वशिष्ठ ऋषि और उनकी वंश परंपरा

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आकाश में चमकते सात तारों के समूह में पंक्ति के एक स्थान पर वशिष्ठ को स्थित माना जाता है। दूसरे (दाहिने से) वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती को दिखाया गया है। अंग्रेज़ी में सप्तर्षि तारसमूह को बिग डिपर या ग्रेट बियर (बड़ा भालू) कहते हैं और वशिष्ठ-अरुंधती को अल्कोर-मिज़र कहते हैं।

हालांकि विद्वानों के अनुसार कहते हैं कि एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकुवंशी त्रिशुंकी के काल में हुए जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहते थे। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अपव कहते थे। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा जाता था। पांचवें राजा सौदास के समय में हुए थे जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभाज था। कहते हैं कि सौदास ही सौदास ही आगे जाकर राजा कल्माषपाद कहलाए। छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के समय हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें भगवान राम के समय में हुए जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहते थे और आठवें महाभारत के काल में हुए जिनके पुत्र का नाम पराशर था। इनके अलावा वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति, वशिष्ठ सुवर्चस जैसे दूसरे वशिष्ठों का भी जिक्र आता है। फिर भी उक्त सभी पर शोध किए जाने की आवश्यकता है। वेदव्यास की तरह वशिष्ठ भी एक पद हुआ करता था।
*वशिष्ठ जो ब्रह्मा के पुत्र थे उनके नाम से ही कुल परंपरा का प्रारंभ हुआ तो आगे चलकर उनके कुल के अन्य वेदज्ञों लोगों ने भी अपना नाम वशिष्ठ रखकर उनके कुल की प्रतिष्ठा को बरकरार रखा। पहले वशिष्ठ की मुख्यत: दो पत्नियां थीं। पहली अरुंधती और दूसरी उर्जा। उर्जा प्रजापति दक्ष की तो अरुंधती कर्दम ऋषि की कन्या थी। प्रारंभिक वशिष्ठ शंकर भगवान के साढू तथा सतीदेवी के बहनोई थे। वशिष्ठ ने ही श्राद्धदेव मनु (वैवस्तवत मनु) को परामर्ष देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बटवाकर दिलाया था।
*वशिष्ठ का कामधेनु और सूर्यवंश की पुरोहिताई के कारण ऋषि विश्वामित्र से झगड़ा हुआ था। विश्वामित्र अत्रिवंशी ययाति कुल से थे। वशिष्ठ के 100 से ज्यादा पुत्र थे। वेद वक्ताओं में वशिष्ठ ऋग्वेद के 7 वे मण्डल के प्रणेता हैं तथा 9वें मंडल में भी इनके वंशधरों के अनेक मंत्र हैं।
*इक्ष्वाकु ने 100 रात्रि का कठोर तप करके सूर्य देवता की सिद्धि प्राप्त थी की और वशिष्ठ को गुरु बनाकर उनके उपदेश से अपना पृथक राज्य और राजधानी अयोध्यापुरी स्थिपित कराई और वे प्राय: वहीं रहने लगे। प्रथम वशिष्‍ठ ही पुष्कर में प्रजापति ब्रह्मा के यज्ञ के आचार्य रहे थे।
*वशिष्ठ राम के काल में हुए जिन्होंने अयोध्या के राजपुरोहित के पद पर कार्य किया था। उन्होंने ही दशरथ को पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया, श्री रामजी को जातकर्म चौल, यज्ञोपवीत विवाह कराया और राम की राज्याभिषेक की पूरी व्यवस्था इन्हीं के द्वारा हुई।
*वशिष्ठ महाभारत के काल में हुए थे। प्रथम वशिष्ठ की पत्नीं अरुंधती से उत्पन्न पुत्रों के कुल में ही आगे चलकर महाभारत के काल में एक और वशिष्ठ नाम से प्रसिद्ध हुए ऋषि थे जिनके पुत्र का नाम शक्ति मुनि और पौत्र का नाम पराशर था। पराशर के पुत्र महाभारत लिखने वाले मुनि वेद व्यास थे।
*वशिष्ठ ऋषि की संपूर्ण जानकारी वायु, ब्रह्मांड एवं लिंग पुराण में मिलती है। वशिष्ठ कुल ऋषियों एवं गोत्रकारों की नामावली मत्स्य पुराण में दर्ज है। इस वंश में क्रमश: प्रमुख लोग हुए- 1. देवराज, 2. आपव, 3. अथर्वनिधि, 4. वारुणि, 5. श्रेष्ठभाज्, 6. सुवर्चस्, 7. शक्ति और 8. मैत्रावरुणि। एक अल्प शाखा भी है, जो जातुकर्ण नाम से है।
*वशिष्ठ वंश के रचित अनेक ग्रन्थ अभी उपलब्ध हैं। जैसे योग वशिष्ठ , वशिष्ठ संहिता, वशिष्ठ कल्प, वशिष्ठ शिक्षा, वशिष्ठ तंत्र, वशिष्ठ पुराण, वशिष्ठ स्मृति, वशिष्ठ श्राद्ध कल्प, आदि इनमें प्रमुख हैं

सृष्टि रचना क उद्देश्‍य से ब्रह्माजी ने अपनी योगमाया से 14 मानसपुत्र उत्‍पन्‍न किए:-

1. सनक ­2. समन्‍दन 3. सनातन. 4. सनत्‍कुमार 5. स्‍कन्‍ध 6. नारद  7. रुद्र  8. अभि  9. वशिष्‍ठ  10. कश्‍यप 11. गौतम  12. भारद्वाज  13. विश्‍वामित्र  14. कौशिक

ब्रह्माजी के उक्‍त मानस पुत्रों में से प्रथम सात मानस पुत्र तो वैराग्‍य योग में लग गए तथा शेष सात मानस पुत्रों ने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया. गृहस्‍थ जीवन के साथ-साथ वे योग, यज्ञ, तपस्‍या तथा अध्‍ययन एवं शास्‍त्रास्‍त्र प्रशिक्षण का कार्य भी करने लगे. अपने सात मानस पुत्रों को, जिन्‍होंने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया था ब्रह्माजी ने उन्‍हें विभिन्‍न क्षेत्र देकर उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया था ।

‘सप्‍त ब्रह्मर्षि देवर्षि महर्षि परमर्षय:।

कण्‍डर्षिश्‍च श्रुतर्षिश्‍च राजर्षिश्‍च क्रमावश:।।

1. ब्रह्मर्षि 2. देवर्षि 3. महर्षि 4. परमर्षि 5. काण्‍डर्षि 6. श्रुतर्षि 7. राजर्षि

उक्‍त ऋषियों का कार्य अपने क्षेत्र में खोज करना तथा प्राप्‍त परिणामों से दूसरों को अवगत कराना व शिक्षा देना था। मन्‍वन्‍तर में वशिष्‍ठ ऋषि हुए हैं, उस मन्वन्‍तर में उन्‍हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली है। वशिष्‍ठ जी ने गृहस्‍थाश्रम की पालना करते हुए सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशा बोध दिया।

वशिष्‍ठ जी की पत्‍नी का नाम अरुन्‍धति था। पुराणों में देवताओं द्वारा मानस सरोवर पर यज्ञ करना, खली नामक दानव का यज्ञ को विध्‍वंस करना, वशिष्‍ठ जी द्वारा अपनी तपस्‍या के बल पर राक्षसों को भस्‍म करना तथा देवताओं द्वारा प्रसन्‍न होकर देविका स्‍थान वशिष्‍ठ को देना। वशिष्‍ठ जी का अपनी पत्‍नी के साथ देविका स्‍थान पर तपस्‍या करना – वशिष्‍ठ जी संतानों का नीचे वनों में आकर आश्रम बनाकर अध्‍यापन करना, गौड़ देश में विकास से गौड़ ब्राह्मण कहलाना फिर उनके अनेकानेक भेद यथा मिथिला क्षेत्र में जाकर रहने से मैथिली, सारस्‍वत क्षेत्र में आकर रहने से सारस्‍वत, कान्‍य-कुन्‍ज में रहने से कान्‍य-कुंज आदि अनेकानेक प्रसंग एवं कथायें प्रचीन ग्रन्‍थों में मिलती हैं।

वशिष्‍ठ जी के शक्ति आदि एक सौ पुत्र हुए। पुराणों में कामधेनु द्वारा वशिष्‍ठ जी की मनोकामना पूर्ण करने का, विश्‍वामित्र द्वारा कामधेनु को मांगना एवं वशिष्‍ठ का इनकार करना, विश्‍वामित्र द्वारा कामधेनु को बलपूर्वक ले जाने का प्रयत्‍न, कामधेनु द्वारा विश्‍वामित्र की सेना एवं पुत्रों का विनाश, विश्‍वामित्र द्वारा शंकर भगवान की आराधना, शिवजी से शक्तिशाली अस्‍त्र प्राप्‍त कर वशिष्‍ठ जी पर पुन: आक्रमण, वशिष्‍ठ जी पर ब्रह्मास्‍त्र चलाना, ब्रह्मास्‍त्र का वशिष्‍ठ जी पर उनकी तपस्‍या के फलस्‍वरूप कोई प्रभाव न होना, विश्‍वामित्र द्वारा ब्रह्मबल प्राप्‍त करने हेतु घोर तपस्‍या करना, वशिष्‍ठ जी के पुत्र शक्ति एवं राजा सुदास का प्रकरण, राजा सुदास का शक्ति मुनि को कोड़े मारना, शक्ति मुनि का राजा को राक्षस बनने का शाप देना, राक्षस के रूप मे वशिष्‍ठ जी को धोखे से मारने का मन्‍तव्‍य, वशिष्‍ठ जी को विश्‍वामित्र के प्रति आदर भावना की जानकारी विश्‍वामित्र को होना, विश्‍वामित्र द्वारा वशिष्‍ठ जी से क्षमायाचना करना आदि प्रकरण विस्‍तार से पुराणादि में दिग्‍दर्शित किये गये हैं। अत: विस्‍तार भय से उनकी पुनरावृत्ति नहीं की जा रही है।

वशिष्‍ठ को ब्रह्मबल प्राप्‍त था इसलिए वो ब्रह्मर्षि कहलाये।

 

ब्रह्मर्षि वशिष्‍ठ: ब्रह्मा मानस पुत्र (प्राण) 🍀🍀 वसिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। वसिष्ठ एक सप्तर्षि हैं – यानि के उन सात ऋषियों में से एक जिन्हें ईश्वर द्वारा सत्य का ज्ञान एक साथ हुआ था और जिन्होंने मिलकर वेदों का दर्शन किया (वेदों की रचना की ऐसा कहना अनुचित होगा क्योंकि वेद तो अनादि है)। उनकी पत्नी अरुन्धती है। वह योग-वासिष्ठ में राम के गुरु हैं। वसिष्ठ राजा दशरथ के राजकुल गुरु भी थे। आकाश में चमकते सात तारों के समूह में पंक्ति के एक स्थान पर वशिष्ठ को स्थित माना जाता है। सृष्टि रचना क उद्देश्‍य से ब्रह्माजी ने अपनी योगमाया से 14 मानसपुत्र उत्‍पन्‍न किए:- मन से मारिचि, नेत्र से अत्रि, मुख से अंगिरस, कान से पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगुष्ठ से दक्ष, छाया से कंदर्भ, गोद से नारद, इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार, शरीर से स्वायंभुव मनु और शतरुपा व ध्यान से चित्रगुप्त। ब्रह्माजी के उक्‍त मानस पुत्रों में से प्रथम सात मानस पुत्र तो वैराग्‍य योग में लग गए तथा शेष सात मानस पुत्रों ने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया। गृहस्‍थ जीवन के साथ-साथ वे योग, यज्ञ, तपस्‍या तथा अध्‍ययन एवं शास्‍त्रास्‍त्र प्रशिक्षण का कार्य भी करने लगे। अपने सात मानस पुत्रों को, जिन्‍होंने गृहस्‍थ जीवन अंगीकार किया था ब्रह्माजी ने उन्‍हें विभिन्‍न क्षेत्र देकर उस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया था । ‘सप्‍त ब्रह्मर्षि देवर्षि महर्षि परमर्षय:। कण्‍डर्षिश्‍च श्रुतर्षिश्‍च राजर्षिश्‍च क्रमावश:।। 1. ब्रह्मर्षि 2. देवर्षि 3. महर्षि 4. परमर्षि 5. काण्‍डर्षि 6. श्रुतर्षि 7. राजर्षि उक्‍त ऋषियों का कार्य अपने क्षेत्र में खोज करना तथा प्राप्‍त परिणामों से दूसरों को अवगत कराना व शिक्षा देना था। मन्‍वन्‍तर में वशिष्‍ठ ऋषि हुए हैं, उस मन्वन्‍तर में उन्‍हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली है। वशिष्‍ठ जी ने गृहस्‍थाश्रम की पालना करते हुए सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशा बोध दिया। वशिष्‍ठ जी की पत्‍नी का नाम #अरुन्‍धति था। पुराणों में देवताओं द्वारा मानस सरोवर पर यज्ञ करना, खली नामक दानव का यज्ञ को विध्‍वंस करना, वशिष्‍ठ जी द्वारा अपनी तपस्‍या के बल पर राक्षसों को भस्‍म करना तथा देवताओं द्वारा प्रसन्‍न होकर देविका स्‍थान वशिष्‍ठ को देना। वशिष्‍ठ जी का अपनी पत्‍नी के साथ देविका स्‍थान पर तपस्‍या करना – वशिष्‍ठ जी संतानों का नीचे वनों में आकर आश्रम बनाकर अध्‍यापन करना, गौड़ देश में विकास से गौड़ ब्राह्मण कहलाना फिर उनके अनेकानेक भेद यथा मिथिला क्षेत्र में जाकर रहने से मैथिली, सारस्‍वत क्षेत्र में आकर रहने से सारस्‍वत, कान्‍य-कुन्‍ज में रहने से कान्‍य-कुंज आदि अनेकानेक प्रसंग एवं कथायें प्रचीन ग्रन्‍थों में मिलती हैं। वशिष्‍ठ जी के शक्ति आदि एक सौ पुत्र हुए। पुराणों में कामधेनु द्वारा वशिष्‍ठ जी की मनोकामना पूर्ण करने का, विश्‍वामित्र द्वारा कामधेनु को मांगना एवं वशिष्‍ठ का इनकार करना, विश्‍वामित्र द्वारा कामधेनु को बलपूर्वक ले जाने का प्रयत्‍न, कामधेनु द्वारा विश्‍वामित्र की सेना एवं पुत्रों का विनाश, विश्‍वामित्र द्वारा शंकर भगवान की आराधना, शिवजी से शक्तिशाली अस्‍त्र प्राप्‍त कर वशिष्‍ठ जी पर पुन: आक्रमण, वशिष्‍ठ जी पर ब्रह्मास्‍त्र चलाना, ब्रह्मास्‍त्र का वशिष्‍ठ जी पर उनकी तपस्‍या के फलस्‍वरूप कोई प्रभाव न होना, विश्‍वामित्र द्वारा ब्रह्मबल प्राप्‍त करने हेतु घोर तपस्‍या करना, वशिष्‍ठ जी के पुत्र शक्ति एवं राजा सुदास का प्रकरण, राजा सुदास का शक्ति मुनि को कोड़े मारना, शक्ति मुनि का राजा को राक्षस बनने का शाप देना, राक्षस के रूप मे वशिष्‍ठ जी को धोखे से मारने का मन्‍तव्‍य, वशिष्‍ठ जी को विश्‍वामित्र के प्रति आदर भावना की जानकारी विश्‍वामित्र को होना, विश्‍वामित्र द्वारा वशिष्‍ठ जी से क्षमायाचना करना आदि प्रकरण विस्‍तार से पुराणादि में दिग्‍दर्शित किये गये हैं। अत: विस्‍तार भय से उनकी पुनरावृत्ति नहीं की जा रही है। वशिष्‍ठ को ब्रह्मबल प्राप्‍त था इसलिए वो ब्रह्मर्षि कहलाये। वशिष्ठ ऋषि और उनकी वंश परंपरा: बहुत से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं दलित समाज के लोग वशिष्ठ गोत्र लगाते हैं। वे सभी वशिष्ठ कुल के हैं। वशिष्ठ नाम से कालांतर में कई ऋषि हो गए हैं। एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकु के काल में हुए, तीसरे राजा हरिशचंद्र के काल में हुए और चौथे राजा दिलीप के काल में, पांचवें राजा दशरथ के काल में हुए और छठवें महाभारत काल में हुए। पहले ब्रह्मा के मानस पुत्र, दूसरे मित्रावरुण के पुत्र, तीसरे अग्नि के पुत्र कहे जाते हैं। पुराणों में कुल बारह वशिष्ठों का जिक्र है। हालांकि विद्वानों के अनुसार कहते हैं कि एक वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकुवंशी त्रिशुंकी के काल में हुए जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहते थे। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अपव कहते थे। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा जाता था। पांचवें राजा सौदास के समय में हुए थे जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभाज था। कहते हैं कि सौदास ही सौदास ही आगे जाकर राजा कल्माषपाद कहलाए। छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के समय हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें भगवान राम के समय में हुए जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहते थे और आठवें महाभारत के काल में हुए जिनके पुत्र का नाम पराशर था। इनके अलावा वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति, वशिष्ठ सुवर्चस जैसे दूसरे वशिष्ठों का भी जिक्र आता है। फिर भी उक्त सभी पर शोध किए जाने की आवश्यकता है। वेदव्यास की तरह वशिष्ठ भी एक पद हुआ करता था। वशिष्ठ जो ब्रह्मा के पुत्र थे उनके नाम से ही कुल परंपरा का प्रारंभ हुआ तो आगे चलकर उनके कुल के अन्य वेदज्ञों लोगों ने भी अपना नाम वशिष्ठ रखकर उनके कुल की प्रतिष्ठा को बरकरार रखा। पहले वशिष्ठ की मुख्यत: दो पत्नियां थीं। पहली अरुंधती और दूसरी उर्जा। उर्जा प्रजापति दक्ष की तो अरुंधती कर्दम ऋषि की कन्या थी। प्रारंभिक वशिष्ठ शंकर भगवान के साढू तथा सतीदेवी के बहनोई थे। वशिष्ठ ने ही श्राद्धदेव मनु (वैवस्तवत मनु) को परामर्ष देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बटवाकर दिलाया था। वशिष्ठ का कामधेनु और सूर्यवंश की पुरोहिताई के कारण ऋषि विश्वामित्र से झगड़ा हुआ था। विश्वामित्र अत्रिवंशी ययाति कुल से थे। वशिष्ठ के 100 से ज्यादा पुत्र थे। वेद वक्ताओं में वशिष्ठ ऋग्वेद के 7 वे मण्डल के प्रणेता हैं तथा 9वें मंडल में भी इनके वंशधरों के अनेक मंत्र हैं। इक्ष्वाकु ने 100 रात्रि का कठोर तप करके सूर्य देवता की सिद्धि प्राप्त थी की और वशिष्ठ को गुरु बनाकर उनके उपदेश से अपना पृथक राज्य और राजधानी अयोध्यापुरी स्थिपित कराई और वे प्राय: वहीं रहने लगे। प्रथम वशिष्‍ठ ही पुष्कर में प्रजापति ब्रह्मा के यज्ञ के आचार्य रहे थे। वशिष्ठ राम के काल में हुए जिन्होंने अयोध्या के राजपुरोहित के पद पर कार्य किया था। उन्होंने ही दशरथ को पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया, श्री रामजी को जातकर्म चौल, यज्ञोपवीत विवाह कराया और राम की राज्याभिषेक की पूरी व्यवस्था इन्हीं के द्वारा हुई। वशिष्ठ महाभारत के काल में हुए थे। प्रथम वशिष्ठ की पत्नीं अरुंधती से उत्पन्न पुत्रों के कुल में ही आगे चलकर महाभारत के काल में एक और वशिष्ठ नाम से प्रसिद्ध हुए ऋषि थे जिनके पुत्र का नाम शक्ति मुनि और पौत्र का नाम पराशर था। पराशर के पुत्र महाभारत लिखने वाले मुनि वेद व्यास थे। वशिष्ठ ऋषि की संपूर्ण जानकारी वायु, ब्रह्मांड एवं लिंग पुराण में मिलती है। वशिष्ठ कुल ऋषियों एवं गोत्रकारों की नामावली मत्स्य पुराण में दर्ज है। इस वंश में क्रमश: प्रमुख लोग हुए- 1. देवराज, 2. आपव, 3. अथर्वनिधि, 4. वारुणि, 5. श्रेष्ठभाज्, 6. सुवर्चस्, 7. शक्ति और 8. मैत्रावरुणि। एक अल्प शाखा भी है, जो जातुकर्ण नाम से है। वशिष्ठ वंश के रचित अनेक ग्रन्थ अभी उपलब्ध हैं। जैसे वशिष्ठ संहिता, वशिष्ठ कल्प, वशिष्ठ शिक्षा, वशिष्ठ तंत्र, वशिष्ठ पुराण, वशिष्ठ स्मृति, वशिष्ठ श्राद्ध कल्प, आदि इनमें प्रमुख हैं। महर्षि वशिष्ठ की क्षमाशीलता: राजा त्रिशंकु के यज्ञ में आमंत्रण के अवसर पर वशिष्ठ पुत्र शक्ति और विश्वामित्र विवाद हो गया| विश्वामित्र ने शक्ति को शाप दे दिया और प्रेरणा से ‘रुधिर’ नामक राक्षस ने शक्ति ऋषि को खा लिया| महर्षि वशिष्ठ के दूसरे निन्यानबे पुत्रों को भी उसने खा डाला| महर्षि वशिष्ठ का एक पुत्र भी नही बचा| महर्षि वशिष्ठ क्षमा की मूर्ति थे| उनका सिद्धांत था कि अपने किये हुए कर्म का ही फल भोगना पड़ता है| कोई किसी को मार नही सकता| यदि कोई मारता है तो वह अपने किये हुए किसी कुकर्म का परिणाम है| इसलिए महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र आदि से बदला न लिया, क्षमा कर दिया, किंतु धर्मप्राण लोग वंश के क्षय को नही सह पाते; क्योंकि इससे पितरों का कल्याण नही होता| इसलिए महर्षि वशिष्ठ बहुत उद्विग्न हो गए| माता अरुंधती के शोक की सीमा न थी| पुत्रवधू अदृश्यंती के दुःख का कोई आर-पार ही न था| उसका तो सर्वस्व ही लूट गया था| इस घोर कष्ट में भी कष्ट पहुँचाने वाले के प्रति क्षमा का भाव रखना बहुत बड़ी मानवता है| महर्षि वशिष्ठ और अरुधंती ने तो प्राणों को ही त्याग देना चाहा| उनके विचार में आया कि वंश क्षय के बाद उनका जीना उचित नही है| उनकी इस स्थिति को देखकर पुत्रवधू अपना दुःख भूल गई और अपने सास-ससुर की सँभाल में लग गई| उस स्थिति को देखकर पृथ्वी माता भी रो पड़ी थी| अदृश्यंती ने चरण पकड़कर सास-ससुर को मनाते हुए कहा- ‘आपके वंश का क्षय अभी नही हुआ है; क्योंकि आपका पौत्र मेरे गर्भ में सुरक्षित है| महर्षि वशिष्ठ और आता अरुंधती आश्वस्त हो गए; किंतु शोक और भय से व्यथित पुत्रवधू के कष्ट से वे दोनों फिर रो पड़े|’ इसी बीच में महर्षि वशिष्ठ के कानों में वेद की ऋचाओं की ध्वनि आने लगी| वह स्वर बहुत स्पष्ट और मधुर था| तब वे सोचने लगे कि वेदों की इन ऋचाओं का शक्ति की तरह कौन उच्चारण कर रहा है? इसी बीच भगवान् विष्णु प्रकट हो गए| उन्होंने महर्षि वशिष्ठ को आश्वासन देते हुए कहा- ‘वत्स! तुम्हारे पौत्र के मुख से ये मधुर ऋचाए निकल रही है| तुम्हारा वंश डूबा नही है| शोक छोड़ो| तुम्हारा यह पौत्र सदा शिव का भक्त होगा और समस्त कुल को तार देगा|’ इतना खकर विष्णु अन्तर्हित हो गए| महर्षि वशिष्ठ ने इसी पौत्र का नाम पराशर रखा| बालक पराशर ने गर्भ में ही अपने पिता शक्ति द्वारा शिक्षा पायी थी| पृथ्वी पर आने के बाद बच्चे की दृष्टि से अपने माता की हीनता छिपी न रही| उसने पूछा- ‘माँ! तुमने सौभाग्यसूचक आभूषण अपने शरीर से क्यों हटा रखे है?’ माता अपना दुख सुनाकर पुत्र के कोमल ह्रदय को दुखाना नही चाहती थी| वह चुप रह गई| तब बच्चे ने फिर पूछा- ‘माँ! मेरे पिताजी कहाँ है?’ इतना सुनते ही अदृश्यंती के धीरज का बाँध टूट गया।’ वह फूट-फूटकर रोने लगी। ‘तुम्हारे पिता को राक्षस खा गया।’ इतना कहकर वह मूर्छित हो गई। इस दुःस्थिति से महर्षि वशिष्ठ भी बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। यह करुण दृश्य तेजस्वी बच्चे से सहा न गया। जिस कारण से उसके बूढ़े दादा एवं दादी तथा माता मूर्छित हो जाएँ, उस कारण पर बच्चे का क्रोधित होना स्वाभाविक था। वह आश्रमवासियों से सब समाचार सुनकर सारे विश्व को ही जला देने के लिए उघत हो गया। पराशर ने भगवान् शंकर की अर्चना कर शक्ति प्राप्त कर ली और जब पराशर विश्व-संहार की योजना बनाने लगे तब महर्षि वशिष्ठ ने समझाया- ‘वत्स! तुम्हारा यह क्रोध अयुक्त नही है, किंतु विश्व के विनाश की योजना सही नही है। इसे छोड़ दो।’ यह बात बालक की समझ में आ गई, किंतु राक्षसों से उसका क्रोध नही हटा। उसने ‘राक्षस-सत्र’ प्रारम्भ कर दिया| मंत्र की शक्ति से राक्षस अग्नि में गिर-गिरकर भस्म होने लगे। तब महर्षि वशिष्ठ ने पराशर को पुनः समझाया- ‘बेटा! अधिक क्रोध मत करो, इसे छोड़ दो। कोई किसी को हानि नही पहुँचा सकता। अपने किये के अनुसार ही हानि प्राप्त होती है। अतः किसी पर क्रोध करना अच्छा नही है। निर्दोष राक्षसों को जलाना बंद करो। आज से यह अपना सत्र ही समाप्त कर दो। सज्जनों का काम क्षमा करना होता है।’ पराशर ने अपने पिता का आदर कर उस सत्र को समाप्त कर दिया। इस घटना से राक्षसों के आदि कुल पुरुष महर्षि पुलस्त्य बहुत प्रभावित हुए और उस स्थल पर प्रकट हुए। उन्होंने पराशर से कहा- ‘बेटा! क्षमा ग्रहण कर तुमने वैर को जो भुला दिया है, यह तुम्हारे कुल के अनुरूप ही है। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम समस्त शास्त्रों को जान जाओगे और वरदान देता हूँ कि विष्णु पुराण के रचयिता होगे। मेरी प्रसन्नता से तुम्हारी बुद्धि प्रवृति और निवृति में निर्मल बनी रहैगी।’ महर्षि वशिष्ठ ने भी पुलस्त्य के इन वचनों का अनुमोदन करते हुए बालक को साधुवाद दिया। वसिष्ठ यानी सर्वाधिक पुरानी पीढ़ी का निवासी:- महर्षि वसिष्ठ का निवास स्थान से सम्बन्धित होने के कारण बस्ती और श्रावस्ती का नामकरण उनके नाम के शब्दों को समेटते हुए पड़ा है। दोनो स्थान आज दो रूप में देखे जा सकते हैं , परन्तु प्राचीन काल में ये एक ही इकाई रहे हैं।इसी क्रम में आज वशिष्ठ के विकास यात्रा के कुछ अनछुये पहलुओं एवं कुछ प्रमुख स्थलों की कहानी का अनावरण करने की कोशिस करूंगा। वसिष्ठ के दो मुख्य आश्रम थे। पहला हिमाचल प्रदेश के मनाली से करीब चार किलोमीटर दूर लेह राजमार्ग पर स्थित है वशिष्ठ नाम का गांव दूसरा राजस्थान के पुष्कर में जहां यज्ञ कराकर उन्होने अनेक क्षत्रियों की उत्पत्ति किया था। हिमाचल स्थित आश्रम से वे कोशल राज्य में आये थे जहां उन्होंने अपना एक आश्रम और बनाया था। वे ईक्ष्वाकु वंश के राजगुरु बने थे। यह आश्रम उत्तर प्रदेश के बस्ती और श्रावस्ती के आसपास के क्षेत्र में कही स्थित था। वसिष्ठ से सम्बन्धित होने के कारण यह क्षेत्र बस्ती और श्रावस्ती के नाम से प्रसिद्ध हुआ था।अफगान और मुगलों के आक्रमण से ये आश्रम पूर्णतः विलुप्त हो चुके होंगे । इस विषय में गहन शोध की जरुरत है।वसिष्ठ मूलतः ‘वस’ शब्द से बना है जिसका अर्थ – रहना, निवास, प्रवास, वासी आदि होता है । इसी आधार पर ‘वस’ शब्द से वास का अर्थ निकलता है। वरिष्ठ, गरिष्ठ, ज्येष्ठ, कनिष्ठ आदि में जिस ष्ठ का प्रयोग है, उसका अर्थ – सबसे ज्यादा यानी सर्वाधिक बड़ा होता है। ‘वसिष्ठ’ का अर्थ सर्वाधिक पुराना निवासी होता है। महर्षि वशिष्ठ का तपस्या स्थल को वशिष्ठ कहा गया है:- हिमाचल प्रदेश के मनाली से करीब चार किलोमीटर दूर लेह राजमार्ग पर वशिष्ठ एक ऐसा गांव स्थित है ,जो अपने दामन में पौराणिक स्मृतियां छुपाये हुए है। महर्षि वशिष्ठ ने इसी स्थान पर बैठकर तपस्या किये थे । कालान्तर में यह स्थल उन्हीं के नाम से जाना जाने लगा। ऋषि का यहां भव्य प्राचीन मन्दिर बना है। वशिष्ठ पहुंच कर ऐसा लगता है मानो सौन्दर्य, धर्म, पर्यटन, परम्पराएं, आधुनिकता, ग्रामीण शैली व उपभोक्तावादी चमक-दमक आपस में एक हो रहे हैं। वसिष्ठ के बारे में जितनी तरह की कथाएं और विवरण हमें मिलती है वे सभी एक वसिष्ठ के लिए नहीं है, अलग-अलग वसिष्ठों के लिए हैं। यानी वसिष्ठ वंश में पैदा हुए अलग-अलग मुनि-वसिष्ठों के हैं। वसिष्ठ एक जातिवाची नाम है आजकल भी जातिवादी नाम पीढ़ी दर पीढ़ी व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहकर चलता रहता है। वैसी ही परम्परा पुराने काल से चलती आ रही है। पौराणिक उल्लेख -वेद, इतिहास व पुराणों में वसिष्ठ के अनगिनत कार्यों का उल्लेख किया गया है। महर्षि वसिष्ठ की उत्पत्ति का वर्णन पुराणों में विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। “पुरानिक इनकाइक्लोपीडिया” नामक सन्दर्भ ग्रंथ (पृ.834-36 पर) वसिष्ठ के तीन जन्मों की बातें कही गयी हैं। प्रथम जन्म में अनाम आद्य वसिष्ठ:- हिमालय में ही रहते थे और जिनके नाम का ठीक-ठीक पता नहीं था, को खतरा महसूस हुआ कि इतना शक्तिशाली और ऐश्वर्य सम्पन्न राजा उन्मत्त हो सकता है। राजदंड कहीं उन्मत्त और आक्रामक न हो जाए, इसलिए उस पर नियंत्रण आवश्यक है। ऐसे राजदंड पर नियंत्रण करने के लिए कोई बड़ा राजदंड काम नहीं आ सकता था, बल्कि ज्ञान का, त्याग का, अपरिग्रह का, वैराग्य का, अंहकार-हीनता का ब्रह्मदण्ड ही राजदंड को नियमित और नियंत्रित कर सकता था। वसिष्ठ के अलावा यह काम और किसी के वश का नहीं था। यह वसिष्ठ ने अपने आचरण से ही आगे चलकर सिद्ध कर दिया। एक बड़े विचार या आदर्श की स्थापना जितनी मुश्किल होती है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल उस पर आचरण होता है। अगर वसिष्ठों का खूब सम्मान इस देश की परम्परा में है तो जाहिर है कि इस आदर्श का पालन करने में वसिष्ठों ने अनेक कष्ट भी सहे होंगे। कुछ कष्ट हमारे इतिहास में भी दर्ज हैं। प्रथम जन्म में वे ब्रह्मा के मानस पुत्र कहे गये हैं। जो ब्रहमा के सांस (प्राण) से उत्पन्न हुए हैं। पुराणों में इनकी पत्नी का नाम अरुन्धती देवी प्राप्त होता है। पूर्व जन्म में अरुन्धती का नाम सन्ध्या था। प्रथम जन्म के वसिष्ठ की मृत्यु दक्ष के यज्ञ कुण्ड में हुई थी। माना जाने लगा कि वसिष्ठ जैसा महान व्यक्ति सामान्य मनुष्य तो हो नहीं सकता। उसे तो लोकोत्तर होना चाहिए। इसलिए उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र मान लिया गया और उनका विवाह दक्ष नामक प्रजापति की पुत्री ऊर्जा से बताया गया जिससे उन्हें एक पुत्री और सात पुत्र पैदा हुए। अपने महान नायकों को दैवी महत्व देने का यह भारत का अपना तरीका है, जिसे आप चाहें तो पसंद करें, चाहें तो न करें, पर तरीका है। यही वह तरीका है जिसके तहत तुलसीदास को वाल्मीकि का तो विवेकानंद को शंकराचार्य की तरह शिव का रूप मान लिया जाता है। ऐसे ही मान लिया गया कि वसिष्ठ जैसा महा प्रतिभाशाली व्यक्ति ब्रह्मा के अलावा किसका पुत्र हो सकता है? पर चूंकि ब्रह्मा का परिवार नहीं है, इसलिए मानस पुत्र होने की कल्पना कर ली गई। द्वितीय जन्म: इक्ष्वाकु वंश के पुरोहित:- ब्रहमा के हवन कुण्ड से ही उन्होने दूसरी बार जन्म लिया थ। इस बार उनकी पत्नी का नाम अक्षमाला था। जो अरुन्धती का पुनर्जन्म था।इस कारण इन्हें अग्निपुत्र भी कहा गया है। इस जन्म में वह इक्ष्वाकु राजा निमि के पुरोहित हुए थे। जब इनके पिता ब्रह्मा जी ने इन्हें मृत्युलोक में जाकर सृष्टि का विस्तार करने तथा सूर्यवंश का पौरोहित्य कर्म करने की आज्ञा दी, तब इन्होंने पौरोहित्य कर्म को अत्यन्त निन्दित मानकर उसे करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। ब्रह्मा जी ने इनसे कहा- ‘इसी वंश में आगे चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अवतार ग्रहण करेंगे और यह पौरोहित्य कर्म ही तुम्हारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा।’ फिर इन्होंने इस धराधाम पर मानव-शरीर में आना स्वीकार किया।निमि राजा के विवाह के बाद वसिष्ठ ने सूर्य वंश की दूसरी शाखाओं का पुरोहित कर्म छोड़कर केवल इक्ष्वाकु वंश के राजगुरु पुरोहित के रूप में कार्य किया। सामाजिक अव्यवस्था से निजात पाने के लिए ही जन समाज ने मनु को अपना पहला राजा बनाया और मनु ने समाज और शासन के व्यवस्थित संचालन के लिए नियमों की व्यवस्था दी। वे दशरथ से ऋष्यश्रृंग की देखरेख में पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया, राम आदि का नामकरण किया, शिक्षा-दीक्षा दी और राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए दशरथ का मन बनाया। पर इनका अलग से नाम नहीं मिलता।आद्य वसिष्ठ, सबसे पुराने वसिष्ठ थे। वे कोशल देश की राजधानी अयोध्या में आकर बसे वे स्मृति परम्परा के मुताबिक हिमालय से वहां आए थे और अयोध्या में आकर रहने से पहले का विवरण चूंकि हमारे ग्रंथों में खास मिलता नहीं, इसलिए उन्हें ब्रह्मा का पुत्र मानने की श्रद्धा से भरी तो कभी ऋग्वेद के मुताबिक ‘वरूण-उर्वशी’ की सन्तान मानने की रोचक कथाएं मिल जाती हैं। हिमालय से उतरकर वसिष्ठ जब अयोध्या आए, तब मनु के पुत्र इक्ष्वाकु राज्य कर रहे थे। इक्ष्वाकु ने उन्हें अपना कुलगुरू बनाया और तब से एक परम्परा की शुरूआत हुई कि राजबल का नियमन ब्रह्मबल से होगा और एक शानदार तालमेल और संतुलन का सूत्रपात शासन व्यवस्था में ही नहीं समाज में भी हुआ। यहां तक कि क्रमश: एक सामाजिक आदर्श बन गया कि जब भी रथ पर जा रहे राजा को सामने स्नातक या विद्वान मिल जाए तो राजा को चाहिए कि वह अपने रथ से उतरे, प्रणाम करे और आगे बढ़े। वे दशरथ से पुत्रेष्टि यज्ञ कराया जिससे राम आदि चार पुत्र हुए। अनेक बार आपत्ति का प्रसंग आने पर तपोबल से उन्होंने राजा प्रजा की रक्षा की। राम को शस्त्र शास्त्र की शिक्षा दी। वसिष्ठ के कारण ही ‘रामराज्य’ की स्थापना संभव हुई। महर्षि वसिष्ठ ने सूर्यवंश का पौरोहित्य करते हुए अनेक लोक-कल्याणकारी कार्यों को सम्पन्न किया। इन्हीं के उपदेश के बल पर भगीरथ ने प्रयत्न करके गंगा-जैसी लोक कल्याणकारिणी नदी को हम लोगों के लिये सुलभ कराया। दिलीप को नन्दिनी की सेवा की शिक्षा देकर रघु-जैसे पुत्र प्रदान करने वाले तथा महाराज दशरथ की निराशा में आशा का संचार करने वाले महर्षि वसिष्ठ ही थे। इन्हीं की सम्मति से महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि-यज्ञ सम्पन्न किया और भगवान श्री राम का अवतार हुआ। भगवान श्री राम को शिष्य रूप में प्राप्त कर महर्षि वसिष्ठ का पुरोहित-जीवन सफल हो गया। भगवान श्री राम के वन गमन से लौटने के बाद इन्हीं के द्वारा उनका राज्याभिषेक हुआ। गुरु वसिष्ठ ने श्री राम के राज्यकार्य में सहयोग के साथ उनसे अनेक यज्ञ करवाये। वसिष्ठ ने दशरथ से कहा कि राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेज दो, उन्होंने दशरथ की मृत्यु के बाद कोशल राज्य को संभाला, विश्वामित्र से कामधेनु को लेकर उनके युद्ध हुए, उन्होंने विश्वामित्र को ऋषि तो माना पर ब्रह्मर्षि नहीं, सिर्फ राजर्षि माना, तो इस तमाम कथामाला में ऐसा क्या है कि वसिष्ठ को भारत राष्ट्र का विराट या विशिष्ट पुरूष माना जाए? चूंकि यकीनन है, इसलिए हमें वसिष्ठ के बारे में थोड़ा गहरे जाकर और ज्यादा सच्चाइयां टटोलनी होंगी। वसिष्ठ की कुछ ऐसी खास और बार-बार उल्लेख के लायक कोई विशेष देन थी कि हमारे जन के बीच क्रमश: उनकी प्रतिष्ठा मनुष्य से बढ़कर देव पुरूष के रूप में होने लगी।अयोध्या के राजपुरोहित के नाते काम करनेवाले वसिष्ठ वंश की सविस्तृत जानकारी पौराणिक साहित्य में प्राप्त है। ब्रह्महत्या का पाप निवारण के लिये अश्वमेध यज्ञ व गर्म जल की धाराएं निकली थीं :- वशिष्ठ के बारे में पौराणिक श्रुति इस प्रकार है कि वनवास के दौरान जब युद्ध में रामचन्द्र जी द्वारा रावण मार दिया गया तो रामचन्द्र पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। अयोध्या वापस आने पर श्रीराम इस पाप के निवारण के लिये अश्वमेध यज्ञ को करने की तैयारी में जुट गये। यज्ञ शुरू हुआ तो उपस्थित सारे ऋषि मुनियों ने गुरू वशिष्ठ को कहीं नहीं देखा। वशिष्ठ राजपुरोहित थे, बिना उनके यह यज्ञ सफल नहीं हो सकता था। उस समय वशिष्ठ हिमालय में तपस्यारत थे। श्रंगी ऋषि लक्ष्मण को लेकर मुनि वशिष्ठ की खोज में निकल पड़े। लम्बी यात्रा के बाद वे इसी स्थान पर आ पहुंचे। सर्दी बहुत थी। लक्ष्मण ने गुरू के स्नान के लिये गर्म जल की आवश्यकता समझी। लक्ष्मण ने तुरन्त धरती पर अग्निबाण मारकर गर्म जल की धाराएं निकाल दीं। प्रसन्न होकर गुरू वशिष्ठ ने दोनों को दर्शन देकर कृतार्थ किया। गुरू ने कहा कि अब यह धारा हमेशा रहेगी व जो इसमें नहायेगा, उसकी थकान व चर्मरोग दूर हो जायेंगे। लक्ष्मण ने गुरूजी को यज्ञ की बात बतलाई। तदुपरान्त गुरू वशिष्ठ ने अयोध्या जाकर यज्ञ को सुचारू रूप से सम्पन्न कराया। इसके सन्दर्भ (वायु पुराण 70.79-90); (ब्रहमाण्ड पुराण 3.8.86-100); (लिंग पुराण 1.63.78-92) में मिलते हैं। इस वंश के ऋषियों एवं गोत्रकारों की नामावलि मत्स्य पुराण( 200-201) में दी गयी है। तृतीय जन्म मैत्रावरूण वसिष्ठ :-उसी परम्परा में एक मैत्रावरूण वसिष्ठ हुए जिनके 97 सूक्त ऋग्वेद में मिलते हैं, जो ऋग्वेद का करीब-करीब दसवां हिस्सा है। इतना विराट बौद्धिक योगदान करने वाले कुल में एक शक्ति वसिष्ठ हुए जिनके पास कामधेनु थी जिसका दुरूपयोग कर अहंकार पालने का मौका उन्होंने कभी भी नहीं दिया। पर घमंडी विश्वामित्रों को ऐसी गाय न मिले, इसके लिए अपने पुत्रों का बलिदान देकर भी एक भयानक संघर्ष उन्होंने विश्वामित्रों के साथ किया। परम्परा के अन्य प्रमुख वसिष्ट ऋषि:-इस वंश में उत्पन्न निम्नलिखित ऋषि विशेष महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं- 1. देवराज; 2 आपव; 3. अथर्वनिधि; 4. वारुणि; 5. श्रेष्ठभाज्; 6. सुवर्चस्; 7. शक्ति; 8. मैत्रावरुणि । 9.वसिष्ठ वंश की अन्य एक शाखा जातूकर्ण लोग माने जाते हैं । देवराज वसिष्ठ:- जिन वसिष्ठ ने विश्वामित्र को ब्राह्मण मानने से इनकार कर दिया, उनका नाम देवराज वसिष्ठ था। ये सब वसिष्ठ अलग-अलग पीढ़ियों के हैं।मसलन अयोध्या के ही एक राजा सत्यव्रत त्रिशंकु ने जब अपने मरणशील शरीर के साथ ही स्वर्ग जाने की पागल जिद पकड़ ली और अपने कुलगुरु देवराज वसिष्ठ से वैसा यज्ञ करने को कहा तो वसिष्ठ ने साफ इनकार कर दिया और उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ा। पर जब इसी वसिष्ठ ने एक बार यज्ञ में नरबलि का कर्मकाण्ड करना चाहा तो फिर विश्वामित्र ने उसे रोका और देवराज की काफी थू-थू हुई। इसके बाद जब वसिष्ठों को वापस हिमालय जाने को मजबूर होना पड़ा तो हैहय राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने उनका आश्रम जला डाला। फिर से वापस लौटे वसिष्ठों में दशरथ और राम के कुलगुरू वसिष्ठ इतने बड़े ज्ञानी, शांतशील और तपोनिष्ठ साबित हुए कि उन्होंने परम्परा से उनसे शत्रुता कर रहे विश्वामित्रों पर अखंड विश्वास कर राम और लक्ष्मण को उनके साथ वन भेज दिया। शक्ति वसिष्ठ :- जिन वसिष्ठ के साथ विश्वामित्र का भयानक संघर्ष हुआ, वे शक्ति वसिष्ठ थे। महर्षि वसिष्ठ क्षमा की प्रतिपूर्ति थे। एक बार श्री विश्वामित्र उनके अतिथि हुए। महर्षि वसिष्ठ ने कामधेनु के सहयोग से उनका राजोचित सत्कार किया। कामधेनु की अलौकिक क्षमता को देखकर विश्वामित्र के मन में लोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने इस गौ को वसिष्ठ से लेने की इच्छा प्रकट की। कामधेनु वसिष्ठ जी के लिये आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महत्त्वपूर्ण साधन थी, अत: इन्होंने उसे देने में असमर्थता व्यक्त की। विश्वामित्र ने कामधेनु को बलपूर्वक ले जाना चाहा। वसिष्ठ जी के संकेत पर कामधेनु ने अपार सेना की सृष्टि कर दी। विश्वामित्र को अपनी सेना के साथ भाग जाने पर विवश होना पड़ा। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वसिष्ठ पर पुन: आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये और उन्हें क्षत्रिय बल को धिक्कार कर ब्राह्मणत्व लाभी के लिये तपस्या हेतु वन जाना पड़ा।विश्वामित्र की अपूर्व तपस्या से सभी लोग चमत्कृत हो गये। सब लोगों ने उन्हें ब्रह्मर्षि मान लिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मर्षि कहे बिना वे ब्रह्मर्षि नहीं कहला सकते थे। वसिष्ठ विश्वामित्रके बीच के संघर्ष की कथाएं सुविदित हैं। वसिष्ठ क्षत्रिय राजा विश्वामित्र को ‘राजर्षि’ कह कर सम्बोधित करते थे। विश्वामित्र की इच्छा थी कि वसिष्ठ उन्हें ‘महर्षि’ कहकर सम्बोधित करें। एक बार रात में छिप कर विश्वामित्र वसिष्ठ को मारने के लिए आये। एकांत में वसिष्ठ और अरुंधती के बीच हो रही बात उन्होंने सुनी। वसिष्ठ कह रहे थे, ‘अहा, ऐसा पूर्णिमा के चन्द्रमासमान निर्मल तप तो कठोर तपस्वी विश्वामित्र के अतिरिक्त भला किस का हो सकता है? उनके जैसा इस समय दूसरा कोई तपस्वी नहीं।’ एकांत में शत्रु की प्रशंसा करने वाले महापुरुष के प्रति द्वेष रखने के कारण विश्वामित्र को पश्चाताप हुआ। शस्त्र हाथ से फेंक कर वे वसिष्ठ के चरणों में गिर पड़े। वसिष्ठ ने विश्वामित्र को हृदय से लगा कर ‘महर्षि’ कहकर उनका स्वागत किया। इस प्रकार दोनों के बीच शत्रुता का अंत हुआ। वसिष्ठ से क्षमा करना सीखें:- राजा इक्ष्वाकु के कुल में एक कल्माषपाद नाम का एक राजा हुआ। राजा एक दिन शिकार खेलने वन में गया। वापस आते समय वह एक ऐसे रास्ते से लौट रहा था। जिस रास्ते पर से एक समय में केवल एक ही आदमी गुजर सकता था। उसी रास्ते पर मुनि वसिष्ठ के सौ पुत्रों में से सबसे बड़े पुत्र शक्तिमुनि उसे आते दिखाई दिये। राजा ने कहा तुम हट जाओ मेरा रास्ता छोड़ दो तो कल्माषपाद ने कहा आप मेरे लिए मार्ग छोड़े दोनों में विवाद हुआ तो शक्तिमुनि ने इसे राजा का अन्याय समझकर उसे राक्षस बनने का शाप दे दिया। उसने कहा तुमने मुझे अयोग्य शाप दिया है ऐसा कहकर वह शक्तिमुनि को ही खा जाता है।शक्ति और वशिष्ठ मुनि के और पुत्रों के भक्षण का कारण भी उसकी राक्षसीवृति ही थी। पुत्रों की मृत्यु पर अधीर होकर वसिष्ठ आत्म हत्या के कई प्रयास भी किये थे। उनके पीछे उनकी पुत्रवधू भी चल रही थी। एक बार महषि वसिष्ठ अपने आश्रम लौट रहे थे तो उन्हे लगा कि मानो कोई उनके पीछे वेद पाठ करता चल रहा है। पुत्रवधू के गर्भ में शिशु वेद मंत्रों का उच्चारण कर रहा था। इसे सुनकर उनमें आशा संचार हुआ और वे मृत्यु का इरादा त्यागकर अपने भावी उस उत्ताधिकारी को पालने के लिए पुनः धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करने लगे थे। यही बालक आगे चलकर पराशर ऋषि के रुप में प्रसिद्ध हुए। एक धीवर कन्या मत्स्यगंधा से विवाह करने पर एक द्वीप पर वेदव्यास नामक पुत्र उन्हें मिला था। जो वेदव्यास द्वैपायन के नाम से प्रसिद्ध हुए और बाद में महाभारत की रचना किये थे । वसिष्ठ बोले कौन है तो आवाज आई मैं आपकी ही पुत्र-वधु शक्ति की पत्नी अदृश्यन्ती हूँ। वशिष्ठ गोत्र: ब्रह्मदेव के 10 मानस पुत्रों में 9400 वि0पू0 से यह गोत्र प्रवर्तित हुआ। स्वायंभुव मन्वंतर के सप्त ऋषियों में ये स्थापित थे। इनकी बड़ी शालीन परंपरा है। ये ब्रह्मदेव के प्राणतत्व से अर्थात् प्राणसमान प्रियभाव से उत्पन्न हुए थे। प्रजापति दक्ष ने अपनी उर्जा (वाढा उझानी क्षेत्र स्वामिनी ब्रज में) पुत्री उन्हें दी थी तथा इस बड़े वंश के नाते यह शंकर भगवान के साढू तथा सतीदेवी के वहनोई थे। ब्रज के सांख्या चार्य कपिलदेव जी की वहिन कर्दम ऋषि (कुमदवन) की पुत्री अरून्धती भी इनकी यज्ञ ज्ञाता पत्नी थी। अरून्धती की शाखा में ही पीछे बाद में वशिष्ठ शक्ति पराशर और वेदव्यास शुकमुनि आदि हुए है। शुक पुत्र भूरिश्रवा, प्रभु, शंभु कृष्ण-गौर (गौरहेठाकुर) हुए तथा वंशिष्ठ जी को घृतात्री अप्सरा से महात्मा अपमन्यु हुए जिनका आश्रम वेदव्यास आश्रम कृष्ण गंगा के निकट सोमतीर्थ पर था जहाँ पुत्र प्राप्ति के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारिका से आकर पाशुपत दीक्षा लेकर कठोर बतचर्या युक्त तप करके सांव पुत्र पाया था तथा यहीं वेद व्यास ने अपना आश्रम स्थापित किया। श्राद्वदेव वैवस्वत मनु 6379 वि0पू0 के सत्र में पुत्र कामना के विपर्यय से श्रद्धा पत्नी की इच्छानुसार इला कन्या प्रगट हुई जिसे माता पिता दोनों को संतुष्ट रखने को महाशक्तिशाली वशिष्ठ देव ने पुत्र रूप में सुद्युम्न और कन्या रूप में इला दोनों देह दिये। सुद्युम्न (दोमन ब्रज) के राजा बने इनके पुत्र गय का गयाकुण्ड तथा विमल का विमलकुण्ड इन्द्र के स्वर्गलोक आदि बृन्दावन कामवन में अभी यथास्थान हैं। तालजंघ और हैहयों ने जब अयोध्या नरेश बाहु को भारत से बाहर के मलेच्छों की सहायता लेकर मरवाया तब वशिष्ठ के शिष्य सगर ने उन पर चढाई कर पारद (रूद्र पार्षद पारसीक) गंधारी, कंवोडियन (कम्वोज) , (यूनानी अरवी विलोची) यवन और पल्लव (पहलवियों) का निर्मूल करना चाहा तब महाकृपालु वशिष्ठ ने इन्हें केवल अपरूप बनाकर शिखा हीन दाढी युक्त करके क्षमा कर दिया, तभी से वे वशिष्ठ मुनि के शिष्य हो गये और विश्वमित्र के वशिष्ठ आश्रम (वहुलावन) से उनकी कामधेनु कुल की नंदिनी गौ को बलपूर्वक हरण करने का प्रयास करने पर योनिमार्ग (जौनसार भावर) से आकर नंदिनी की रक्षा की और विश्वामित्र का दर्प चूर्ण कर दिया। यह असुरों द्वारा गुरुभक्ति का प्रभाव देख विश्वामित्र आहैं भरने लगे-“धिग्वलं क्षत्रिय वलं, ब्रह्मतेजो वलम् वलम्” विश्वामित्र ने वशिष्ठ के 100 पुत्रों सहित शक्ति का वध किया, आड़ी (उड़िया) और बक (बंगाली) सेनायें लड़वायी और अंत में वे वशिष्ठ के चरणों में गिरे और क्षमाशील मुनि ने उन्हें क्षमा कर ब्रह्मर्षि का पद दे दिया। नंदिनी की रक्षा हेतु भी ये ही पारद यवन काम्वोज शक पल्लव आदि मलेच्छ ही भारत में आये थे और यहीं बस कर भारतीय प्रजाओं में मिल गये। वशिष्ठ गोत्र के प्रवर शक्ति पाराशर ही माथुर हैं। इन वशिष्ठ देव का समय 3317 वि0पू0 , शक्ति देव 3256 वि0पू0 पाराशर मुनि 3185 वि0पू0 तथा वेदव्यास देव का 3114 वि0पू0 है। वशिष्ठ का आश्रम वाशिष्ठी वन (वाटी वहुलावन), शक्ति का सकीटरा (गोवर्धन) पराशर का पराशर स्थली (पारासौली गेवर्धन) वेदव्यास का कृष्ण गंगा आश्रम तथा किशन टीला मथुरा के ही परम पुण्य स्थान हैं। वशिष्ठ के पुत्र चित्रकेतु (चित्राल के चिश्ती) गंधर्वराज थे जो आरम्भ में मथुरा शूरसेन जनपद पर शासक थे। इनके पुत्र को इनकी सौतेली माताओं ने विष देकर मार डाला, तब अति शोकाकुल मर्हिष अंगिरा (कुत्सगोत्र प्रवरी) ने योगविद्या द्वारा चैतन्य कर संवाद कराया और राजा को आत्मतत्व का मार्ग उपदेश किया। इस चित्रकेतु राजा का समय 9332 वि0पू0 हैं। वशिष्ठ की व्याघ्री पत्नि से मन्यु आदि क्रोध के पुंज देवता जो सूर्य सेनाओं के अधिपति थे। (सूर्यमन्युमन्यु पति रात्रयों देवता) थे जिनका क्षेत्र ब्रज में नूह नोहर नोहवाल जाट नौहरे आदि था। वशिष्ठ वंशियों ने राजा मुचुकुंद, रंतिदेव, श्राद्धदेव मनु आदि को यज्ञ कराये थे। ये सारस्वतों के आदि पुरूष सारस्वत ऋषि के भी गुरु थे। वशिष्ठ और विश्वामित्र का कलह प्रसिद्ध है। सूर्यवंश की पुरोहिताई, देवों और ऋषियों में सन्मान, नंदिनी कुल का गोवंश आदि कई कारणों को लेकर यह संघर्ष चला । वशिष्ठ के 100 पुत्रों का वध हुआ विश्वमित्र के 50 पुत्र तालजंघों की शरण में जाकर उनमें मिलकर म्लेच्छ (यूनानी पारसी मिश्री अफ़ग़ान अरब) हो गये तब हार मान कर विश्वामित्र इनके शरणागत हुए और वशिष्ठ ने उन्हें क्षमा दान देकर उदारता से ब्रह्मर्षि रूप से स्वीकार कर लिया। वशिष्ठ ने श्राद्ध देव मनु 6379 वि0पू0 को परामर्ष देकर उनका राज्य उनके पुत्रों को बटवाकर दिलाया। ये सभी शूरसेन देश मथुरा के माथुरों के शिष्य थे। इक्ष्वाकु ने 100 रात्रि का कठोर तप करके सूर्य देवता की सिद्धि प्राप्त थी की और वशिष्ठ को गुरु बनाकर उनके उपदेश से अपना पृथक राज्य और राजधानी अयोध्या (आयुधधारी संघ जिससे युद्ध करने का कोई साहस न करे) ऐसी पुरी स्थिपित करायी और वे प्राय: वहीं रहने लगे। वशिष्ठ मुनि की दूसरी पत्नि अरूंधती स्वायंभूमनु के जामात्ट कर्दम मुनि 8932 वि0पू0 (कुमुदवन आश्रम) की पुत्री तथा सांख्य शास्त्र सर्व प्रथम मानव वंश के तत्वज्ञान दर्शनशास्त्र के आविष्कार महर्षि कपिल (8867 वि0पू0) की वहिन थीं। इन्हीं से माथुर गोत्र प्रवर वशिष्ठ शक्ति पाराशर तथा महामहर्षि वेद व्यास शुकमुनि आदि उत्पन्न हुए। माथुर वशिष्ठ आरम्भ से सूर्यवंश के सम्राटों , वैवस्वतमनु 6379 वि0पू0 इक्ष्वाकु 6310 वि0पू0 , नृग 6369 वि0पू0, शर्याति 6307 वि0पू0 नभग 6305 वि0पू0 तथा इला बुध वंश 6369 वि0पू0 का चंद्रवंश के परम सन्मानित राजपुरोहित पद पर प्रतित्ठित रहे। रघु 4181 वि0पू0 , अज 4126 वि0पू0 दशरथ 4086 वि0पू0 तथा श्रीराम भगवान 4024 वि0पू0 के भी पुरोहित रहे। उनने दशरथ को पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया, श्री रामजी को जातकर्म चौल, यज्ञोपवीत विवाह कराया और राम की राज्याभिषेक की पूरी व्यवस्था इन्हीं के द्वारा हुई। ये इक्ष्वाकुवंशी कुवलयाश्व धुंधमार 5946 वि0पू0 धमार गायन के आदि प्रवर्तक के, युवनाश्व 5612 वि0पू0, मांधाता त्रसदस्युयौवनाश्व 5576 वि0पू0 हरिश्चंद 5262 वि0पू0 सगर 4925 वि0पू0 दिलीप 4811 वि0पू0 भागीरथ 4771 वि0पू0, सिन्धु द्वीप 4670 वि0पू0 , दाशराज्ञ युद्ध के विजेता वेद वणित सम्राट सुदास 4475 वि0पू0 , आदि सभी के कुल परम्परा पुज्य राज पुरोहित रहे। वशिष्ठ ही पुष्कर में प्रजापति ब्रह्मा 9400 वि0पू0 के यज्ञ के आचार्य रहे और तप के प्रभाव से पुष्कर सरोवर से प्रगट कर सप्त स्त्रोता नंदा सरस्वती को अपने मथुरा क्षेत्र में लाये और उसका यमुना में संगम कराया। वैदिक काल की देव नदी सरस्वती की 7 धारायें थी इनमें से प्रथम कुरूक्षेत्र की सरस्वती के तट पर वशिष्इ ने 100 पुत्र पाये थे, राजस्थान की सरस्वती (मरूत्वती घघ्घर) मुनि दुर्वासा के शाप से बालुका समुद्र में लुप्त हो गई, द्वारिका की प्रत्यक् सरस्वती अभी भी अपने स्थान पर अपने नदी चिन्ह के रूप में हैं और वर्षा ऋतु में प्रगट प्रवाहित होकर अपने आस्तित्व की साक्षी देती है। इसी सरस्वती के प्राचीन जल प्रपात महासरोवर बहुलावन में महर्षि वशिष्ठ अपनी ब्रह्मदेव से प्राप्त वहुलावंश (वहुत सुस्वाद अमृतमय दुग्ध प्रदा) की गायों को लेकर रहते थे। वशिष्ठ अयोध्या में शरण्यू शतयूपिका (सरयू) के ब्रज में आदि नंदा सरस्वती के, मरूस्थल में मरूतवती सरस्वती के तथा अपने बहुलावन में बहुला सरस्वती, मधुवन में मधुमती कुमुदवन में कुमुद्वती, गोवर्धन में मानसी, कामवन में कामगा, चरणपर्वत बन में चरणगंगा आदि नदियों के प्रगटकर्ता थे तथा इन ही की ही सिद्ध भूसिंचन विद्या , पुण्यतीर्थो की प्रेतोद्धार क्षमता के शिल्प कौशल से प्रेरणा पाकर राजा भगीरथ ने भागीरथी गंगा का अवतरण 4448 वि0पू0 में किया जो आज भी भारतवर्ष की सबसे बढ़ी पुण्यप्रद और जल सिंचन आधार बनी राष्ट्र संवर्धक महान नदी है। इस प्रकार वशिष्ठ कृषि सिंचन प्रणाली के तो आदि प्रवर्तक थे ही वे गोपालन औरं गोवशं संवर्धन और गोवशं विकास और गोमहिमां तथा गो पूजन के वेद शास्त्रों में श्रेष्ठ महत्व दिये जाने की संस्कृति के भी प्रथम आचार्य थे। उन्होंने गोसंवर्धन क्षेत्र गोवर्धन पर्वत के अनेकों बनों से युक्त आदि ब्रन्दावन जो भागवत के मत से विपुल जल तृण वृक्ष फल पुष्पों से परम ससृद्ध था उसमें गोवंश के विकास के कार्य में सभी देवों को प्रेरित करगो भक्त बनाया तथा उनके द्वारा विकसित वंश की बहुला कामधेनु नंदिनी सुरभी कपिला श्यामा धवला आदि गायों में सर्वक्षेष्ठ नंदिनी के वंश की गौ को प्राप्त करने के लिये देव असुर मुनि सभी अति आतुर रहते थे। इस हेतु को लेकर ही उनका विश्वामित्र , सहस्त्राबाहु आदि से कलह हुआ तथा इसी वंश की गोमाता की सेवा और गोपय प्राशन व्रत का अनुष्ठान कराकर उन्होंने महाराजा दिलीप 4811 वि0पू0 को भगीरथ जैसा यशस्वी तेजस्वी पुत्र दिया। अन्य क्षेत्रों की सरस्वती धारायें लुप्त हो जाने पर इनने मथुरा के सरस्वती संगम तीर्थ पर सप्त सारस्वत तीर्थ की स्थापना कर धार्मिक श्रद्धालु प्रजा को सातों सरस्वतियों के स्नान दान का फल प्राप्त करने की सुविधा दी । इसी सिंचन विद्या से इनने संवरण राजा के राज में वारबार अकाल पड़ने पर (सावर काँठा में) सावर मती माही तपती नर्मदा आदि नदियों का प्रवाह संयत कर सिंचन व्यवस्था से उस देश को वृक्षों खेतों लता पत्रों फलो पुष्पों शाक धान्य से परिपूर्ण कर जन संरक्षण का महान प्रयास किया। वशिष्ठ वंश (गोत्र) की महिमा का बहुत विस्तार है जो सभी यहाँ देना सम्भव नहीं है। वशिष्ठ वंशी धीर वीर ज्ञानी शांत क्षमाशील सर्वोपरि ब्रह्मज्ञानी योगी, तपस्वी, लोक कल्याण संवर्धक , विश्व पूज्य तथा ब्रह्मर्षि प्रवर पद प्राप्त थे। वशिष्ठ वंश के रचित अनेक ग्रन्थ अभी उपलब्ध हैं जो लोक शिक्षा और दुर्लभ विद्याओं के आकर ग्रन्थ हैं। वशिष्ठ संहिता, वशिष्ठ कल्प, वशिष्ठ शिक्षा, वशिष्ठ तंत्र , वशिष्ठ पुराण, वशिष्ठ स्मृति , वशिष्ठ श्राद्ध कल्प, आदि इनमें प्रमुख हैं। वेद वक्ताओं में वशिष्ठ ऋग्वेद के 7 वे मण्डल के प्रणेता हैं तथा 9 वें मंडल में भी इनके वंशधरों के अनेक मंत्र हैं। इनके विरोधी और बाद में कृपा पुष्ट विश्वामित्र के भी वशिष्ठ द्वेषी मंत्र ऋग्वेद में हैं। विश्वामित्र द्वारा शक्ति का वध , सौदास कल्माषपाद का पौरोहित्य, के मंत्र भी ऋग्वेद में हैं। प्रवर- तीन प्रवरों में प्रथम वशिष्ठ पदस्थ (तिलकायत) वशिष्ठों का वर्णन हो चुका अब इस परम्परा में उन वशिष्ठ 3339 वि0पू0 के प्रवरों का जो माथुरों के गोत्र संस्थापक थे उनके वंश की विस्तृति इस प्रकार हैं- शक्ति – ये वेदव्यास के तीन पीढी पूर्व के वशिष्ठ के पुत्र थे। इनका समय 3296 वि0पू0 है। इनने अपने पिता से प्राप्त विद्या और प्रताप से विश्वमित्र को शास्त्रवाद में परास्त किया जिससे क्षुब्ध होकर विश्वामित्र ने अपने क्रूर शिष्य सौदास कल्याषपाद द्वारा इनका 100 भाइयों सहित बध करा डाला। जिससे वशिष्ठ अति शोकातुर होकर प्राण त्याग उद्यत होकर विपाशा तट के क्षेत्र में गये जहां पाशवद्ध होकर नदी में कूदने पर भी वे पाशमुक्त हुए। शक्ति की मृत्यु के समय उनकी पत्नि गर्भवती थी। गर्भशिशु ने गर्भ के भीतर से ही इन्हें वेदपाठ सुना कर आशन्वित किया कि मैं आपके तेज को धारण किये हुए हूं। लम्बे समय के बाद उस गर्भ से मुनिवर पाराशर का जन्म हुआ। शक्ति वध कल्माषपद (कलमा पढ़ने वाले) राक्षस समूह की मैत्री से राक्षस बने राजा और उसकी राक्षस सेना द्वारा हुआ , इस घटना का वर्णन ऋग्वेद में हैं। इस राजा के कारण ही राक्षसों म्लेच्छों यवनादिकों का प्रवेश भारत के राजवंशों में हुआ। शक्ति का आश्रम ब्रज का सकीटरा गांव है। पराशर – ये वेद व्यास के पिता मथुरा के माथुर थे। ये 3240 वि0पू0 में वशिष्ठश्रम (बाटी गांव बहुलावन) में जन्में तथा गोवर्धन पर्वत के निकट अपना आश्रम वनाकर रहे। ये महा तपस्वी तेजस्वी और अनेक विद्याओं के पारंगत थे और अनेक शास्त्रों के रचयिता रहे। गर्भ में से ही इनने वेद मंत्रों का पाठ अपने दादा वशिष्ठ जी को सुनाकर निराश जीवन में आशा का संचार देकर उन्हें आनंदित किया। वशिष्ठ इनकी अदृश्यन्ती माता के उदर के समीप कान लगाकर सुनते और अति आनंदित होते थे। इनने तीर्थयात्रा के मार्ग में मथुरा की यमुना धार के मध्य अपना तपोतेज मत्स्य कन्या काली (उपरिचरवसु कन्या) में स्थापित कर बालक वेदव्यास को जन्म दिया जो मथुरापुरी के प्रमुख क्षेत्र माथुरों के आवास स्थल यमुनाद्वीप या कृष्णादीप में माथुरी माताओं द्वारा पाले पोसे जाकर तथा माथुर महामहर्षियों द्वारा वेदादि समग्र विद्याओं और ग्रन्थों को प्राप्तकर सहासमर्थ विश्व के संस्कृति और साहित्य के सर्वश्रेष्ठ मूर्धन्य शास्त्र प्रवर्तक बन गये। पराशर ने अपने पिता के वध का बदला लेने को अपने आश्रम में राक्षस मेध सत्र किया जिसमें भारत से राक्षस वंश को मंत्रो द्वारा हवन कुंडों में भस्म कर देश को राक्षसों के आतंक से मुक्त करने का सराहनीय संकल्प था पराशर के इस महाबिकट प्रचंड आयोजन से राक्षस और उनके पूर्वपुरूष पुलस्त्य पुलह कृतु महाकृतु और उनके पुरोहित अत्रि चंद्रदेव (चंद्रसरोवर) भयभीत हो उठे। वे अपने बन्धु वशिष्ठ के पास आये और अपने वंश की रक्षा के लिए याचना करने लगे। वशिष्ठ के साथ वे राक्षस सत्र में पहुंचे जहां रज्जूबद्ध असुर राक्षस दैत्य दानव बंधे खड़े थे। उनने पराशर से प्रार्थना की वे उन राक्षस प्रमुखों को मुक्त करें क्योंकि वे मूलत: तो ब्राह्मण पुत्र ऋषियों के वंशज ही हैं। पुत्र पराशर तुम यह तो ध्यान करो कि इनमें प्रहलाद वलि वृषपर्ती आदि जैसे देवभक्त भी हुए है। वशिष्ठ ने भी पराशर को ब्राह्मण के क्षमाधन की महता और क्रोध भाव के अधर्म से मुक्त होने की शालीनता का उपदेश किया और गुरुजनों के आग्रह से यह सत्र बीच में ही भंग हुआ। पराशर ने इस यज्ञ की अभिचार अग्नि को तब हिमालय पार के अरवस्थान , सहारा, अफ़ग़ान, विलोच तातार, साइवेरिया आदि देशों के विशाल प्रदेशों में उत्सर्जित कर दी जो महा ज्वाला समूम वायु, मिट्टी का तेल, बारूद के खेल (आतिशबाजी) बन कर उन देशों को जलहीन रेतीला और परस्पर घात प्रतिघात से अपने ही कुलों को नष्ट करने वाला रूप धारण कर अपना काम पूरा कर रही है। पराशर भारतवर्ष के अद्वितिय प्रतिभा सम्पन्न महर्षि थे। उनके रचे ग्रन्थों की संख्या बहुत बड़ी है, इनमें ज्योतिष ग्रंथ पराशर संहिता, पराशर होराशास्त्र , आयुर्वेद ग्रंथ, पराशर-तंत्र, वृद्धपराशर तंत्र, हस्त्यायुर्वेद, गवायुर्वेद , बृक्षायुर्वेद , पाराशर कल्प, विमान विद्या पर पाराशर विमान तंत्र महाग्रंथ पाराशर स्मृति बृहत पाराशर संहिता, पाराशर सिद्धांत , विष्णु पुराण, पाराशर नीतिशास्त्र , पाराशर वास्तुशास्त्र पाराशर गीता (भीष्म ने युधिष्ठर से कही) आदि अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं पराशर वेद मंत्र कर्ताओं में भी श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किये हुए थे। ये विष्णु देवता नारायण के उपासक थे जिन की भक्ति का प्रितपादन इन्होंने अपने पुत्र वेदव्यास के आग्रह से 18 पुराणों की संख्या के अंतर्गत ‘विष्णुपुराण’ की रचना करके किया था। महाभारत की सूचना से ये रूद्र देव के (भूतेश्वर चक्रेश्व कामेश्वर) रूपों के भी भक्त थे। पुष्कर तीर्थ में भी इनने कुछ काल बास किया था और वहां के शिष्यों को ब्रह्मदेव की उपसना प्रदान कर उन्हें पराशर ब्राह्मण संज्ञा देकर अपने प्रिय शिष्य स्वीकार किया था। इनके ही तेजस्वी वंश में शुकमुनि (परमंहस) तथा ब्रह्मदत्त योगी, आदि हुए। व्यास परम्परा आज भी ब्राह्मणों में श्रेष्ठ पदवी युक्त मानी जाती है।

 हम आपको दर्शन करवाने जा रहें हैं वशिष्‍ठ मंदिर की जो हमाचल प्रदेश के ज़िला कुल्लू के वशिष्ठ गांव में है।यह मंदिर मनाली से करीब 6 किलोमटेर दूर ब्यास नदी के तट पर स्तिथ है। शिष्ठ मंदिर 4000 साल से अधिक पुराना माना जाता है।पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि वशिष्‍ठ जो हिंदू धर्म के मुख्‍य 7 ऋषियों में एक थे, उन्होंने अपने पुत्र की विश्‍वामित्र ( एक हिंदू ऋषि ) द्वारा हत्‍या किए जाने के बाद नदी में कूद कर जान देने का प्रयास किया। किन्तु पानी के बहाव में ऋषि बहते गए और इस गांव में आकर बच गए, इसलिए इस गांव को वशिष्‍ठ गांव कहा जाता है। इसके बाद ऋषि वशिष्‍ठ ने इस गांव में अपने जीवन की एक नई शुरूआत की। इस घटना के बाद यहां बहने वाली व्‍यास नदी को विपाशा नदी के नाम से पुकारा जाने लगा था जिसका अर्थ होता है – बंधनों से मुक्‍त। वर्तमान में विपाशा नदी को व्‍यास नदी के नाम से जाना जाता है।

वशिष्ठ गाँव ब्यास नदी के उस पार मनाली से लगभग 3 किमी दूर स्थित एक छोटा सा गाँव है।वशिष्ट गाँव के बारे में कहा जाता है कि इस गाँव के नजदीक छोइड़ नामक झरना है, उस झरने में लोग अपने -बच्चों को मुन्ड़न कराने लाते है। यहाँ मुन्डन कराये बच्चों के बारे में कहते है कि उन्हे भूत प्रेत के ड़र से मुक्ति मिल जाती है। यह खूबसूरत गाँव अपने शानदार गर्म पानी के झरनों और वशिष्ठ मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

 

  • मंदिर परिसर में स्थित झरने के पानी में बहुत अच्छी उपचार शक्तियां हैं, जो कई त्वचा रोगों और अन्य संक्रमणों को ठीक कर सकती हैं।
  • यहां तुर्की शैली के स्नान घर उपलब्ध हैं, जिनमें झरनों का गर्म पानी होता है।
  • पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए अलग-अलग स्नान घर हैं, जो वर्षों से सुसज्जित हैं।
  • मुख्य मन्दिर के ठीक सामने एक अन्य मन्दिर बना है, जिसे श्रीराम जी का मन्दिर बताया जाता है।
  • वशिष्ठ गांव में कई मंदिर हैं जो एक स्थानीय संत वशिष्ठ और भगवान राम को समर्पित हैं।
  • यह मन्दिर लोक शैली में बनाया गया है। मन्दिर में लगायी गयी लकड़ियों में शानदार नक्काशी की गयी है।
  • यहां गेस्ट हाउस लंबे प्रवास के लिए उपलब्ध हैं। (एक महीने 4 से 4 महीने तक)