“निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है” भारतीय नागरिकों, लोकतंत्र की बहूत बड़ी जीत

सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्य संविधान पीठ ने एकमत लैंडमार्क ऐतिहासिक फैसले में कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान से जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूरे भाग तीन का स्वाभाविक अंग है,
सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्य संविधान पीठ ने सरकार की दलील और पूर्व के दोनों निर्णय ख़ारिज करते हुए कहा कि “निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है” और यह सम्मान से जीने के अधिकार अनुच्छेद 21 में सम्मिलित है, जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते हैं. ये वो अधिकार हैं जो मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं. ये अधिकार संविधान ने गढ़े नहीं हैं बल्कि संविधान ने इन्हें मान्यता दी है.
प्राइवेसी के अधिकार को संविधान संरक्षण देता है और यह जीवन और निजी स्वतंत्रता की गारंटी से पैदा होता है. प्राइवेसी का अधिकार, स्वतंत्रता और सम्मान की गारंटी देने वाले संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों से भी मिलता है. जीवन और स्वतंत्रता संविधान ने नहीं दी है बल्कि केवल इन अधिकारों में राज्य के दख़ल देने की सीमा तय की है.
सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्य संविधान पीठ ने कहा कि प्राइवेसी के संवैधानिक अधिकार को क़ानूनी मान्यता देना संविधान में कोई बदलाव करना नहीं है. और न ही कोर्ट कोई ऐसा संवैधानिक काम कर रहा है जो संसद की ज़िम्मेदारी थी.
प्राइवेसी की बुनियाद में निजी रुझानों या झुकाव को बचाना, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, शादी, बच्चे पैदा करना, घर और यौन रुझान जैसी चीजें शामिल हैं. एकांत में अकेले रहने का अधिकार भी प्राइवेसी है. प्राइवेसी किसी व्यक्ति की निजी स्वायत्ता की सुरक्षा करती है और ज़िंदगी के हर अहम पहलू को अपने तरीके से तय करने की आज़ादी देती है. अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर हो तो ये इसका मतलब प्राइवेसी का अधिकार ख़त्म हो जाना या छोड़ देना नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि संविधान अनुच्छेद 21 के तहत जिन मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है, प्राइवेसी कोई अपने आप में पूर्ण अधिकार नहीं है. प्राइवेसी की सरहद लांघने वाले किसी भी क़ानून को वाजिब, सही और तर्कसंगत होना होगा.
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि प्राइवेसी के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू हैं. नकारात्मक पहलू राज्य को नागरिकों के जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करने से रोकता है. और सकारात्मक पहलू राज्य पर इसके संरक्षण की ज़िम्मेदारी देता है.
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि सूचना की निजता प्राइवेसी के अधिकार का ही एक चेहरा है. प्राइवेसी को न केवल सरकार से ख़तरा है बल्कि गैरसरकारी तत्वों से भी ख़तरा है.हम सरकार से ये सिफारिश करते हैं कि डेटा प्रोटेक्शन के लिए कड़ी व्यवस्था की जाए.

प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसले में कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान पूर्ण जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूरे भाग तीन का स्वाभाविक अंतरनिहित अंग है. पीठ के सभी नौ सदस्यों ने एक स्वर में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया. इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आया यह फैसला विभिन्न जन-कल्याण कार्यक्रमों का लाभ उठाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा आधार कार्ड को अनिवार्य करने को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा हुआ है.

कुछ याचिकाओं में कहा गया था कि आधार को अनिवार्य बनाना उनकी निजता के अधिकार का हनन है. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति जे चेलामेर, न्यायमूर्ति एसए बोबड़े, न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति एएम सप्रे, न्यायमूर्ति डीवाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं. इससे पहले, प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इस सवाल पर तीन सप्ताह के दौरान करीब छह दिन तक सुनवाई की थी कि क्या निजता के अधिकार को संविधान में प्रदत्त एक मौलिक अधिकार माना जा सकता है. यह सुनवायी दो अगस्त को पूरी हुई थी. सुनवाई के दौरान निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने के पक्ष और विरोध में दलीलें दी गईं.

इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल, अतिरक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वश्री अरविंद दातार, कपिल सिब्बल, गोपाल सुब्रमण्यम, श्याम दीवान, आनंद ग्रोवर, सीए सुंदरम और राकेश द्विवेदी ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल करने या नही किए जाने के बारे में दलीलें दीं और अनेक न्यायिक व्यवस्थाओं का हवाला दिया था. निजता के अधिकार का मुद्दा केंद्र सरकार की तमाम समाज कल्याण योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए आधार को अनिवार्य करने संबंधी केंद्र सरकार के कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उठा था.

शुरू में तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सात जुलाई को कहा था कि आधार से जुड़े सारे मुद्दों पर वृहद पीठ को ही निर्णय करना चाहिए और प्रधान न्यायाधीश इस संबंध में संविधान पीठ गठित करने के लिए कदम उठाएंगे. इसके बाद, प्रधान न्यायाधीश के समक्ष इसका उल्लेख किया गया तो उन्होंने इस मामले में सुनवायी के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ गठित की थी.

हालांकि, पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 18 जुलाई को कहा कि इस मुद्दे पर फैसला करने के लिए नौ सदस्यीय संविधान पीठ विचार करेगी. संविधान पीठ के समक्ष विचारणीय सवाल था कि क्या निजता के अधिकार को संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार घोषित किया जा सकता है. न्यायालय ने शीर्ष अदालत की छह और आठ सदस्यीय पीठ द्वारा क्रमश: खड़क सिंह और एमपी शर्मा प्रकरण में दी गई व्यवस्थाओं के सही होने की विवेचना के लिए नौ सदस्यीय संविधान पीठ गठित करने का निर्णय किया था. इन फैसलों में कहा गया था कि यह मौलिक अधिकार नहीं है. खड़क सिंह प्रकरण में न्यायालय ने 1960 में और एमपी शर्मा प्रकरण में 1950 में फैसला सुनाया था.

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने दो अगस्त को फैसला सुरक्षित रखते हुए सार्वजनिक दायरे में आई निजी सूचना के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि मौजूदा प्रौद्योगिकी के दौर में निजता के संरक्षण की अवधारणा एक हारी हुई लडाई है. इससे पहले, 19 जुलाई को सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की थी कि निजता का अधिकार मुक्म्मल नहीं हो सकता और सरकार के पास इस पर उचित प्रतिबंध लगाने के कुछ अधिकार हो सकते हैं.

अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने दलील दी थी कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं आ सकता क्योंकि वृहद पीठ के फैसले हैं कि यह सिर्फ न्यायिक व्यवस्थाओं के माध्यम से विकसित एक सामान्य कानूनी अधिकार है. केंद्र ने भी निजता को एक अनिश्चित और अविकसित अधिकार बताया था, गरीब लोगों को जिसे जीवन, भोजन और आवास के उनके अधिकार से वंचित करने के लिए प्राथमिकता नहीं दी जा सकती है.

इस दौरान न्यायालय ने भी सभी सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों से निजी सूचनाओं को साझा करने के डिजिटल युग के दौर में निजता के अधिकार से जुड़े अनेक सवाल पूछे. इस बीच, याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि निजता का अधिकार सबसे अधिक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार जीने की स्वतंत्रता में ही समाहित है. उनका यह भी कहना था कि स्वतंत्रता के अधिकार में ही निजता का अधिकार शामिल है.

निजता का अधिकार: सुनवाई का घटनाक्रम

07 जुलाई 2017: तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि आधार को लेकर उठ रहे मुद्दों पर अंतिम व्यवस्था बड़ी पीठ देगी और संविधान पीठ के गठन की जरूरत पर निर्णय भारत के प्रधान न्यायाधीश करेंगे.

07 जुलाई: मामला प्रधान न्यायाधीश के समक्ष उठाया गया, सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन.

18 जुलाई: पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित करने के संबंध में फैसले के लिए नौ न्यायाधीशों की पीठ के गठन का फैसला लिया.

नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर, न्यायमूर्ति जे चेलामेर, न्यायमूर्ति एसए बोबड़े, न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति एएम सप्रे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर निजता के मामले की सुनवाई करेंगे.

19 जुलाई: उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं हो सकता, नियमन किया जा सकता है.

19 जुलाई: केंद्र ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है.

26 जुलाई: कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब और पुडुचेरी, गैर-भाजपा शासित चार राज्य निजता के अधिकार के पक्ष में न्यायालय पहुंचे.

26 जुलाई: केंद्र ने न्यायालय से कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार हो सकता है, लेकिन कुछ अपवादों-शर्तों के साथ.

27 जुलाई: महाराष्ट्र सरकार ने न्यायालय से कहा कि निजता का अधिकार कोई इकलौती चीज नहीं है, यह व्यापक विचार है.

01 अगस्त: न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक मंच पर व्यक्ति की निजी सूचनाओं की सुरक्षा के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश होने चाहिए.

02 अगस्त: न्यायालय ने कहा कि प्रौद्योगिकी के दौर में निजता की सुरक्षा का सिद्धांत एक हारी हुई लड़ाई है, फैसला सुरक्षित रखा.

24 अगस्त: न्यायालय ने निजता के अधिकार को भारत के संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया.