सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायधीशों की नियुक्ति के लिये पुराने कालेजियम प्रणाली को बहाल क्यों किया

सर्वोच्य न्यायालय ने न्यायधीशों की नियुक्ति के लिये पुराने कालेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में संविधान के 99वें संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए इसे निरस्त कर दिया और उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को केंद्र सरकार के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है.

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर, न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की संविधान पीठ ने एक ‘सामूहिक आदेश’ में कहा कि संविधान का 99वां संशोधन और एनजेएसी अधिनियम असंवैधानिक है.

गौरतलब है कि संविधान का 99वां संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित 1993 की कॉलेजियम प्रणाली के स्थान पर लाया गया था.

न्यायालय ने कहा, “सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों एवं न्यायाधीशों के स्थानांतरण से संबंधित जो प्रणाली संविधान संशोधन से पूर्व थी, वही बरकार रहेगी.”

सर्वोच्च न्यायालय ने बार से कॉलेजियम प्रणाली में सुधार के लिए सुझाव मांगे हैं, जिसकी सुनवाई तीन नवंबर को होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम व्यवस्था बहाल कर अधिकांश राजनीतिज्ञों व राजनीतिक दलों की मंशा पर पानी फेर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने संसद और 20 विधानसभाओं से एक सुर में पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया।

एनजेएसी से सुप्रीम कोर्ट को एतराज क्यों?

संविधान के संशोधित अनुच्छेद 124ए (1) के ए और बी प्रावधानों में जजों की नियुक्ति की व्यवस्था करने वाले एनजेएसी में न्यायिक सदस्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी में कानून मंत्री को शामिल करना संविधान में दिए गए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ माना। कोर्ट ने एनजेएसी में दो प्रबुद्ध नागरिकों को शामिला किया जाना भी संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन माना है।

सुप्रीम कोर्ट का ये है फैसला

– सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला बड़ी पीठ को भेजने और कोलेजियम व्यवस्था के पूर्व फैसलों पर पुनर्विचार की सरकार की मांग रद्द कर दी।

– 99वें संविधान संशोधन कानून 2014 को अंसवैधानिक और शून्य घोषित किया।

– राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून-2014 को असंवैधानिक और शून्य घोषित किया।

– सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की कोलेजियम व्यव्सथा को बहाल कर दिया।

– वर्तमान कोलेजियम व्यवस्था में सुधार की संभावनाओं पर 3 नवंबर को सुनवाई

क्या है कोलेजियम व्यवस्था?

कोलेजियम पांच लोगों का समूह है। इन पांच लोगों में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज है। कोलेजियम द्वारा जजों के नियुक्ति का प्रावधान संविधान में कहीं नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों की कमेटी (कोलेजियम) नियुक्ति व तबादले का फैसला करती है। कोलेजियम की सिफारिश मानना सरकार के लिए जरूरी होता है। यह व्यवस्था 1993 से लागू है।

कोलेजियम प्रणाली सुप्रीम कोर्ट की दो सुनवाई का नतीजा है। पहला 1993 का और दूसरा 1998 का है। कोलेजियम बनाने के पीछे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की मानसिकता सुप्रीम कोर्ट की रही। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति के लिए संविधान में निहित प्रावधानों को दुबारा तय किया और जजों के द्वारा जजों की नियुक्ति का अधिकार दिया।

कोलेजियम किसी व्यक्ति के गुण-कौशल के अपने मूल्यांकन के आधार पर नियुक्ति करता है और सरकार उस नियुक्ति को हरी झंडी दे देती है।

ये कॉलेजियम है क्या?

  • देश की अदालतों (सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट) में जजों की नियुक्ति की प्रणाली को ‘कॉलेजियम सिस्टम’ कहा जाता है.
  • 1993 से लागू इस सिस्टम के जरिए ही जजों के ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन का फैसला होता है.
  • कॉलेजियम 5 लोगों का एक समूह है. इसमें भारत के चीफ जस्टिस समेत सुप्रीम कोर्ट के 4 सीनियर जज मेंबर हैं. सीनियर जज जे चेल्मेश्वर इसी समूह में मेंबर हैं.
  • कॉलेजियम के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एआर दवे, न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा हैं.
  • कॉलेजियम कथित तौर पर व्यक्ति के गुण-कौशल का मूल्यांकन करता है और उसकी नियुक्ति करता है. फिर सरकार उस नियुक्ति को हरी झंडी दे देती है.
  • इस सिस्टम को नया रूप देने के लिए एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग (NJAC) बनाया था. यह सरकार द्वारा प्रस्तावित एक संवैधानिक संस्था थी, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया.
  • NJAC में 6 मेंबर रखने का प्रस्ताव था, जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के साथ SC के 2 वरिष्ठ जज, कानून मंत्री और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं 2 जानी-मानी हस्तियों को बतौर सदस्य शामिल करने की बात थी.
  • लेकिन इसे यह कहकर रद्द किया गया कि जजों के सिलेक्शन और अपॉइंटमेंट का नया कानून गैर-संवैधानिक है. इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा.

 

सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम व्यवस्था फिर बहाल कर दी है लेकिन यह अभी भी सवालों के घेरे में है। इसमें सुधार की जरूरत है। ये बात सुप्रीम कोर्ट भी जानता है और इसीलिए कोर्ट ने कोलेजियम व्यवस्था में सुधार पर विचार का मन बनाया है। इस बाबत उसने सरकार व अन्य पक्षों से सुझाव मांगे है। 3 नवंबर को मामले पर सुनवाई होगी।

उधर, केंद्रीय कानून मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा ने शुक्रवार को इस पर कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम ने जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व किया, क्योंकि लोकसभा एवं राज्यसभा के 100 फीसदी सदस्यों ने इसे समर्थन दिया.

गौड़ा ने संवाददाताओं से कहा, “जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व संसद के माध्यम से किया जाता है. हमने जन इच्छा का सम्मान किया. राज्यसभा एवं लोकसभा के 100 फीसदी सदस्यों ने इसे समर्थन दिया.”

सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग गठित करने के लिये बनाया गया कानून और इससे संबंधित 99वां संविधान संशोधन सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा निरस्त किये जाने के बावजूद यह अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है। संसद द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का प्रावधान करने संबंधी कानून और 99वें संविधान संशोधन की संवैधानिकता को न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अक्तूबर, 2015 में असंवैधानिक करार दिया था।
इस संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार देने के निर्णय के समय से ही संविधान संशोधन की वैधता जैसे मुद्दों पर सुनवाई करने वाली संविधान पीठ में न्यायाधीशों की संख्या को लेकर दबे स्वर में चर्चा चल रही थी।
इसी बीच, संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान आनंद शर्मा की अध्यक्षता वाली कार्मिक, लोक शिकायत और विधि एवं न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति द्वारा पेश रिपोर्ट में राय व्यक्त की गयी है कि किसी भी संविधान संशोधन की वैधता से जुड़े मामलों की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की कम से कम 11 सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ को करनी चाहिए।  संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की है कि संविधान के निर्वचन से जुड़े मामलों की सुनवाई भी सर्वोच्च न्यायालय के कम से कम सात न्यायाधीशों की पीठ को ही करनी चाहिए। समिति ने रिपोर्ट में इस बात का विशेष रूप से जिक्र किया है कि 99वां संविधान संशोधन अधिनियम लोक सभा ने सर्वसम्मति से तथा राज्यसभा ने लगभग सर्वसम्मति, एक विसम्मति, वोट से पारित किया था। इस अधिनियम को सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के आधार से खारिज कर दिया। संविधान संशोधन और संविधान निर्वचन की वैधता से संबंधित मामले की सुनवाई करने वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ के सदस्य न्यायाधीशों की संख्या 11 और 7 करने के संबंध में समिति ने अपने तर्क भी दिये हैं। समिति ने रिपोर्ट में इस तथ्य को नोट किया, ‘‘संविधान के अधिनियमन के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या केवल सात थी और संविधान के तहत संविधान के निर्वाचन से जुड़े किसी मामले के विनिर्णय अथवा अनुच्छेद 143 के तहत संदर्भित मामले में न्यूनतम पांच न्यायाधीशों वाली न्यायपीठ का गठन होता था। ’’  रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘‘अब जबकि न्यायाधीशों की संख्या 31 हो गयी है तो समिति की राय है संविधान संशोधन की वैधता से जुड़े मामलों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यूनतम 11 सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुना जाना चाहिए।’’
यह सही है कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों के लिए आयोग गठित करने संबंधी कानून और संविधान संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई की थी। इस संविधान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के इरादे से सरकार को इससे संबंधित प्रक्रिया के लिए ज्ञापन तैयार करने का निर्देश दिया था जिसे वर्तमान प्रक्रिया में पूरक का काम करना था। यही नहीं,  न्यायालय ने सरकार को प्रधान न्यायाधीश की सलाह से ही न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मौजूदा प्रक्रिया के ज्ञापन को अंतिम रूप देने का भी निर्देश दिया था। इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में कोलेजियम के मार्ग-निर्देशन के लिये पात्रता का आधार और न्यूनतम आयु का निर्धारण, नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता के बारे में सुझाव, सचिवालय की व्यवस्था और शिकायतों के निदान की व्यवस्था करना आदि शामिल थे। लेकिन सरकार द्वारा भेजे गये प्रक्रिया ज्ञापन को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
यह प्रक्रिया ज्ञापन प्रधान न्यायाधीश के पास अगस्त से लंबित है। एक अवसर पर निर्वतमान प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर ने गत वर्ष सितंबर में दावा किया था कि सरकार के साथ इस मामले में सारे मतभेद दो सप्ताह के भीतर सुलझा लिये जायेंगे।
समिति इस बात पर व्यथित थी, ‘‘प्रक्रिया ज्ञापन को अंतिम रूप दिये जाने के संबंध में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच गतिरोध बना हुआ है और इसके परिणामस्वरूप संवैधानिक न्यायालयों में रिक्त पदों को भरने में देरी हो रही है और न्याय प्रशासन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।’’
यही नहीं, रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘समिति आशा करती है कि दोनों पक्ष व्यापक लोकहित के मद्देनजर जल्द ही अपने गतिरोध को दूर कर लेंगे तथा न्याय प्रशासन को इससे प्रभावित नहीं होने देंगे।’’
चूंकि संसदीय समिति की यह सिफारिश राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग से संबंधित 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित करने के सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले के संदर्भ में की है, इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रकरण से जुड़े अब तक के अन्य मसलों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।  विदित हो कि न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मुद्दे का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामले में न्यायमूर्ति एस आर पांडियन की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय के सात न्यायाधीशों की पीठ ने अक्टूबर 1993 में ही अपना फैसला सुनाया था। इस पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति ए एम अहमदी,  न्यायमूर्ति जे एस वर्मा, न्यायमूति एम एम पुंछी, न्यायमूर्ति योगेश्वर दयाल, न्यायमूर्ति जी एन रे और न्यायमूर्ति डा ए एस आनंद शामिल थे। इस प्रकरण में आई व्यवस्था को न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के द्वितीय निर्णय के रूप में जाना जाता है।
इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन राष्टपति के माध्यम से सरकार ने इससे जुड़े कुछ सवालों पर संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत 23 जुलाई 1998 को सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी थी। न्यायमूर्ति एस पी भरूचा की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने 28 अक्टूबर, 1998 को इन सवालों पर अपनी राय दी थी। इस संविधान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया के संबंध में नौ बिन्दुओं को प्रतिपादित किया था।
राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के पास राय के लिये भेजे गये सवालों पर विचार करके राय देने के लिये गठित इस नौ सदस्यीय संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एम मुखर्जी, न्यायमूर्ति एस मजमूदार, न्यायमूर्ति सुजाता वी मनोहर, न्यायमूर्ति जी नानावती, न्यायमूर्ति एस एस अहमद,  न्यायमूर्ति के वेंकटस्वामी, न्यायमूर्ति बी एन किरपाल और न्यायमूर्ति जी पटनायक शामिल थे। इन फैसलों के परिप्रेक्ष्य में संविधान संशोधन और संविधान निर्वचन की वैधता से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ के सदस्य न्यायाधीशों की संख्या के बारे में संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में की गयी यह सिफारिश महत्वपूर्ण है।
अब देखना यह है कि संविधान संशोधन और संविधान निर्वाचन की वैधता से संबंधित मामले की सुनवाई 11 न्यायाधीशों की पीठ और सात सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ द्वारा करने संबंधी सिफारिश के साथ संसद में पेश संसदीय समिति की रिपोर्ट पर सरकार क्या दृष्टिकोण अपनाती है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई से दो दिन पहले केंद्र सरकार ने सोमवार को उच्च न्यायपालिका में सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में विवादास्पद कानून को आज लागू कर दिया। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) और संविधान संशोधन अधिनियम (99वां संशोधन अधिनियम) को आज से प्रभावी बनाने वाली अधिसूचना विधि मंत्रालय में न्याय विभाग द्वारा जारी की गई। सवाल है क्या इससे न्याय व्यवस्था में सुधार होगा…

न्यायाधीशों के चयन में कॉलेजियम प्रणाली के कामकाज पर उच्चतम न्यायालय के एक वरिष्ठ न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर की तीखी आलोचना के मद्देनजर भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने शनिवार को कहा, “हम इसे सुलझा लेंगे.”

न्यायमूर्ति ठाकुर की संक्षिप्त प्रतिक्रिया उस वक्त आई जब उनसे कॉलेजियम की बैठकों में भाग लेने से न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर के इनकार के बारे में पूछा गया था जिन्होंने इस आधार पर बैठक में भाग लेने से मना किया था कि कॉलेजियम एक ‘अस्पष्ट’ और ‘अपारदर्शी’ तरीके से काम कर रहा है.

न्यायाधीशों के चयन की कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की आलोचना सामने आने के एक दिन बाद सीजेआई ने कहा, “हम इसे सुलझा लेंगे.” यहां नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) के दीक्षांत समारोह में शामिल हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं कहा.

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय न्यायाधीशों की कॉलेजियम में शामिल और पांचवें सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति चेलामेश्वर कॉलेजियम की बैठक में नहीं आए जो गुरूवार को होनी थी. कॉलेजियम के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एआर दवे, न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा हैं.

न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने न्यायमूर्ति ठाकुर को एक पत्र भी लिखकर कॉलेजियम की बैठकों में भाग लेने में अनिच्छा व्यक्त करते हुए इसके कई आधार बताये थे जिनमें यह भी शामिल है कि कॉलेजियम ‘अस्पष्ट’ और ‘अपारदर्शी’ तरीके से काम कर रहा है. न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की अनुपस्थिति की वजह से कॉलेजियम की बैठक रद्द कर दी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून को असंवैधानिक करार दिया।

इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट तथा 24 हाई कोर्टों में जजों की नियुक्ति तथा तबादले की दो दशक से भी पुरानी “कॉलेजियम व्यवस्था” फिर से बहाल हो गई है। इसी के साथ जजों की नियुक्ति और तबादलों में सरकार भूमिका भी खत्म हो गई है।

 सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को रद किया

संसद ने 1993 से लागू कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने के लिए पिछले साल एनजेएसी कानून पारित किया था। न्यायमूर्ति जेएस खेहर, जे. चेलमेश्वर, एमबी लोकुर, कुरियन जोसेफ तथा एके गोयल की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एनजेएसी कानून को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया।

साथ ही कॉलेजियम व्यवस्था के बदले नई व्यवस्था के लिए 99वें संविधान संशोधन को भी असंवैधानिक करार दिया। पीठ ने उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति के बाबद सुप्रीम कोर्ट के 1993 तथा 1998 के फैसलों को समीक्षा के लिए बड़ी पीठ को भेजने का सरकार का आग्रह भी ठुकरा दिया।

आइए समझते हैं कि आखिर यह कॉलेजियम प्रणाली क्‍या है:

  • देश की अदालतों में जजों की नियुक्ति की प्रणाली को कॉलेजियम व्‍यवस्‍था कहा जाता है।
  • 1990 में सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों के बाद यह व्‍यवस्‍था बनाई गई थी। कॉलेजियम व्‍यवस्‍था के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश के नेतृत्‍व में बनी सीनियर जजों की समिति जजों के नाम तथा नियुक्ति का फैसला करती है।
  • सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
  • हाईकोर्ट के कौन से जज पदोन्‍नत होकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है।
  • कॉलेजियम व्‍यवस्‍था का उल्‍लेखन न तो मूल संविधान में है और न ही उसके किसी संशोधन में

1. एनजेएसी (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग) सरकार द्वारा प्रस्तावित एक संवैधानिक संस्था है, जिसे जजों की नियुक्ति के कॉलेजियम सिस्टम की जगह लेने के लिए बनाया गया था. वहीं, कॉलेजियम सिस्टम के जरिये पिछले 22 साल से जजों की नियुक्ति की जा रही है.

2. एनजेएसी में 6 सदस्यों का प्रस्ताव था. देश के चीफ जस्टिस को इस कमिशन का प्रमुख बनाने की बात कही गई थी. इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2 वरिष्ठ जजों, कानून मंत्री और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं 2 जानी-मानी हस्तियों को बतौर सदस्य शामिल करने की बात थी.

3. कॉलेजियम सिस्टम में चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों का एक फोरम जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है.

4. संविधान में कॉलेजियम सिस्टम का कहीं जिक्र नहीं हैं. यह सिस्टम 28 अक्टूबर 1998 को 3 जजों के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के जरिए प्रभाव में आया था.

5. एनजेएसी में जिन 2 हस्तियों को शामिल किए जाने की बात कही गई थी, उनका चुनाव चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता या विपक्ष का नेता नहीं होने की स्थिति में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता वाली कमिटी करती. इसी पर सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा ऐतराज था.

6. एनजेएसी को चुनौती देने वाले लोगों ने दलील दी थी कि जजों के सिलेक्शन और अपॉइंटमेंट का नया कानून गैरसंवैधानिक है. इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा. वहीं केन्द्र ने इसका बचाव करते हुए कहा था कि 20 साल से ज्यादा पुराने कॉलेजियम सिस्टम में कई खामियां थीं.

कॉलेजियम सिस्टम पर चल रही बहस के दो छोर हैं। एक का दावा है कि हमारे देश के सर्वशक्तिमान न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार कुछ न्यायाधीशों के पास केवल इसलिए रहना चाहिए, क्योंकि वे न्यायपालिका परिवार का हिस्सा होने के कारण उनके बारे में बेहतर समझ रखते हैं। दूसरा छोर कहता है कि उसमें आम जनता के नुमाइंदों की भी भागीदारी होनी चाहिए, क्योंकि न्यायाधीश केवल न्यायपालिका के ही नहीं, बल्कि पूरे समाज कि हितरक्षक होते हैं और उनकी नियुक्ति प्रक्रिया में आम जनता की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को स्वर मिलना चाहिए।

राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की सिफारिशों से जुड़ी व्यवस्था को रद्द करने के लिए तीन कारण दिए गए। पहला, यह कि न्यायिक नियुक्तियों में गैरन्यायिक सदस्यों के होने के कारण न्यायपालिका के लोग अल्पमत में आ जाएंगे, जिससे न्यायिक सर्वोच्चता बरकरार नहीं रह पाएगी। दूसरा, यह कि इस प्रकार की नई व्यवस्था की वजह से न्यायिक स्वतंत्रता को चोट पहुंचेगी जो संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करेगी और तीसरा, यह कि न्यायिक परिवार की जरूरतों के बारे में न्यायपालिका के लोगों के पास ही समुचित जानकारी और समझ होती है जिससे अन्य लोगों के आने पर उस प्रक्रिया की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
शुरू में इस तरह का कोई विवाद नहीं था। संविधान में यह अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है। अनुच्छेद 124 और 217 में राष्ट्रपति से जरूर यह अपेक्षा की गई थी कि वह न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय देश के मुख्य न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीशों और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय वहां के राज्यपाल से भी मशविरा करें। तमाम दूसरे लोकतांत्रिक देशों में भी न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के पास ही है। अमेरिका में तो इसे और भी अधिक पारदर्शी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के चयन को सीनेट में मंजूरी के लिए भेजे जाने से पहले जन सुनवाई जैसी व्यवस्था है। इस प्रक्रिया में न्यायाधीश के रूप में संस्तुत किए गए व्यक्ति के बारे में उपलब्ध सभी पहलू न्यायिक समिति के सामने लाए जाते हैं। उसकी पृष्ठभूमि की व्यापक छानबीन होती है। उन पर व्यापक चर्चा होती है इसलिए चूक की गुंजाइश नहीं रह जाती।
1993 से पहले हमारे यहां भी इस विषय पर कोई विवाद नहीं था। इस साल सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स आन रिकार्ड बनाम भारत संघ के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के मामले में न्यायपालिका की राय को सर्वोच्चता देने की बात कही। नौ न्यायाधीशों की पीठ ने मत व्यक्त किया कि न्यायाधीश चूंकि न्यायिक परिवार का हिस्सा होता है इसलिए उसके बारे में जितनी समझ न्यायाधीशों को होती है, उतनी दूसरों को नहीं हो सकती। इसलिए उसकी नियुक्ति और स्थानांतरण से जुडेÞ विषयों पर न्यायपालिका को ही निर्णय लेना चाहिए। इसे अंजाम देने के लिए न्यायाधीशों के एक कॉलेजियम की परिकल्पना की गई, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य वरिष्ठ न्यायधीश हों। संविधान पीठ के कुछ न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में न्यायिक स्वायत्ततता और निष्पक्षता के लिए इस कदम को जरूरी बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने वरिष्ठ साथियों के कॉलेजियम की मदद से इसे अंजाम देंगे। इस मुकदमें में, चूंकि, कॉलेजियम के न्यायाधीशों की संख्या और सहयोगियों न्यायाधीशों की भूमिका के बारे में बहुत कुछ साफ नहीं था इसलिए इसके क्रियान्वयन में शुरू से ही व्यावहारिक दिक्कतें आने लगीं।
कॉलेजियम सिस्टम की विश्वसनीयता को पहला झटका तब लगा जब इसकी शुरूआत के साथ ही इस पर विवाद शुरू हो गया। धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि कॉलेजियम के नाम पर मुख्य न्यायाधीश मनमाना फैसले ले रहे हैं। अन्य न्यायाधीशों की राय को तरजीह नहीं देने की बातें भी सामने आने लगीं, लेकिन सब कुछ इतना गोपन था कि इस पर स्वस्थ बहस नहीं हो सकी। यह सब कुछ उस समय सतह पर आ गया जब 1998 में मुख्य न्यायाधीश मदन मोहन पुंछी ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मनमाने ढंग से अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को भेज दीं। सरकार ने उसे रोक लिया और कॉलेजियम और मुख्य न्यायाधीश के संबंध में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी। नौ सदस्यीय संविधान पीठ की ओर से न्यायमूर्ति एसपी भरूचा ने कॉलेजियम व्यवस्था को विस्तार से परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि उसमें मुख्य न्यायाधीश के अलावा चार वरिष्ठ न्यायाधीश होंगे, निर्णय यथासंभव सर्वानुमति से लिया जाए और किसी नाम पर अगर कॉलेजियम के दो सदस्य असहमत हों तो उसका नाम नहीं भेजा जाएगा। सैद्धांतिक रूप से यह व्यवस्था अब तक कायम है।
कॉलेजियम व्यवस्था शुरू होने के बाद से समाज में व्यापक बदलाव आया है। समाज पारदर्शिता के प्रति आग्रही हो गया है और अब अपने आसपास के घटनाक्रमों पर बारीकी से नजर रख रहा है। मीडिया की व्यापकता ने छोटी-छोटी बातों तक भी समाज की पैठ बना दी है। दुर्भाग्यवश इस बीच न्यायाधीशों की सत्यनिष्ठा पर अंगुली उठी है। दो मामले में तो मामला महाभियोग तक भी पहुंच चुका है। कम से कम पैंतीस छोटे-बड़े मामलों में न्यायाधीशों की भूमिका सार्वजनिक तौर पर सवालों के घेरे में रही है। अवमानना कानून को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की खबरें अब आम होती जा रही हैं। ऐसे माहौल में कॉलेजियम सिस्टम की साख पर अंगुली उठना इसलिए लाजिमी है कि क्योंकि यह अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहा है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अगर कॉलेजियम सिस्टम के बावजूद न्यायाधीशों की सत्यनिष्ठा पर गंभीर आरोप लग रहे हैं तो उस पर पुनर्विचार क्यों न किया जाए। ऐसी परिस्थिति में संविधान में संशोधन करके राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना को हरी झंडी दी गई, जिसे न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और अन्य प्रशासनिक मामलों को निपटाने का अधिकार दिया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। इस निर्णय को देते समय सुप्रीम कोर्ट को कॉलेजियम सिस्टम में अंतर्निहित खामियों का अंदाज था, इसलिए उन्होंने इस व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव मांगा है, जिसकी सुनवाई चल रही है।
न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि अपनी कमियों को दूर करने के लिए सुझाव मांगा है सुप्रीमकोर्ट ने। मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह गोपनीयता के अंधेरे में काम करता है। ऐसे देश में जहां पर पारदर्शिता की संस्कृति विकसित करने में न्यायपालिका की सबसे बड़ी भूमिका रही हो, न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसे अहम मामले में सब कुछ गोपनीय रखने के प्रति उसका आग्रही होना समझ से परे है। हमारे देश में न्यायाधीशों को बहुत महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। वे नागरिक अधिकारों के प्रहरी हैं। देश भर से चुन कर आए सांसदों द्वारा पारित कानून पर एक न्यायाधीश रोक लगा सकता है। देश के करोड़ों लोग अपनी परेशानी के क्षणों में अदालतों पर भरोसा करते हैं। बाढ़, सूखा और महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी आम आदमी को अदालतों ने राहत पहुंचाई है। ऐसे में न्यायाधीश अब केवल न्यायपालिका के परिवार का सदस्य मात्र नहीं है। वे करोड़ों लोगों के भरोसे के केंद्र भी हंै। इसलिए उनकी नियुक्ति को न्यायपालिका का आंतरिक मामला नहीं माना जा सकता। न्यायालय की प्रतिष्ठा उसके किसी भी इकाई की प्रतिष्ठा से बहुत बड़ी है और न्यायालय की प्रतिष्ठा तब बढ़ेगी जब उसमें अच्छे लोगों की नियुक्ति होगी।
1993 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार अपने हाथ में लेते हुए यह कहा था कि न्यायाधीश न्यायिक परिवार के हिस्सा होते हैं, इसलिए उनकी नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित मामलों में निर्णय लेने का अधिकार न्यायालय के पास होना चाहिए। उस समय से अब तक देश की नदियों में बहुत पानी बह चुका है समाज की सोच में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है आम आदमी के सुख-दुख को आत्मसात करके उन्हें राहत पहुंचाने वाले न्यायाधीश को केवल न्यायिक परिवार का हिस्सा बताकर हम उसकी प्रतिष्ठा को कम करते हैं। ऐसा करके हम इस सोच को भी बढ़ावा देते हैं कि वह न्यायिक परिवार का हिस्सा होने के कारण केवल उसी के प्रति जवाबदेह है। समाज इसे अब मानने को तैयार नहीं है। आम जनता यह मानती है कि न्यायाधीश इस देश के पूरे समाज का हिस्सा हैं। वे भारत के लोगों का गौरव हंै। इसलिए अब समय आ गया है कि हम उसकी नियुक्ति और स्थानांतरण जैसे महत्त्वपूर्ण मामलों को न्यायिक परिवार के सीमित दायरे से बाहर निकालकर उसमें आम लोगों को भागीदार बनाएं। इसके लिए कॉलेजियम व्यवस्था की निर्णय प्रक्रिया में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति से पहले उनकी पृष्ठभूमि के व्यापक छानबीन की जरूरत है। इसमें अमेरिका के अनुभवों से हम सीख सकते हैं। वहां पर न्यायाधीश के रूप में नामित किए जाने वाले व्यक्ति को सार्वजनिक कर दिया जाता है। सीनेट की न्यायिक समिति देश के आम और खास लोगों से उस व्यक्ति के बारे में जानकारी मांगती है। लोगों को अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है। तय समय सीमा के अंदर उस पर विचार करके निर्णय होता है और इस तरह से असंदिग्ध सत्यनिष्ठा वाले व्यक्ति को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने का मौका मिलता है। कॉलेजियम सिस्टम भी जरूरत के मुताबिक संशोधन करके इस व्यवस्था को अपना सकता है।

कॉलेजियम सिस्टम के सामने दूसरी चुनौती यह होगी कि वह न्यायाधीशों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करे? संविधान में न्यायाधीशों की छोटी-मोटी गलतियों की कोई सजा नहीं होती है। उन पर या तो महाभियोग लग सकता है या कुछ भी नहीं हो सकता है। महाभियोग की कार्यवाही इतनी जटिल और संवैधानिक व्यवहारिकता के लिहाज से इतनी मुुश्किल है कि वह संभव नहीं हो पाता। इसलिए न्यायाधीशों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है।
अपने भीतर के ही भ्रष्ट लोंगो को अनुशासित रखने के मामले में हमारी न्यायपालिका के नाम कोई गौरवगाथा फिलहाल नहीं जुड़ पाई है। दूसरों की गलतियों के लिए कठोरतम सजा देने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करना आसान नहीं है। प्राविडेंट फंड घोटाले के अभियुक्तों के खिलाफ प्राथमिकी इसलिए दर्ज नहीं हो सकी क्योंकि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने अनुमति ही नहीं दी। जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ आपराधिक दुर्विनियोग के साबित आरोपों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। जस्टिस निर्मल यादव के ऊपर तो चार्जशीट तक दाखिल हो गई, लेकिन कार्रवाई का अभी तक इंतजार है। मुख्य न्यायाधीश बालकृष्णन ने उनका स्थानांतरण करके अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली। इसी तरह कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दिनाकरन भी उन लोगो में से हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुष्ट आरोपों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। शायद यही कारण है कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल ने जब अदालतों में भ्रष्टाचार पर सर्वेक्षण कराया तो सतहत्तर प्रतिशत लोगों ने माना न्यायापालिका में भ्रष्टाचार है। यह चिंता का विषय है क्योंकि इस चुनौती से निपटने की दिशा में कोई पहल नहीं हो पा रही है।
दुर्भाग्यवश न्यायपालिका के संबंध में एक गलतफहमी बढ़ती जा रही है कि वह अवमानना कानून को ढाल बनाकर अपनी कमियों को छिपाए रहती है। आवाज उठाने वालों के खिलाफ उसका हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है। गलती के बावजूद उसका कुछ बाल बांका नहीं होता। आम आदमी को देखकर आश्चर्य होता है कि जिस अपराध के लिए देश के सामान्य लोगों को वर्षों जेल में सड़ना पड़ता है और उनकी जमानत भी नहीं हो पाती है, उसी तरह के मामलों में न्यायमूर्ति सौमित्रसेन जैसे लोग केवल इस्तीफा देकर कैसे बरी हो जाते हैं? किसी दोषी या आरोपित न्यायाधीश को सजा क्यों नहीं होती? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से आधे से अधिक को भ्रष्टाचारी बताने वाले अधिवक्ता और पूर्वकानून मंत्री शांतिभूषण के आरोप की जांच आज तक नहीं हो पाई!