त होती है ।।

आत्मिक क्षेत्र की तीन निधियाँ (1)विवेक, (2) पवित्रता (3)शान्ति हैं ।। बौद्धिक क्षेत्र की और सांसारिक क्षेत्र की तीन निधियाँ (1) साहस, (2)स्थिरता, (3)कर्त्व्यनिष्ठा हैं और सांसारिक क्षेत्र की तीन निधियाँ (1)स्वास्थ्य ,, (2)समृद्धि, (3)सहयोग हैं ।। यह नौ लक्षण जीवन की सफलता के हैं ।। इन्हीं नौ गुणों को ब्राह्मण के नव गुण बताया है ।। भगवान् रामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ने पर क्रुद्ध परशुराम जी से उनके नव गुणों की प्रशंसा करके उन्हें प्रसन्न किया था ।।