शुभ दीपावली

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” है परमपिता परमात्मा ईश्वर ॐ

हम सभी को असत्य से सत्य की राह दिखाना, हम सभी को अज्ञानता से ज्ञान की और ले जाना, हम सभी को मृत्यु से अमरत्व तक ले चलना| ॐ शांति शांति शांति||”

” Om, Lead us from Unreality (of Transitory Existence) to the Reality (of the Eternal Self),
Lead us from the Darkness (of Ignorance) to the Light (of Spiritual Knowledge),
Lead us from the Fear of Death to the Knowledge of Immortality.
Om Peace, Peace, Peace.”

 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

That Creator is Absolute, Complete and Full. This Universe is Absolutely Complete and Full. Only Absolutely Complete springs off That Absolute! From That Absolute, even if Whole Absolute is taken out, only Absolute does remain! OM Peace, Peace, Peace.

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः।शं नो भवत्वर्यमा।शं न इन्द्रो वृहस्पतिः।शं नो विष्णुरुरुक्रमः।नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो।त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।त्वामेव प्रत्यक्षम् ब्रह्म वदिष्यामि।ॠतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।तन्मामवतु।तद्वक्तारमवतु।अवतु माम्।अवतु वक्तारम्।”ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

OM may Mitra do good to us, may Varuna do good to us, May Aryama do good to us, May Indra do good to us, may Brihaspatido good to us, May Vishnu-who has vast coverage-do good to us, (I) Salute O Brahm!, Salutations to you O Vayu!, Only you (Vayu) are the visible Brahman. I say only you (Vayu) are the visible Brahman, I say rta (divine law), I say truth, May that (truth) protect me, May that (truth) protect teacher, May it protect me, May it protect teacher, OM Peace, Peace, Peace.

ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्यं करवावहै।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

OM. Let us both protect each other together! May both of us enjoy together! May both of us put our energies together! May our studies be radiantly glorious! May there be no hatred between us! OM Peace, Peace, Peace!

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।सर्वम् ब्रह्मौपनिषदम् माऽहं ब्रह्मनिराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणम् मेऽस्तु।तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्तेमयि सन्तु ते मयि सन्तु।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

OM may my organs, speech, Prana, eyes and ears be nourished and be well, so should all (my) senses become strong. Upanishad says all this (world) is Brahman. I don’t reject Brahman, may Brahma not reject me. Let there be no rejection, let there be no rejection at all in me, let me be concentrated on Self, all those ways of righteous living told in Upanishads be in me! Be in me, OMPeace, Peace, Peace.

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठितामनो मे वाचि प्रतिष्ठित-मावीरावीर्म एधि।वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतम् वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतुतद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

OM let my speech be established in (my) mind, and (my) mind be established in my speech, May Brahman(Supreme Reality) reveal itself to me! May I be able to grasp the truths of the Vedas! Let not what I have heard (studied) forsake me! May I spend both day and night in study! I say rta (divine law), I’ll say the Truth; may that (truth) protect me! May that (truth) protect the teacher! May it protect me; and may it protect the speaker as well! OM …

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 8)

(भद्रम् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रम् पश्येम अक्षभिः यजत्राः स्थिरैः अङ्गैः तुष्टुवांसः तनूभिः वि-अशेम देव-हितम् यत् आयुः ।)

हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें । जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं (यजत्राः)
ऐसे हे देवो, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें ।
नीरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए (तुष्टुवांसः) हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ (देवहितं) सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें (व्यशेम) ।
तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें ।

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्र नश्चक्र जरसं तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥
(मंत्र 9)

(शतम् इत् नु शरदः अन्ति देवाः यत्र नः चक्र जरसम् तनूनाम् पुत्रासः यत्र पितरः भवन्ति मा नः मध्या रीरिषत आयुः गन्तोः ।)

हे देवो, मनुष्य की आयु की सम्यक् समाप्ति सौ वर्ष (शरदः) की नियत की गयी है,
जिसमें वृद्धावस्था (जरसं) की व्यवस्था की है (चक्र) और जिसमें हमारे पुत्र (पुत्रासः) स्वयं पिता बन सकें, अर्थात् हम पौत्रवान् बन जावें ।
ऐसे उस पूर्ण आयु की अंतकाल (अन्ति) से पहले बीच के काल में ही हमारी हिंसा न करें,
यानी हमें क्षति न पहुंचाएं (रीरिषत), हमें क्षीणकाय न बनावें ।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ( यजुर्वेद, २५.१९)

हे! ईश मम कल्याण को, कल्याण का पोषण करें,
हे विश्व वेदः पूषा, श्री मय ज्ञान संवर्धन करें.
हे बृहस्पति! अरिष्ट नेमिः, स्वस्ति कारक आप हैं,
त्रिविध ताप हों शांत जग के, देते जो संताप हैं.

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ — यजुर्वेद ३६:१७

May peace radiate there in the whole sky as well as in the vast ethereal space everywhere.
May peace reign all over this earth, in water and in all herbs, trees and creepers.
May peace flow over the whole universe.
May peace be in the Supreme Being Brahman.
And may there always exist in all peace and peace alone.
Aum peace, peace and peace to us and all beings!

पुरुष एव इदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्य ईशानो यद् अन्नेन अतिरोहति।। पुरुष, ऋक्. 10.90.2>
इस सृष्टि में जो कुछ भी इस समय विद्यमान है, जो अब तक हो चुका है और आगे जो भविष्य में होगा, वह सब पुरुष (परमात्मा) ही है। वह पुरुष उस अमरत्व का भी स्वामी है, जो इस दृश्यमान भौतिक जगत के ऊपर है।
ॐ भूर्भुव स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

 

 

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