अश्विनी नक्षत्र

अश्विनी

 

 

नक्षत्रों में सबसे पहला नक्षत्र (जिसमें तीन तारे होते हैं) एक अप्सरा जो बाद में अश्विनी कुमारों की माता मानी जोने लगी सूर्य पत्नी जो कि घोड़ी के रूप में छिपी हुई थी। सूर्य की पत्नी अश्विनी के यमराज पुत्र। जीवन को व्यवस्थित करने के लिए यदि हम अंतरिक्ष का सहारा लेते हैं, ग्रह-नक्षत्रों पर आश्रित होतें हैं तो इसी परा ज्ञान को ज्योतिष विद्या कहते हैं। मानव शरीर दस अवस्थाओं में विभक्त है भ्रूण शिशु किशोर तरूण गृहस्थ प्रवासी भृतक प्रौढ जरठ एवं मुमूर्षु। इन विभिन्न अवस्थाओं से होता हुआ यही शरीर पूर्णता को प्राप्त होता है। जन्मकाल में ग्रह-गोचर जिस स्थिति में होते हैं वैसा ही फल हमें सारे जीवन भोगना पड़ता है। नवग्रह- सूर्य चन्द्र मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनि राहु केतु हमारे नियामक है इन्हें मार्ग निर्धारक, प्रेरक, नियोजक, द्रष्टा, विधाता, स्वामी इत्यादि शब्दों में पिरोया जा सकता है। ये ग्रह बारह राशियों में विचरण करते रहते हैं मेष वृष मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु मकर कुम्भ और मीन में तब इनके अपने पृथक् पृथक्, स्वभाव एवं प्रभाव के वशीभूत होकर ग्रह अलग-अलग फल देते हैं।

परिचय

नक्षत्रों की चर्चा करें तो इनकी व्यापकता अपार है इनके प्रत्येक चरण का पृथक आख्यात है। वैदिक साहित्य में नक्षत्रों का बड़ा सूक्ष्म विश्लेषण है। प्रयोगात्मक दृष्टि से वैज्ञानिकों की अनुसंधानिक उत्सुकता की शान्ति के लिए इसमें पर्याप्त भण्डार है, वैदिक ज्योतिष के मूलाधार में नक्षत्र ही हैं वेद में नक्षत्रों को उडू, रिक्ष, नभ, रोचना, तथा स्त्री पर्याय भी कहा गया है। ऋग्वेद के अनुसार 01.50.2 तथा 6.67.6 में जिस लोक का कभी क्षय नहीं होता उसे नक्षत्र कहा गया है, यजुर्वेद में नक्षत्रों को चन्द्रमा की अप्सरा कहा गया है। तैत्रीय ब्राह्मण का कथन है कि सब नक्षत्र देव ग्रह हैं, जो यह जानता है वह गृही और सुखी होता है ये रोचन है, शोभन है, तथा आकाश को अलंकृत करते हैं। इनके मध्य में सूक्ष्म जल का समुद्र है, ये उसे तरते हैं, तारते हैं, इसीलिये तारा और तारक कहे जाते हैं।

देव ग्रहा: वै नक्षत्राणि य एवं वेद गृही भवति।
रोचन्ते रोचनादिवी सलिलंवोइदमन्तरासीतयदतरस्तंताकानां तारकत्वम्।

तैत्तरीय संहिता एवं तैत्तरीय ब्राह्मण में अनेंक स्थलों पर सत्ताईस नक्षत्रों का उनके स्वामियों के सहित उल्लेख है। चन्द्रमा को नक्षत्रों का स्वामी भी कहा गया है, नक्षत्राणामधि पुन: चन्द्र:, चन्द्रमा को नक्षत्र मण्डल की एक परिक्रमा करने में लगभग 271/2 दिन लगते हैं। इसीलिये नक्षत्र 27 या 28 मानें गये हैं। चूँकि पक्ष 24 और नक्षत्र 27 इसलिये 27 नक्षत्रों के 24 नाम ही रखे गये थे। किन्तु फाल्गुनी आषाढ़ा और भाद्रप्रद तीन नक्षत्रों के दो-दो बराबर भाग करके पूर्वा एवं उत्तरा तीन नक्षत्र और बढ़ाकर 27 की संख्या कर दी गयी। उत्तरा आषाढ़ा एवं श्रवण की कुछ घटियों से अभिजित नक्षत्र का नाम देकर 28 नक्षत्र भी कहीं कहीं ज्योतिष शास्त्र में प्रयुक्त होने लगे। सतपथ ब्राह्मण में भी नक्षत्रों को समस्त देवताओं का घर नक्षत्र लोक ही है ऐसा कहा गया है-

नक्षत्राणि वै सर्वेषां देवानां आयतनं।

नक्षत्र शब्द की निष्पत्ति कपते हुये महर्षि यास्क कहते हैं कि- नक्षत्रे गति कर्मण अर्थात जिस का कभी क्षय नहीं होता वे नक्षत्र हैं। इसी प्रसंग में रिक्ष शब्द निवेचन भी प्राप्त होता है।

ऋक्षाहा: स्तृभि: इति नक्षत्राणां ऋक्षा: उदीराणानि इवख्या चान्ते स्तृभि: त्रीणन्ति इव ख्यायन्ते।
अमी य ऋक्षा: निहितास उच्चा नक्तं ददृश्रे कुह चिद्यि वेयु:।
अदब्धानि वरूणस्य व्रतानि विचाकशच्चन्द्रमा नक्तमेति।।

अर्थात ये तारे नक्षत्र रूप में उन्नत स्थान में बैठे हुये रात्रि में दिखायी देते थे। वे दिन में कहाँ विलीन हो गये। चन्द्रमा भी प्रकाशित होता है, किन्तु वपूण का नियम अटल है। अन्यत्र ऋग्वेद में कहा गया है कि सब दर्शी सूर्य के प्रकट होते हैं नक्षत्रादि सिद्ध चूर के समान छिप जाते हैं-

अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्रुभि:। सूराय विश्वचक्षसे।

ऋग्वेद के दशम मण्डल के पचासीवें सूक्त में कहा गया है कि चन्द्रमा नक्षत्रों के मध्य विचरण करता है, इससे इसमें सोमरस रखा है-

अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहित:।

आगे इसी में यह वर्णन मिलता है कि देवताओं ने नक्षत्रों से आकाश को उसी प्रकार सुसज्जित किया जिस प्रकार काले घोड़े को स्वर्ण के आभूषणों से अलंकृत किया जाता है। उन्होंने प्रकाश को दिन के लिये तथा अन्धकार को रात्रि के लिये नियन्त्रित किया। वृहस्पति ने पर्वत को विदीर्ण कर गौरूपी धन को प्राप्त किया-

अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभि: पितरो द्यामपिंशन्।
रात्र्यां तमो अदध्ज्र्योतिरहन्वृहस्पतिर्भिनदद्रिं विद्दगा:।।

इसी वेद के एक मन्त्र का कथन है कि वरूण पहिया युक्त है, जिन्होंने विस्तृत द्यावा पृथ्वी की स्थापना की, इन्होंने ही आकाश और नक्षत्रों को प्रेरित कर पृथ्वी को प्रशस्त किया- धीरा त्वस्य महिना जनूंषि वि यस्तस्तंम्भ रोदसी चिदूर्वी।

प्र नाकमृष्वं नुनुदे द्विता नक्षत्रं प प्रथच्च भूम:।।

शास्त्रों में प्रथम नक्षत्र के रूप में अश्विनी का परिगणन होता है कहते हैं-

प्रियभूषण: स्वरूप सुभगो
दक्षोस्श्विनीषु मतिमांश्च।

अर्थात् अश्विनी नक्षत्र में जन्म हो तो मनुष्य श्रृंगार प्रिय, अलंकार प्रेमी, सुन्दरतनु, आकर्षक, आकृतिवाला, सब लोगों का प्यारा, कार्य करने में चतुर तथा अत्यंत बुद्धिमान होता है। एक मान्यता यह भी है-

सुरूप: सुभगो दक्ष: स्थूलकायो महाधनी अश्विनीसम्भवो लोके जायते जनवल्लभ:।

अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न मनुष्य सुन्दर, भाग्यवान्, कार्य में कुशल, स्थूल शरीर, धनवान् और लोकप्रिय होता है। नारद संहिता का कथन है-

वस्त्रोपनयनं क्षौर: सीमन्ताभरण क्रिया
स्थापनाश्वादियानं च कृषिविद्यादयोश्विभे।

विहित कार्यों को बतलाते हुए ऋृषि कहते हैं कि वस्त्रधारण, उपनयन, क्षौरकर्म, सीमन्त, आभूषण क्रिया, स्थापनादिकर्म, अश्वादि वाहनकर्म, कृषि, विद्या कर्म आदि अश्विनी नक्षत्र में करना शुभद होता है। यह तो स्पष्ट ही है कि अश्विनी नक्षत्र के स्वामी अश्वनीकुमार हैं नाड़ी- आदि, गण-देवता, राशि स्वामी-मंगल, योनि-अश्व, वश्य-चतुष्पद, वर्ण-क्षत्रिय, राशि-मेष तथा अक्षर हैं चू चे चो ला। इस तरह यह सर्वसुखकारक. तारक कारक नक्षत्र है।

कूर्मचक्र के आधार पर अश्विनी नक्षत्र इशान दिशा को सूचित करता है। इशान कोण से होन वाली घटनाओं या कारणों के लिए किसी भी स्थान में अश्विनी नक्षत्र ग्रहाचार जबाबदार हो सकता है। देश प्रदेश का फलादेश करते समय इशान कोण के प्रदेशों के बारे में अश्विनी नक्षत्र के द्वारा विचार किया जा सकता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार अश्विनी कुमार के पिता सूर्य एवं माता शंग द्वारा दो भाइयों की जोड़ी अश्विनी कुमार को जन्म दिया था। इस परिकथा के अनुसार अश्विनी कुमार स्वर्ग से तीन पहिये वाले घोड़ों से सुते रथ द्वारा स्वर्गारोहण कर रहे हैं। ऐसा सूचित किया गया है जिसके द्वारा हम इस नक्षत्र में जन्मे जातक वौद्धिक रूप से सुदृढ़, विकाशशील निरन्तर प्रगति करने वाले शक्तिशाली एवं भ्रमणशील होने की सम्भावना रहती है। इस नक्षत्र के जातक मिलिटरी, पुलिस, संरक्षण से सम्बन्धित कार्यभार एवं अन्य व्यवस्थाओं मे ज्ञान और बुद्धि के साथ व्यवसायों में विशेष रूचि देखी जाती है।

अश्विनी नक्षत्र से अश्व द्वारा सवारी, वाहन के रूप में विचार कर सकते है। इस कारण नक्षत्र में वाहन तथा ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय के साथ जोड़ा जाता है। अश्विनी नक्षत्र के मानव जीवन पर निम्न प्रभाव पड़ते है- तन्दुरूस्त शरीर, लाल आंखे, आगे निकले हुए दांत एवं चेहरे पर किसी भी प्रकार के निशान दिखायी देते हैं। अश्विनी नक्षत्र के जातक इष्र्याखोर, शौकीन, निर्मय और स्त्रियों में आसक्त होता है।

अश्विनी नक्षत्र में सिर में दर्द, आंख, चमड़ी के दर्द से पीड़ा रहती है एवं सवारी, घुड़सवारी से सम्बन्धित व्यवसाय, ट्रान्सपोर्टेशन, मशीनरी के रूप में कार्य करते हैं। इस नक्षत्र में जन्मी स्त्रियां सुन्दर, धनधान्ययुक्त श्रृंगार में रूचि, मृदुभाषी सहनशील, मनोहर, बुद्धिशाली तथा बड़ों गुरू, माता-पिता और देवी-देवताओं में आस्था रखनेवाली होती है। अश्विनी नक्षत्र जब शुभ ग्रहों से युत या संबन्धित हो तो जातक को शुमत्व प्रदोन करती है इसके विपरीत अशुभ तत्व और तद्संबंधी रोग, बिडम्बना या मुश्किलों का अनुभव कराती है। ऐसे में अधिकतर मस्तक की चोट, मज्जातुंत की बिमारी तथा दिमाग को हानि पहुँचने वाले रोगों में चेचक, मलेरिया तथा कभी-कभी लकवे के योग बनते पाये गये हैं अश्विनी नक्षत्र के जातक सर्वसामान्य एवं रूचिकर होते हैं। इस नक्षत्र का स्वमी ग्रह मंगल है योग, विष्कुभं, जाति-पुरुष, स्वाभाव-शुभ, वर्ण वैश्य तथा विंशोत्तरी दशा अधिपति ग्रह केतु है।

अश्विनी नक्षत्र का गणितीय विस्तार 0 राशि 0 अंश 0 कला से प्रारंभ होकर 0 सराशि 13 अंश 20 कला तक होता है। इस नक्षत्र का रेखांश है। 0 राशि 10 अंश 6 कला से 47 विकला। क्रान्तिवृत से नक्षत्र की दूरी 8 अंश 28 कला 14 विकला उत्तर तथा विषुवत रेखा से 20 अंश 47 कला 36 विकला उत्तर होता है।

अश्विनी नक्षत्र तीन तारों से मिलकर बना है। इसकी आकृति अश्वमुख की भांति है। उत्तर-पूर्व का उल्का तारा हमल है परन्तु अश्विनी नक्षत्र का प्रमुख योग तारा मध्य का बीटा है। प्राचीन काल में बीटा व गामा तारों को अश्वयुज नाम दिया गया था। इन तारों को प्रात:काल पूर्व दिसा में अप्रैल माह के मध्य में उदय होते देखा जा सकता है तथा दिसम्बर माह में रात्रि के नौ बजे से ग्यारह बजे के मध्य ये तारे शिरों बिन्दु पर दिकाई देते हैं। निरयन सूर्य 13-14 अप्रैल को अश्विनी नक्षत्र मनें प्रवेश करता है, सम्पूर्ण अश्विनी नक्षत्र के चरण मेष राशि में होते हैं। अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र में रहता है। अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु होता है। इस नक्षत्र में चन्द्रमा के होने से जातक को आभूषण से प्रेम रहता है। जातक सुन्दर तथा सौभाग्यशाली होता है।

विभूषणेत्सुर्मतिमान् शशांके।
दक्षस्सरूप सुभगोश्विनीषु।।

 

 

 

 

वैदिक काल में राशि नहीं, नक्षत्रों के अनुसार भविष्य कथन किया जाता था। आकाश मंडल में तारों के समूह को नक्षत्र कहते हैं। ये समूह धरती से देखने पर कहीं अश्व, कहीं शकट, सर्प आदि के आकार के नजर जाते हैं।
जिस प्रकार लोक-व्यवहार में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी मील, कोस या किलोमीटर में नापी जाती है, उसी प्रकार आकाश मंडल की दूरी नक्षत्रों से ज्ञात की जाती है।
वैज्ञानिकों ने हमारे आकाश मंडल को 88 नक्षत्र मंडलों में बांटा है, तो वैदिक ऋषियों ने 28 नक्षत्र मंडलों में। आसमान के 12 भागों (राशियों) में बंटवारा कर देने के बाद भी ऋषि-मुनियों ने इसके और सूक्ष्‍म अध्‍ययन के लिए इसे 27 भागों में बांटा जिससे 13 डिग्री 20 मिनट का एक-एक नक्षत्र निकला।

0 से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है- अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती। 28वां नक्षत्र अभिजीत है।
आकाश में चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा पर चलता हुआ 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है। एक राशि में 2.25 नक्षत्र होता है इसीलिए एक नक्षत्र को 4 चरणों में बांटा गया है और एक राशि को 9 चरण प्राप्त हुए हैं। 12 राशियों को 108 चरणों में विभक्त कर दिया गया, यही ‘नवांश’ कहलाए तथा 108 की संख्या के शुभत्व का आधार भी यही ‘नक्षण-चरण’ विभाजन माना जाता है।
आकाश मंडल में प्रथम नक्षत्र है। यह 3-3 तारों का समूह है, जो आकाश मंडल में जनवरी के प्रारंभ में सूर्यास्त के बाद सिर पर दिखाई देता है। वैदिक काल में दो अश्विनी कुमार थे जिनके नाम पर ही इन तारा समूह का नामकरण किया गया है। ‘अश्विनी’ का अर्थ ‘अश्व जैसा’ होता है। धरती पर इस तारे का असर पड़ता है। आंवले के वृक्ष को इसका प्रतीक माना जाता है।

यदि आपका अश्विनी नक्षत्र में हुआ है तो आपकी राशि मेष व जन्म नक्षत्र स्वामी केतु होगा। राशि स्वामी मंगल व केतु का प्रभाव आपके जीवन पर अधिक दिखाई देगा। अवकहड़ा चक्र के अनुसार जातक का वर्ण क्षत्रिय, वश्य चतुष्पद, योनि अश्व, महावैर योनि महिष, गण देव तथा नाड़ी आदि हैं।

*प्रतीक चिन्ह : घोड़ा
*रंग : रक्त लाल
*भाग्यशाली अक्षर : सी और एल
*वृक्ष : आंवला।
*राशि स्वामी : मंगल।
*देवता : केतु, अश्विनी कुमार।

*शारीरिक गठन : सुंदर स्वरूप, स्थूल व मजबूत शरीर। आकर्षक रुपरंग के साथ बड़ी आँखें, चौड़े ललाट वाले होते हैं।
*भौतिक सुख : धनवान तथा भाग्यवान होता है। यह संपूर्ण प्रकार की संपत्तियों को प्राप्त करने वाला, स्त्री और आभूषण तथा पुत्रादि से संतोष प्राप्त करता है।

सकारात्मक पक्ष : बुद्धिमान, नम्र, सत्यवादी, सेवाभावी, कार्यों में कुशल, सर्वजन प्रिय, ईश्वर भक्त, स्वतंत्र चिंतक, ज्योतिष, वैद्य, शास्त्रों में रुचि रखने वाले लोग इस नक्षत्र के होते हैं। लेकिन इस नक्षत्र में जन्मे जातक हठी होते हैं। 30 की उम्र के बाद से अच्छे दिन। 55 के बाद सामान्य।
नकारात्मक पक्ष : यदि में जन्मे व्यक्ति का मंगल या केतु खराब है तो जायदाद संबंधी मामलों से चिंताग्रस्त, क्रोधी, बड़े भाई न हों या भाई रोगग्रस्त हों, महत्वाकांक्षी विचार का हो जाता है। केतु जिन ग्रहों के साथ हो और मंगल की स्थिति जैसी भी हो, वे वैसा परिणाम देते हैं। इनका परिणाम जीवन में मिलता ही है, लेकिन इनकी दशा अंतरदशा में अधिक मिलता है।

भारतीय वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से अश्विनी को पहला नक्षत्र माना जाता है। घोड़े के सिर को अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिह्न माना जाता है जो इस नक्षत्र को घोड़े के बहुत से गुणों के साथ जोड़ता है। उदाहरण के लिए घोड़े को यात्रा का प्रतीक माना जाता है तथा यात्रा अपने आप में किसी प्रकार के आरंभ का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी नक्षत्र का किसी न किसी प्रकार की यात्रा तथा किसी न किसी प्रकार की घटना के आरंभ से सीधा रिश्ता है। इसी प्रकार घोड़ा अपने साहस, गति तथा शक्ति के लिए भी जाना जाता है तथा घोड़े के यह गुण भी अश्विनी नक्षत्र के जातकों में सामान्यता ही पाये जाते हैं। घोड़ा अपनी जिद तथा अड़ियल स्वभाव के लिये भी जाना जाता है तथा घोड़े का यह गुण भी अश्विनी नक्षत्र के माध्यम से व्यवहार में आता है जिसके चलते अश्विनी नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया जिद्दी अथवा अड़ियल स्वभाव के होते हैं तथा इनसे काम निकलवाना कई बार उसी प्रकार से मुश्किल हो जाता है जिस प्रकार किसी अड़ियल घोड़े को सधा कर उस पर सवारी करना। अश्विनी नक्षत्र अपने आप में एक बहुत विलक्षण नक्षत्र है तथा इसके जातक भी बहुत से विलक्षण गुणों के स्वामी होते हैं तथा कुंडली के अच्छा होने की स्थिति में ऐसे जातक अपने जीवन में बहुत से विलक्षण कार्य कर जाते हैं।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी कुमारों को अश्विनी नक्षत्र का देवता माना जाता है। अश्विनी कुमारों को सूर्य देव के पुत्र माना जाता है तथा वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार चिकित्सा शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता हैं जिसके चलते इन्होनें च्यवन ॠषि को वृद्धावस्था से मुक्त करके पुन: युवा बना दिया था। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार स्वभाव से उदार, दूसरों की सहायता को तत्पर रहने वाले तथा स्थान स्थान पर घूमते रहने वाले स्वभाव के हैं तथा अश्विनी कुमारों के चरित्र की यह विशेषताएं अश्विनी नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव मे आने वाले जातकों में भी उपर वर्णित विशेषताएं पायीं जातीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से केतु को अश्विनी नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा केतु के चरित्र की बहुत सी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं। उदाहरण के लिए केतु को किसी प्रकार के आरंभ के साथ जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा इसी प्रकार अश्विनी को भी आरंभ के साथ जुड़ा हुआ नक्षत्र माना जाता है बल्कि अश्विनी तो प्रथम नक्षत्र होने के कारण अपने आप में नक्षत्रों का ही आरंभ दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष में केतु को कई प्रकार के चिकित्सा पद्धतियों के साथ जोड़ा जाता है तथा अश्विनी का भी चिकित्सा क्षेत्र के साथ गहरा संबंध है। इस प्रकार केतु की बहुत सी विशेषताएं इस ग्रह के प्रभाव में आने के कारण अश्विनी नक्षत्र में भी देखीं जातीं हैं।

अश्विनी नक्षत्र के सभी चार चरण मेष राशि में ही स्थित होते हैं जिसके कारण मेष राशि तथा इस राशि के स्वामी मंगल का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव रहता है तथा मेष राशि एवम मंगल ग्रह की कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार होती हैं। मंगल ग्रह के प्रभाव के चलते अश्विनी नक्षत्र में साहस तथा शौर्य जैसी विशेषताएं आ जातीं हैं तथा मेष राशि का अग्नि तत्व अश्विनी को तेज गति से कार्य करने की उर्जा प्रदान करता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार की शक्तियों के प्रभाव में आने के फलस्वरूप अश्विनी इन सभी शक्तियों की विशेषताओं का मिश्रित रूप प्रदर्शित करता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में उपर बताईं गईं विशेषताओं में से बहुत सी विशेषताएं पायीं जातीं हैं। अश्विनी के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने कार्यों को शीघ्रता से आरंभ कर देने में विश्वास रखते हैं तथा इन जातकों को किसी भी प्रकार के कार्य को आरंभ करने से पूर्व प्रतीक्षा करना सामान्यतया बिल्कुल भी पसंद नहीं होता। अश्विनी के जातक समय को व्यर्थ गंवाना बिलकुल भी पसंद नहीं करते तथा गति एवम सपष्टवादिता इन जातकों की मुख्य विशेषताएं होती हैं। अपनी तेज गति तथा नया कार्य करने की विशेषता के कारण अश्विनी जातक कई प्रकार के नए व्यवसाय करने में, नए अविष्कार करने में, नईं खोजें करने में तथा नए प्रयोग करने में प्रत्येक प्रकार के नक्षत्र के जातकों से कई कदम आगे रहते हैं। बातचीत में अश्विनी के जातक बहुत सपष्टवादी होते हैं ऐसे जातक सामान्यतया किसी प्रकार की भूमिका बांधने में समय नष्ट करना पसंद नहीं करते तथा बिना समय गंवाएं सामने वाले व्यक्ति से अपने मन की बात कह देते हैं। अश्विनी जातकों की इस आदत के चलते कई बार सुनने वाला व्यक्ति आहत हो जाता है जिसके चलते इन जातकों को कई बार अशिष्ट अथवा रुखा भी कहा जाता है किन्तु अश्विनी जातक अपने बारे में की जाने वाली ऐसी बातों की तनिक भी चिंता नहीं करते तथा अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करते रहते हैं।

अश्विनी जातक सामान्यतया किसी भी कार्य को करने में बहुत शीघ्रता दिखाते हैं जिसके चलते कई बार ऐसे जातक किसी प्रकार की हानि भी उठाते हैं किन्तु साथ ही साथ अश्विनी जातक अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में अधिक बुद्धिमान भी होते हैं जिसके चलते इन्हें तथ्यों को समझने में अधिक समय नहीं लगता जिससे यह किसी कार्य को शीघ्रता से कर लेने की क्षमता रखते हैं। कुंडली मे अश्विनी नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर अपनी आयु से कम ही दिखते हैं तथा बड़ी आयु में जाकर भी ऐसे जातक अन्य जातकों की तुलना में युवा दिखाई देते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी कुमारों का अपनी आयु से युवा दिखने का कारण अश्विनी कुमारों का इस नक्षत्र पर प्रभाव है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार चिर युवा रहने वाले देवता हैं तथा इनके प्रभाव में आने के कारण अश्विनी के जातक भी अपनी आयु की तुलना में युवा दिखाई देते हैं। कुंडली में अश्विनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्यतया बुद्धिमान, जीवन जीने की कला को जानने वाले, मोहक तथा आकर्षक होते हैं तथा इनका जीवन को जीने का अपना ही एक ढंग होता है। अश्विनी जातकों को रोमांच से भरपूर नए काम करने का तथा रोमांच से भरपूर खेल खेलने का शौक होता है तथा ऐसे जातक बहुत से रोमांचकारी खेलों में हिस्सा लेते हैं। इन जातकों को सामान्यतया खतरों से खेलने का शौक होता है तथा ऐसे जातक नई से नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर रहते हैं तथा अपने इस खतरों से खेलने के शौक के चलते कई बार ये जातक अपने आप को मुसीबत में भी डाल लेते हैं किन्तु मुसीबतें झेलने के बाद भी सामान्यतया ऐसे जातक खतरों से खेलना नहीं छोड़ते। कुंडली में अश्विनी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को मिलनसार बना देता है तथा ऐसे जातक बातचीत करने की कला में भी अच्छे होते हैं जिसके चलते लोग इनके साथ तथा इनकी संगत में रहना पसंद करते हैं।

कुंडली में अश्विनी नक्षत्र के प्रबले प्रभाव के कारण जातक कई प्रकार की नकारत्मक प्रवृतियों का आदी भी हो जाता है। उदाहरण के लिए अश्विनी के प्रबल प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातक प्रत्येक कार्य को शीघ्र से शीघ्र करने की कोशिश में रहते हैं तथा अपनी इस आदत के चलते ऐसे जातक बहुत से ऐसे कार्यों को करने में सक्षम नहीं होते जिन्हें करने के लिए धैर्य तथा सहनशीलता की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि धैर्य तथा सहनशीलता आम तौर पर अश्विनी जातकों के पास बिल्कुल भी नहीं होते। अश्विनी के जातक अधिकतर स्थितियों में शीघ्र परिणामों की अपेक्षा रखते हैं तथा शीघ्र परिणाम प्राप्त न होने की स्थिति में आम तौर पर ये जातक कार्य को अधूरा ही छोड़ देते हैं तथा किसी अन्य कार्य में अपना ध्यान लगा देते हैं। अपनी इस आदत के चलते कई अश्विनी जातक जीवन भर अपने व्यवसाय बदलते रहते हैं तथा जिस भी किसी व्यवसाय से इन्हें कुछ समय तक सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होते, ये उस व्यवसाय को छोड़ कर नए व्यवसाय की खोज में लग जाते हैं। इसलिए बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में अश्विनी के प्रबल प्रभाव वाले जातकों को अपने जीवन में धैर्य तथा सहनशीलता सीखना बहुत आवश्यक है तथा जो अश्विनी जातक अपने भीतर इन गुणों का विकास कर लेने में सक्षम हो जाते हैं वे अपने जीवन में बहुत सफल हो जाते हैं।

कुंडली में अश्विनी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को जिद्दी अथवा बहुत जिद्दी भी बना सकता है जिसके चलते ऐसे जातक एक बार जो निर्णय ले लेते हैं, उसे बदल पाना बहुत कठिन हो जाता है तथा अपनी इस जिद के कारण ये जातक जीवन में कई बार भारी हानि उठाते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह घोड़े का सिर यह दर्शाता है कि इस नक्षत्र का घोड़े के गुणों के साथ गहरा संबंध है तथा जिद्दी होना घोड़े के स्वभाव का एक विशेष गुण है जो अश्विनी के जातकों में भी आ जाता है जिसके चलते अश्विनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों से इनकी जिद के विपरीत कोई कार्य करवाना वैसे ही कठिन हो जाता है जैसे किसी अड़ियल घोड़े को बस में करना। अपनी इसी आदत के चलते अश्विनी के जातक जीवन में बहुत बार अपने सबसे बड़े शुभचिंतकों की सलाह भी नहीं मानते जिसके चलते इन्हें अपने जीवन में कई बार बहुत भारी हानि भी उठानी पड़ती है। किन्तु अपने जीवन में बार बार हानि उठाने के बाद भी अधिकतर अश्विनी जातक अपनी गलतियों से सीख नहीं लेते तथा अपने स्वभाव की कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं करते। जो अश्विनी जातक अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन लाने में सक्षम हो जाते हैं वे दूसरे अश्विनी जातकों की तुलना में जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में अधिक सफल देखे जाते हैं।

आइए अब चर्चा करते हैं अश्विनी नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जानी वाली गुण मिलान की प्रणाली में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी को पुरुष नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस लिंग निर्धारण का कारण अश्विनी के उपर अश्विनी कुमारों, केतु तथा मंगल का प्रभाव मानते हैं क्योंकि ये सभी के सभी ग्रह तथा देव पुरुष लिंग के ही हैं। वैदिक ज्योतिष में अश्विनी को वर्ण से वैश्य माना जाता है जिसका कारण कुछ विद्वान इस नक्षत्र का व्यापार क्षेत्र के साथ जुड़ा होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष अश्विनी नक्षत्र को गण में देव तथा गुण में सात्विक मानता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी अश्विनी नक्षत्र के इस गण तथा गुण निर्धारण का कारण इसके देवता अश्विनी कुमारों को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

❝  काल  की  विलक्षणता  वश  देशो  की  अपेक्षानुसार  जो  तथ्य  बहुत  प्रासंगिक  होते  है  वे वर्तमान  मे  महत्वपूर्ण  नही  रहते  और  भविष्य  मे उनका  परिदृष्य  ही  परिवर्तित  हो  जाता है 

ज्योतिष शास्त्र की आत्मा का स्थान नक्षत्र विचार है। वाङमय मे इसके अनेक प्रमाण है कि प्राचीन काल मे ज्योतिष का व्यवहार नक्षत्र आधारित ही था। अतः नक्षत्र ज्योतिष शास्त्र की नीव है जिस पर ज्योतिष प्रवर्तको, ऋषियो, मनीषियो  ने भारतीय ज्योतिष का सुरम्य प्रसाद खड़ा किया है।

अश्विनी
राशि चक्र मे 00 अंश 13 अंश 20 कला के विस्तार वाला क्षेत्र अश्विनी नक्षत्र कहलाता है। अश्विनी नाम दो अश्विन से बना है।  ग्रीक मे इसको कस्टर और पोलुक्स, अरब मंजिल मे अल शरतेैन, चीन के सियु मे ल्यु कहते है। ” “चकलय” और खंडकातक के अनुसार अश्विनी समूह दो अश्वनियो का प्रतीक दो तारो का समूह है। कालब्रुक और बाद की धरणाओ के अनुसार अश्विनी नक्षत्र दो अश्व मुख के प्रतीक तीन तारो का समूह है।
देवता-अश्विनी कुमार  स्वामी-केतु  राशि-मेष 00 अंश से 13 अंश 20 कला
भारतीय खगोल मे अश्विनी प्रथम नक्षत्र है। इसके तीन तारे है। इसी से मेष राशि और वसंत विषुव का प्रारम्भ होता है।  अश्विनी से लगभग 400 वर्ष पूर्व से गणना की जाने लगी है। मुहूर्त ज्योतिष मे इसे लघु क्षिप्र नक्षत्र कहते है। यह निश्चित, यथार्थ, कोमल, नाजुक कार्यो मे लाभ दायक है। यह शुभ, सात्विक पुरुष नक्षत्र है। इसकी जाति वैश्य, योनि अश्व, योनि वैर महिष गण देव, नाडी आदि है।  यह दक्षिण दिशा का स्वामी है।

अश्विनीकुमार

प्रतीकवाद :  अश्विनी कुमार इसके देवता माने जाते है। पौराणिकता अनुसार एक जुड़वा अश्व सिर  वाले देवता है, जो आकाश और पृथ्वी पर पहले चिकित्सक है। अश्विनी का अर्थ घोड़ी या घोडी रूप स्त्री और कुमार का अर्थ हमेशा सनातन या युवा होता है। कथानक है कि सूर्य की पत्नी संजना (छाया) छलावे से घोड़ी बनकर विचरण कर रही थी, उसके छल को देखकर सूर्य भी घोडा बन गए और साथ मे विचरण करने लगे। दोनो के सहवास से दो घोडा सर और धड़ मनुष्य रूप मे अश्विनी कुमार का जन्म हुआ। अश्विनी कुमार ज्ञान और गति के देवता माने जाते है।

विशेषताऐ : यह जीवन के उत्तरार्ध मे लक्षण परिवर्तन का कारक है। जातक जीवन मे शीध्र उन्नति करता है। जातक सुंदर, उज्ज्वल, बुद्धिमान, होशियार होता है।
अश्विनी कुमार को चिकित्सा शिक्षा सूर्य से लेने मे इन्द्र ने अड़चन डाली लेकिन उन्होंने भक्ति और समर्पण से शिक्षा प्राप्त करली। इस कारण से जातक को चिकित्सा शिक्षा मे बाधा आती है, परन्तु जातक की लगन से पूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि अश्विनी जातक का ज्येष्ठा नक्षत्र (देवता-इन्द्र) के जातक से विरोध रहता है।

अश्विनी विभूतिया :
भारत रत्न रविन्द्रनाथ टैगोर का सायन चन्द्र अश्विनी के चतुर्थ  चरण मे था ।
डा, मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिकन गाँधी)  का निरयण लग्न अश्वनी चतुर्थ चरण मे था।
एडमंड हिलेरी (एवरेस्ट पर्वतारोही) का निरयण चंद्र अश्विनी द्वितीय चरण मे था।

अश्विनी फलादेश : अश्वनी नक्षत्र से लगभग 400 ई.पू. गणना की जाने लगी और यह पहला नक्षत्र माना गया। यह परिवहन का नक्षत्र भी है।  जातक सुन्दर, भाग्यवान, कार्यकुशल, स्थूल देह, धनवान, लोकप्रिय होता है। चन्द्रमा के दिन उत्पन्न जातक सैनिक कमाण्डर, चिकित्सक, घोड़ो या पशुओ का स्वामी या व्यापारी होगा। अश्विनी स्वच्छ का प्रतीक है। अतएव स्फूर्ति, शुरुआत का का कारक है।  इसकी शुरुआत भीन्न प्रकार की है। जातक चंचल, नायक, खर्चीला, हमेशा युवा दिखने वाला, भ्रष्ट, पथ प्रदर्शक, अदम्य साहसी होता है।
 
पुरुष जातक* सुन्दर मुखाकृति, आंखे बड़ी, चमकीली उन्नत ललाट लम्बी नाक होती है।  जातक हठी, शांत, निश्चल, कार्य को अगोचर रूप से करनेवाला होता है।  ये लक्षण 14 से 20 अप्रेल अश्विनी मे उच्च का सूर्य और 14 से 28 अक्टूम्बर स्वाति मे नीच का सूर्य मे विशेष परिलक्षित होते है। ये गुणधर्म अन्य माहो मे जन्मे जातक मे कम होते है। जातक विश्वनीय, सच्चामित्र, सलाह मानने वाला, निंदा से डरपोक, समय पर कार्य करनेवाला, अन्धविश्वास रहित, आधुनिक परम्परावादी होता है। 30 वर्ष की उम्र तक अड़चन संघर्ष, 30 से 55 के मध्य जीवन स्थिर होकर उन्नति होती है। सामान्यतया विवाह 26 से 30 वर्ष मे होता है।

स्त्री जातक  मे गुणदोष पुरुष जातक के समान होते है अंतर इस प्रकार है। स्त्री जातक की आँखे मछली के समान चमकीली होती है।  वक्तित्व मे आकर्षण होता है। पवित्र ह्रदय वाली, आधुनिक होते हुए भी परम्परानुसार वरिष्ठो का सम्मान करनेवाली होती है। यह  यौन क्रियाओ मे अत्यधिक लिप्त रहती है। यदि नौकरी करती है तो प्रशानिक सेवाओ मे रहती है और 50 की उम्र मे सेवा निवृत्ति लेलेती है।  विवाह 23 से 26 के मध्य होता है, यदि विवाह जल्दी हो जाता है, तो तलाक, दीर्घ अवधि का वियोग या वैधव्य होता है।

(जातक*  वह प्राणी जिसके जन्मांग का विचार किया जा रहा हो उसे जातक कहते है।)

आचार्यो अनुसारअश्विनी फलादेश :
अश्विनी नक्षत्रोपन्न जातक सुरूप, सुन्दर, सुभग, सब कार्यो मे दक्ष, सुन-समझकर स्वमति से अमल करनेवाला, वस्त्राभूषण युक्त, स्त्रियो का आकर्षण केंद्र, सत्यवादी, तथ्यान्वेषक होता है।  – ऋषि नारद

जातक राजकीय नौकरी मे हो, तो सरकार इससे विशेष खुश रहती है। रोजगार मे हो, तो उच्च लोगो से संपर्क बनाना इसका शौक होता है। यह नफासत पसंद, मान-सम्मान का विशेष ख्याल रखनेवाला, शूर, निडर, जड़ी-बूटी तथा पारम्परिक चिकित्सा मे रुचिवान होता है।  -ऋषि पराशर

  • चन्द्र – यदि चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक विनम्र, आभूषणो का शौकीन, संगीत-कला-परिवार प्रेमी, ईश्वर भक्त, लोकप्रिय, बुद्धिमान होता है।
  • वराहमिहिर अनुसार अश्विनी मे चन्द्र प्रभाव सुखद आभाष, शिष्टाचार और ज्ञान, उत्कृष्टता का कारक है।
  • सूर्य – यदि सूर्य अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक वैभव युक्त, धमंडी, आक्रामक, आतंकवादी, जिद्दी, व्यापारी, नेता, शक्ति और प्रसिद्धि का इच्छुक होता है।
  • लग्न – यदि लग्न अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक साहसी, महान विचार वाला, यात्रा प्रेमी, चुंबकीय आकर्षण वाला  शील युक्त, दक्ष, निडर होता है।  यह अत्यधिक भोजन करने वाला, दवाओ का नशेड़ी होता है।  (नोबल पुरष्कार विजेता मार्टिन लूथर किंग का जन्म लग्न (निरयण) अश्विनी  नक्षत्र  था।)

चरण फल प्रत्येक नक्षत्र मे चार चरण होते है और एक चरण 3 अंश 20 कला का होता है। यह नवमांश जैसा ही है यानि इससे राशि के नौ वे भाग का फलित मिलता है। प्रत्येक चरण मे तीन ग्रह का प्रभाव होता है 1- राशि स्वामी, 2- नक्षत्र स्वामी, 3- चरण स्वामी।

प्रथम चरण :  इसमे मंगल, केतु और मंगल  ♂ ☋ ♂ का प्रभाव है। मेष 00 अंश से 03 अंश 20 कला।  इसका स्वामी मंगल है। यह शारारिक क्रिया, साहस, प्रेरणा, प्रारम्भ का द्योतक है। जातक मध्यम कद, बकरे जैसा मुंह, छोटी नाक और भुजा, कर्कश आवाज, संकुचित नेत्र, कृश, धायल अथवा नष्ट अंग वाला होता है।
इसके गुणदोष – शारारिक सक्रियता, साहस, प्रोत्साहन, आवेगी बली. भावनावश  परिणाम की बिना चिंता कार्य है। जातक नृप सामान, निर्भीक, साहसी, अफवाहो के प्रति आकर्षित, मितव्ययी, वासनायुक्त, भावुक होता है।

द्वितीय चरण :  इसमे मंगल, केतु और शुक्र ♂ ☋ ♀ का प्रभाव है। मेष 03 अंश 20 कला से 06 अंश 40 कला। इसका स्वामी शुक्र है। यह अवबोध, अविष्कार, साकार कल्पना का द्योतक है। जातक श्याम वर्णी, चौड़े कन्धे, लम्बी नाक, लम्बी भुजा, छोटा ललाट, खिले नेत्र, मधुर वाणी, कमजोर जोड़ वाला होता है।
इसके गुणदोष – अवबोध, आविष्कारी, अश्विनीकुमार जैसी सदभावना, कल्पनाओ (भौतिक) को साकार करना है।  जातक धार्मीक, हंसमुख, धनवान होता है।

तृतीय चरण  :  इसमे मंगल, केतु और बुध ♂ ☋ ☿ का प्रभाव है। मेष 06|40 से 10|00 अंश। इसका स्वामी बुध है। यह विनोद, संचार, फुर्ती, व्यापकता का द्योतक है।  जातक काले बिखरे बाल, सुन्दर नेत्र व  नाक, गौर वर्ण, वाकपटु, पतले जांध व नितम्ब वाला होता है।
इसके गुणदोष – विनोद, आदान-प्रदान, विस्तीर्ण योग्यता, दिमागी फुर्ती है। जातक विद्वान, ज्ञानवान, भोजन प्रेमी, भौतिकवादी, अशांत, तर्क आधारी, साहसिक होता है।

चतुर्थ चरण :   इसमे मंगल, केतु और चन्द्र ♂ ☋ ☾ का प्रभाव है। मेष 10|00 से 13|20 अंश , इसका स्वामी चन्द्र है। यह चेतना, भावुकता, सहानुभूति का द्योतक है। जातक व्याकुल नेत्र, साहसी, ठिगना, नट अथवा नृत्यक, भ्रमणशील; खुरदरे नख, विरल कड़े रोम, कृश, भाई हीन होता है।
इसके गुणदोष – सामूहिक चेतना, महत्व, जानकारी, भावुकता है। जातक ईश्वर से डरने वाला, धार्मिक, पौरुषयुक्त, स्त्री संग प्रेमी, चरित्रवान, गुरुभक्त होता है।

नक्षत्र के चरण फल को आचार्यो ने सूत्र रूप मे कहा है परन्तु फलित मे बहुत अंतर है।

☀ यवनाचार्य मतेन – अश्विनी के प्रथम चरण मे तस्कर, द्वितीय मे कामचोर, तृतीय मे सुभग, सुन्दर, चतुर्थ मे सुखी और दीर्धायु होता है।
☀ मानसागराचार्य मतेन – अश्विनी के प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय मे धनवान, तृतीय मे विद्वान, चतुर्थ मे गुरुभक्त  होता है।

नक्षत्र  चरण मे ग्रह फल
भातीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि या पाद दृष्टि नही होती क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है।
सूर्य

❉ सूर्य पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक दयालु, कृपालु, मददगार होता है।
❉ सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक क्रूर, रक्तिम नेत्रो वाला, क्रोधी होता है।
❉ सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक सह्रदय, राजकीय शक्तियो का उपयोगी होता है।
❉ सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन और कार्य मे उसका मन नही होता है।

अश्विनी सूर्य चरण फल
प्रथम चरण – जातक वाकपटु, आत्मविश्वासी, उत्साही, शासकीय संस्था मे उच्च पदासीन, समाज मे शक्तिशाली, प्रसिद्ध मंदिरो (विशेषकर पहाड़ स्थित) का तीर्थयात्री, स्पष्टवादी होता है। इसके पत्नी से मधुर सम्बन्ध होते है लेकिन अहंकारवश कुछ समस्याये होती है, पहले पुत्र के जीवन मे बाधाऐ होती है। जातक ह्रष्ट, पुष्ट और स्वस्थ रहता है।

द्वितीय चरण –  जातक छोटी उम्र मे धनवान हो जाता है किन्तु क़ानूनी उलझन मे धन खोना पड़ता है। विदेश मे रहने पर निर्धन और अस्वस्थ, शासकीय सहायता प्राप्त होता है। परिवार मे विरोधाभास होता है। संधर्ष कर खोया धन प्राप्त करनेवाला, नैत्र रोगी होता है।
❉ मतान्तर –  इस चरण मे सूर्य राशि चक्र की परिक्रमा पूर्ण कर विश्राम की अवस्था मे होने के कारण अशुभ परिणाम देता है। सूर्य की सुप्तावस्था मे दुष्ट शक्तिया प्रभावी होने के कारण जातक निर्धन या भिखारी हो जाता है।
❉  इस चरण मे सूर्य से चन्द्रमा युक्त हो, तो दुष्परिणाम गहन होते है। प्रायः 8 वर्ष से पहले बालारिष्ट हो सकता है तथा आयु की दीर्घता भी संदिग्ध होती है। इसके अपवाद के रूप मे यदि मंगल का प्रभाव या दृष्टि हो तो परिणाम अच्छे होते है।

तृतीय चरण – जातक धनवान किन्तु समाज मे प्रतिष्ठाहीन, कृषि से सम्पत्तिवान, सम्पदा-जमीन-जायदाद का दलाल, कर्मठ, स्व परिश्रम से व्यवसाय मे उन्नत, साधारण स्वस्थ होता है। इसका पिता क़ानूनी मामले मे धन खोने वाला होता है।

चतुर्थ चरण – जातक आध्यात्मिक और दैविक ज्ञानी, कृषि से सम्पत्तिवान, परिवार प्रिय, सेनाध्यक्ष या नेता अत्यधिक धनी नही पर समाज मे प्रतिष्ठित, यात्राप्रेमी, दानी, भूखो को निशुल्क आहार कराने वाला होता है। यदि सूर्य 8-10 अंश का हो, तो अधिक सुखद परिणाम होते है।

चन्द्र :
❉ यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक उन लोगो पर कृपालु होता है जो उससे सहायता की अपेक्षा रखते हो। लेकिन उसकी मानसिकता क्रूर होगी।  वह सरकारी शक्तियो का उपयोग करेगा।
❉ यदि मंगल से दृष्ट हो, तो कान व दांत की पीड़ा रहेगी तथा समाज के कुछ वर्गों पर निर्भर रहेगा।
❉ यदि बुध से दृष्ट हो, तो प्रसिद्धि प्राप्त करेगा और जीवन के सभी सुख भोगेगा।
❉ यदि गुरु  से दृष्ट हो, तो जातक बहुत ही विद्वान् और दुसरो को ज्ञान प्रदान करेगा।
❉ यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक स्त्रियो की संगत मे रहेगा और धनवान होगा।
❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो  स्वास्थ्य खराब रहेगा, दूसरो के प्रति कठोर और अच्छी संतान के लिए तरसेगा।

अश्विनी चन्द्र चरण फल
प्रथम चरण – जातक पतला और छोटे कद वाला, सामान्य सुन्दर, मानसिक या रक्त विकार या कफ जन्य रोग से ग्रसित, दुर्बल, कामुक, असफल प्रेमी, कर्कश, अभागा, वस्त्राभूषण का शौकीन, राज्य से लाभी, सेना से सम्बंधित, भूमिलाभी, धनवान होता है। विद्वानो से विचार विमर्श करनेवाला होता है। यदि लग्न और गुरु इस चरण मे हो, तो दीर्धायु होता है।

द्वितीय चरण – जातक मोहक, रूपवान, मजबूत हड्डीवाला, मधुर वाणी वाला, धन-वैभव युक्त, संततिवान, ईश्वरभक्त, संगीत और कला प्रेमी, रूपाजीवी, डाक्टर या वैद्य, आथित्य प्रेमी, स्त्रियो का आकर्षण केंद्र होता है।
❉ मतान्तर – जातक लम्बे कद वाला, चतुर, मदिरा आदि का शौकीन, स्त्रियो से परेशान, महत्वाकांक्षी स्वार्थी होता है। चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक भाग्यशाली होगा और पुत्रो के साथ सुखी जीवन व्यतीत करेगा। शनि की दृष्टि होगी तो जातक ईर्ष्यालु, दयनीय, अप्रसन्न होता है और कुअवसरो का सामना करता है। स्त्री जातक मे चन्द्रमा की प्रतियुति मंगल व राहु से हो, तो 30 वर्ष की उम्र मे वैधव्य होगा।

तृतीय चरण – जातक गौरवर्णी,  सुन्दर, सुदृढ़ अंग-प्रत्यंग, वार्ता कुशल,  प्रभावी वक्ता, प्रसन्नचित्त, वणिक, धनवान, विद्वान्, बुद्धिमान, कार्य को कुशलता से निपटाने वाला सत्यवादी होता है।  कोई-कोई जातक त्वचा रोगी या त्वचा रोग विशेषज्ञ होता है।

चतुर्थ चरण – इस चरण मे सूर्य चन्द्र की युति न हो, तो यह स्थिति बहुत अच्छी है। जातक शुष्क त्वचा, क्रश, सौम्य, विनम्र, स्त्रियो का प्रिय, यशश्वी, राज्य सम्मानी, कन्या संतति वाला, विश्व्वनीय होता है। यदि चन्द्र 12-13 अंश का हो, तो जातक प्रशासनिक सेवा मे अधिकारी या शासन मे उच्च पद पर या डाक्टर होता है।
✷ प्राचीन धरणाओ अनुसार अश्विनी नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अश्विन का प्रमुख कार्य चिकित्सा है। अतः इस चरण मे उत्पन्न डाक्टर चिकित्सा के क्षेत्र मे सफल होते है।  यदि लग्न इस चरण मे हो और चन्द्रमा अन्यत्र हो, तो भी वही परिणाम होता है।

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प्रत्येक नक्षत्र जो हम रात को आकाश में देखते हैं, एक जलता हुआ सूर्य है जो हमारे सूर्य से मिलता-जुलता है| खगोल विज्ञान में जिन जुड़वाँ नक्षत्रों से अश्विनी नक्षत्र का निर्माण होता है उन्हें अल्फा अरिएटीस और बीटा एरिटिस कहते हैं। वास्तव में वैदिक ज्योतिष में अश्विनी नक्षत्र के अधिपति देव दिव्य जुड़वाँ चिकित्सक अश्विनी कुमार हैं| अश्विनी नक्षत्र में पैदा हुए लोग परंपरागत रूप से चिकित्सा क्षेत्र में अपना कैरियर बना सकते हैं| उनके अन्दर सहज रूप से दूसरों को ठीक करने की क्षमता व एक चिकित्सीय ऊर्जा विद्यमान होती है जो कि प्रार्थना के माध्यम से कई गुणा बढ़ सकती है| अश्विनी कुमारों का युवा रूप है तथा वे इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोगों को एक आकर्षक व मासूम रूप प्रदान करते हैं। इस नक्षत्र का प्रतीक घोड़े का सिर है, जो शक्ति, गरिमा व तीव्रता का प्रतीक है। नक्षत्र चक्र में अश्विनी प्रथम नक्षत्र है इसलिए यह प्रारंभिक उर्जा से संबंधित है| इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अग्रणी विचारों वाले व पहल करने वाले होते हैं| उन्हें ऐसे कार्यों की शुरुआत नही करनी चाहिए जिन्हें वे पूरा न कर सकें| अश्विनी को समस्त नक्षत्रों में सबसे तीव्र माना जाता है इसलिए ऐसे लोग स्पष्ट बोलने वाले तथा सीधे मुद्दे की बात करने वाले होते हैं| बस एक अदम्य घोड़े की तरह वे भरोसेमंद और स्वतंत्र हो सकते हैं लेकिन किसी की सलाह को पसंद नही करते हैं| अश्विनी नक्षत्र में पैदा लोग आत्म सुधार पर ध्यान केंद्रित करने वाले होते हैं तथा अपने साथियों के बीच स्वयं को अद्वितीय महसूस कराना चाहते हैं| यह बुद्धिमता व निष्कपटता से भरा एक स्वैच्छिक नक्षत्र है|

सामान्य विशेषताएँ: सौम्य और चित्ताकर्षक व्यवहार, रूपवान, प्रतिभाशाली व बुद्धिमान, कार्य कुशल
अनुवाद: “घुड़सवारिका” या एक घोड़े से जन्म”
प्रतीक: एक घोड़े का सिर
पशु प्रतीक: एक नर घोडा
अधिपति देव: अश्विनी कुमार सुनहरा कवच धारण किए हुए अश्व-मुख वाले जुड़वाँ देव थे| जिन्हें प्राचीन विद्या का गहन ज्ञान था तथा जिन्होंने देवताओं के चिकित्सक के रूप में अनेक चमत्कार किए|
शासक ग्रह: केतु
केतु ग्रह के अधिपति देव: गणेश
प्रकृति: देव
ढंग: सक्रिय
संख्या: 1
लिंग: पुरुष
दोष: वात
गुण: सत्व
तत्व: पृथ्वी
प्रकृति: चर
पक्षी: जंगली गस्र्ड
सामान्य नाम: नक्सवोमिका
वानस्पतिक नाम: स्ट्राइकोनसुकुमिका
बीज ध्वनि: चू, चे, चो, ला (अश्विनी के पद देखें)
ग्रह से संबंध: मेष राशि के स्वामी के रूप में मंगल तथा अश्विनी के प्रथम पद में उच्च का होने के कारण सूर्य इस नक्षत्र से संबंधित हैं|
प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया जाता है जिन्हें पद कहते हैं| अश्विनी नक्षत्र के विभिन्न पदों में जन्म लेने वाले लोगों के अधिक विशिष्ट लक्षण होते हैं:

Ashwini Nakshatra Hindi

पद:

प्रथम पद मेष राशि का 00°00′ – 03°19′ भाग मंगल ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: चू
सूचक शब्द: संचालित
द्वितीय पद मेष राशि का 0320′- 06°39′ भाग शुक्र ग्रह द्वारा शासित
ध्वनि: चे
सूचक शब्द: विलासिता
तृतीय पद मेष राशि का 06°40′ – 09°59′ भाग बुध ग्रह द्वारा शासित
ध्वनि: चो
सूचक शब्द: तीव्र बुद्धि
चतुर्थ पद मेष राशि का 10°00′ – 13°19′ भाग चंद्र ग्रह द्वारा शासित
ध्वनि: ला
सूचक शब्द: सहानुभूति

शक्ति: युवा; चिरयुवा; चंचलता से भरा; निडर; निष्कपट; सक्षम कार्यकर्ता; नई कार्यों को शुरू करने की प्रेरणा; बुद्धिमान; आत्मनिर्भर; प्राकृतिक आरोग्यसाधक; सहायक; मर्यादित आदतें; उत्तम वस्त्र पहनने वाला; उत्तम आर्थिक स्थिति वाला ; आकर्षक; शक्तिशाली; सहज ज्ञान युक्त; आदर्शवादी; आध्यात्मिक स्वभाव; साहसी; स्वतंत्र; बलवान; बलशाली; आकर्षक; चंचल प्रकृति; परिवार से प्रेम करने वाला; यात्री; चिकित्सा या आत्म सुधार से जुड़े कार्यों में रूचि

कमजोरियाँ: कार्य में जल्दबाजी करने वाला, आवेगशील; किसी की सलाह न लेने वाला; जीवन में नए अनुभवों को पाने के चक्कर में पुराने कार्यों को अधूरा छोड़ने वाला ; आक्रामक; ज़िद्दी; अपने तरीके से काम करने वाला; जब कार्य योजना के अनुरूप न हो तब निराश होने वाला; असंतुष्ट; अभिमानी; मानसिक शांति की कमी; अति भावुक

कार्यक्षेत्र: प्रेरक प्रशिक्षक, अभियान प्रबंधक, प्रचारक कार्य करने वाला, खिलाड़ी, खेल संबंधी कार्य, घुड़सवारी संबंधित उद्योग, हवाई जहाज / मोटर-संबंधी/ नाव / घुड़सवारी संबंधी कार्य, सैन्य, कानून प्रवर्तन, अभियांत्रिकी, जौहरी, चिकित्सीय कार्य, उपचार संबंधी कार्य, औषधि विक्रेता, परामर्शदाता, औषधि-विशेषज्ञ,साहसिक कार्य करने वाला, अन्वेषक, शोधकर्ता, ठेकेदार, करतब दिखाने वाला, माली।

अश्विनी नक्षत्र में जन्में प्रसिद्ध लोग: पामेला एंडरसन, सेलीन डियोन, वॉरेन हार्डिंग, जॉन एडम्स

अनुकूल गतिविधियां: कार्य या परियोजनाएं प्रारंभ करना, आध्यात्मिक गतिविधियों को शुरु करना, नींव रखना, बीज रोपण, स्वास्थ्य और तंदुरस्ती संबंधी कार्यक्रम, सगाई (लेकिन शादी नहीं), यात्रा, खरीददारी, गृह प्रवेश

प्रतिकूल गतिविधियां: शादी या वैवाहिक आनंद, कार्यों को पूर्ण करना, शराब का सेवन, विश्राम करना, भावनात्मक या यौन गतिविधियाँ

पवित्र मंदिर: श्री भव औषधीश्वर मंदिर

भारत में तमिलनाडु के थिरुथुरैपूण्डी नामक गांव में अश्विनी नक्षत्र से संबंधित यह पवित्र मंदिर स्थित है। जो लोग अश्विनी नक्षत्र में पैदा हुए हैं उन्हें जितनी बार संभव हो इस मंदिर की यात्रा करनी चाहिए|

“श्री भव औषधीश्वर” नाम का यह मंदिर भगवान शिव के एक रूप से संबंधित है। “श्री” एक मंत्र है जो सम्मान व उत्तम भाग्य प्रदान करता है| “भव” का अर्थ मन की अवस्था व “औषधीश्वर” का मतलब चिकित्सीय देव हैं जो रोग को ठीक करते हैं| श्री भव औषधीश्वर एक पवित्र मंदिर है जो रोग नाशक उर्जा से भरा हुआ है|

अश्विनी नक्षत्र में पैदा हुए लोगों को अपनी आंतरिक शक्ति व चिकित्सीय क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अश्विनी नक्षत्र दिवस पर पवित्र जड़ी-बूटियों (64 प्रकार की मूल जड़ी-बूटी) द्वारा पूजा व अभिषेक करना चाहिए| अन्य नक्षत्रों में पैदा हुए लोग भी मंगलवार, शनिवार या अश्विनी नक्षत्र दिवस पर पूजा व अभिषेक करके बीमारियों से उबरने हेतु लाभकारी चिकित्सीय उर्जा प्राप्त कर सकते हैं। ये अनुष्ठान मंदिर के आसपास के पवित्र जल को भी लाभ पहुँचाते हैं तथा मंदिर के तालाब, नदी, झील व वनस्पति क्षेत्र के आसपास औषधीय गुण उत्पन्न करते हैं। मंदिर के तालाब के पवित्र जल में स्नान करना दर्शनार्थियों के लिए लाभदायक होता है| इससे उन्हें उत्तम स्वास्थ्य हेतु आशीर्वाद प्राप्त होता है|

अश्विनी नक्षत्र में जन्में लोगों के लिए वेदों द्वारा निर्धारित धूप कुचला जड़ी-बूटी से निर्मित है|

इस धूप को जलाना उस विशिष्ट नक्षत्र हेतु एक लघु यज्ञ अनुष्ठान करने के समान है| एक विशिष्ट जन्मनक्षत्र के निमित किए गए इस लघु अनुष्ठान द्वारा आप अपने ग्रहों की आन्तरिक उर्जा से जुड़कर सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होंगे|

एक विशिष्ट नक्षत्र दिवस पर अन्य नक्षत्र धूपों को जलाने से आप उस दिन के नक्षत्र की ऊर्जा से जुड़कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करते हैं| आपको यह सलाह दी जाती है कि आप कम से कम अपने व्यक्तिगत नक्षत्र से जुड़ी धूप को प्रतिदिन जलाएं ताकि आपको उस नक्षत्र से जुड़ी सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती रहे|

वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु ग्रह है। यह अश्व के मुख की तरह दिखायी देता है। इस नक्षत्र के देवता अश्विनी कुमार और लिंग पुरुष है। यदि आप अश्विनी नक्षत्र से संबंध रखते हैं, तो उससे जुड़ी अनेक जानकारियाँ जैसे व्यक्तित्व, शिक्षा, आय तथा पारिवारिक जीवन आदि यहाँ प्राप्त कर सकते हैं।

अश्विनी नक्षत्र के जातक का व्यक्तित्व

आप बहुत ऊर्जावान व सक्रिय हैं और आपमें उत्साह भी अधिक है। छोटे-मोटे काम से आप संतुष्ट नहीं रहेंगे। बड़े और महत्वपूर्ण काम करने में ही आपको ज़्यादा आनंद आता है। हर काम को तेज़ी-से और कम-से-कम समय में करना आपकी आदत है। आपमें तेज़ी, फुर्ती और सक्रियता साफ़ दिखाई देती है। यदि आपके मन में कोई बात आती है तो आप शीघ्र ही उसे कार्यरूप में बदल डालते हैं। आप ज़िंदादिल, ख़ुशमिज़ाज व समझदार हैं और किसी भी बात को जल्दी समझकर सही निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता भी आपमें है। आपका स्वभाव रहस्मयी है इसलिए धर्म, मंत्र शास्त्र और योग में भी आपकी रुचि होगी। आप निडर और साहसी भी हैं परन्तु आपको क्रोध करने से हमेशा बचना चाहिए। अपने दुश्मनों को पराजित करना आपको अच्छी तरह आता है और आपको ताक़त या दवाब से वश में नहीं किया जा सकता है; सिर्फ़ प्यार और स्नेह से ही आपको अपना बनाया जा सकता है। सामने आप बेहद शांत और संयमी दिखाई देंगे तथा अपना निर्णय लेने में कभी भी जल्दबाज़ी नहीं करेंगे। हर पहलू पर विचार करने के बाद ही आप कोई निर्णय करते हैं और एक बार जो निर्णय कर लेते हैं फिर उससे पीछे नहीं हटते। अपने फ़ैसलों में किसी की बातों से प्रभावित होकर परिवर्तन करना आपकी फ़ितरत नहीं है। अपने हर काम को बख़ूबी अंजाम देना भी आप जानते हैं। आप यारों के यार यानी श्रेष्ठ मित्र साबित हो सकते हैं और जिन्हें चाहते हैं उनके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए भी तैयार रहते हैं। अगर आपको कोई पीड़ित दिखाई देता है तो उससे हमदर्दी जताने में भी आप पीछे नहीं रहते। घोर-से-घोर संकट में भी आप अपार धैर्य रखेंगे और ईश्वर पर भी आपका पूर्ण विश्वास है। परंपराप्रिय होते हुए भी आधुनिकता से आपका कोई बैर नहीं रहता है। साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना और अपने आसपास की हर वस्तु को तरीक़े से रखना आपको पसंद है।

शिक्षा और आय

आपको हरफ़नमौला कहा जा सकता है, यानी सभी बातों में आपकी कुछ-न-कुछ पैठ ज़रुर होगी। शिक्षा के क्षेत्र में आपको पर्याप्त सफलता मिल सकती है और चिकित्सा, सुरक्षा विभाग, पुलिस विभाग, सेना, गुप्तचर विभाग, इंजीनियरिंग, अध्यापन, प्रशिक्षण आदि क्षेत्रों में भी आप हाथ आज़मा सकते है। साहित्य और संगीत के प्रति भी आपका ख़ासा लगाव होगा और आपकी आय के साधन भी एक से अधिक हो सकते हैं। तीस वर्ष की आयु तक आपको काफ़ी उतार-चढ़ाव देखने पड़ सकते हैं।

पारिवारिक जीवन

अपने परिवार से आप बेहद प्यार करते हैं लेकिन हो सकता है कि पिता की तरफ़ से आपका मन-मुटाव रहे, परन्तु मातृपक्ष के लोग आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहेंगे और परिवार से बाहर के लोगों से भी आपको काफ़ी मदद मिलेगी। आपका वैवाहिक जीवन सुखी दिखता है। पुत्रियों की अपेक्षा पुत्रों की संख्या अधिक हो सकती है

अश्वनी नक्षत्र  के जातकों का  गुण एवं स्वभाव 

अश्वनी नक्षत्र में जन्मे जातक सामान्यतः सुन्दर ,चतुर, सौभाग्यशाली एवं स्वतंत्र विचारों वाले होते हैं. वह पारंपरिक रूढ़ीवादी विचारधारा से विपरीत अपनी आधुनिक सोच के लिए मित्रों में प्रिसिद्ध होते हैं. आप सभी से बहुत प्रेम करने वाले होते हैं परन्तु आप अपने ऊपर किसी का भी दबाव नहीं सहते हैं. आपको स्वतंत्र कार्य करने एवं निर्णय लेने की आदत होती है इसलिए किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप आपको पसंद नहीं होता है. आपकी उन्नति भी स्वतंत्र कार्य करने और स्वतंत्र निर्णय लेने के कारण ही होती है .

आप स्वभाव से गुणी, धैर्यवान एवं प्रखर बुद्धि के स्वामी होते हैं. धन ऐश्वर्य युक्त जीवन में आपको किसी भी प्रकार का अभाव नहीं झेलना पड़ता है. अपने कार्य के प्रति रुझान और लगन के कारण आप कम उम्र में ही सफलता प्राप्त करते हैं एवं आपका यश और कीर्ति समाज में चारों और फैलता है. आप अन्तेर्मुखी एवं धैर्यवान होते हैं और जल्द ही किसी की बातों का विश्वास नहीं करते. आपको अपने मनोभाव पर नियंत्रण रखने में कभी-कभी कठिनाई महसूस होती है परन्तु यह आवश्यक भी है. क्रोध आने पर आप किसी की भी नहीं सुनते. आप आत्म नियंत्रण खो बैठते हैं और क्रोध में कई बार अपनी हानि करा बैठते हैं. आपको क्रोध जितनी शीघ्रता से आता है उतनी ही तीव्रता से उतर भी जाता है.

अश्वनी नक्षत्र में जन्मे जातक अक्सर सेक्स के मामलों में उतावले होते हैं. किसी भी स्त्री से मिलने के बाद आप उसके प्रति विशेष रुझान एवं लगाव महसूस करते हैं यही आपकी सबसे बड़ी कमजोरी है. आप अपने कार्य सज्जनता की उपेक्षा लड़ाई झगड़े से करवाने में सदा सक्षम रहते हैं.

अश्वनी नक्षत्र के जातक साज सज्जा में अधिक विश्वास रखते हैं इसलिए सदा ही आकर्षक , महंगी और आरामदायक वस्तुओं में  रूचि रखते है. अपने जीवन के 30 वर्ष तक आप कई प्रकार के उतार चढ़ाव झेलते हैं. उसके उपरान्त ही आपका आगे बढ़ने का रास्ता साफ़ और सुगम होता है.

आप अपने परिवार से बहुत जुड़े हुए रहते हैं परन्तु कुछ परिजन आपके जिद्दीपन के कारण आपको पसंद नहीं करते . पिता की उपेक्षा आपको माता से अधिक सहयोग और प्रेम प्राप्त होता है . 26 से 30 वर्ष की आयु में विवाह संभव है. संतान में पुत्र संतति की संभावना अधिक होगी.

इस नक्षत्र में जन्मी स्त्रियाँ सुन्दर, धन-धान्य युक्ता, श्रृंगार में रूचि रखने वाली होती हैं. अश्वनी नक्षत्र में जन्मी महिलाएं मीठा बोलती हैं और बहुत अधिक सहनशील भी होती है. माता पिता की लाडली एवं आज्ञाकारी पुत्री होने के साथ-साथ ईश्वर में भी पूरी आस्था रखती हैं. सदा बड़ों का आदर एवं  गुरु का सम्मान करने वाली अश्वनी नक्षत्र  में जन्मी स्त्रियाँ मनोहर छवि एवं बुद्धिशाली होती है.

स्वभाव संकेत : समाज और मित्रों में लोकप्रिय

संभावित रोग: दिमाग से सम्बंधित रोग, मलेरिया एवं चेचक

विशेषताएं 

प्रथम चरण : इस चरण का स्वामी मंगल हैं. इस चरण में जन्मे जातकों को दूसरों की वस्तुएं उठाने की आदत होती है. जन्म नक्षत्र स्वामी केतु लग्नेश मंगल का मित्र होने के कारण जातक की मंगल एवं केतु की दशा शुभ फल देंगी.मंगल गृह भी शुभ फल देगा.

द्वितीय चरण : इस चरण का स्वामी शुक्र हैं. अश्वनी के द्वितीय चरण में जन्म होने के कारण जातक कड़ी मेहनत से कतरायेगा और छोटे छोटे अल्प अवधी वाले कार्य करने में रूचि रखेगा.  जन्म नक्षत्र स्वामी केतु लग्नेश मंगल का मित्र है और नक्षत्र चरण स्वामी शुक्र भी केतु से मित्रतापूर्वक व्यवहार रखता है इसलिए जातक की मंगल, शुक्र  एवं केतु की दशा शुभ फल देंगी.

तृतीय चरण : इस चरण का स्वामी बुध  हैं. शास्त्रों के अनुसार अश्वनी नक्षत्र  के तीसरे चरण में जन्मा जातक सुन्दर , धनी एवं ऐश्वर्यशाली होते हैं.  मंगल और केतु  की दशा अति उत्तम फल देगी परन्तु नक्षत्र चरण स्वामी बुध केतु से शत्रु भाव रखता है इस कारण बुध की दशा में जातक अशांत एवं विचलित रहेगा.

चतुर्थ चरण :  इस चरण का स्वामी चन्द्रमा  हैं. शास्त्रों के अनुसार अश्वनी नक्षत्र  के चौथे  चरण में जन्मे जातक भोगी एवं दीर्घायु होते है. नक्षत्र  स्वामी केतु, लग्नेश मंगल का मित्र है. नक्षत्र चरण स्वामी चन्द्रमा , केतु से शत्रु भाव रखता है अतः जातक को मंगल एवं केतु की दशा उत्तम फल देंगी परन्तु चन्द्रमा की दशा में जातक अशांत एवं उद्विग्न रहेगा.

 

अश्विनी नक्षत्र में जो जन्म लेते है वो रहस्यमयी होते हैं। – Ashvini Nakshatra

Ashvini Nakshatra – ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कहा गया है कि नक्षत्रों की टोटल संख्या 27 है विशेष परिस्थिति में अभिजीत को लेकर नक्षत्रों की संख्या 28 हो जाती है। गोचरवश नक्षत्र दिवस बदलता रहता है। ज्योतिष मत के अनुसार हर नक्षत्र का अपना प्रभाव होता है। जिस नक्षत्र में व्यक्ति का जन्म होता है उसके अनुरूप उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और आचरण होता है। नक्षत्रों में सबसे पहले अश्विनी नक्षत्र होता है। अश्विनी नक्षत्र में जिनका जन्म होता है वो कैसे होते हैं आइये इसे जानते है :

अश्विनी नक्षत्र कब आता है

ऋग्वेद के अनुसार 01.50.2 तथा 6.67.6 में जिस लोक का कभी क्षय नहीं होता उसे नक्षत्र कहा गया है, यजुर्वेद में नक्षत्रों को चन्द्रमा की अप्सरा कहा गया है। निरयन सूर्य 13-14 अप्रैल को अश्विनी नक्षत्र मनें प्रवेश करता है, सम्पूर्ण अश्विनी नक्षत्र के चरण मेष राशि में होते हैं। अश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र में रहता है।

अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु

अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु होता है। इस नक्षत्र में चन्द्रमा के होने से जातक को आभूषण से प्रेम रहता है। जातक सुन्दर तथा सौभाग्यशाली होता है।

विभूषणेत्सुर्मतिमान् शशांके। दक्षस्सरूप सुभगोश्विनीषु।।

ज्योतिष शास्त्र में अश्विनी नक्षत्र को गण्डमूल नक्षत्रों के मंडल में रखा गया है इस नक्षत्र का स्वामी केतु होता है। इस नक्षत्र में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति बहुत ही उर्जावान होते हैं। ये हमेशा एक्टिव रहना पसंद करते हैं इनको खाली बैठना अच्छा नहीं लगता, ये हमेशा कुछ न कुछ करते रहना पसंद करते हैं। अश्विनी नक्षत्र के जातक उच्च महत्वाकांक्षा से भरे होते हैं, छोटे-मोटे काम से इन्हे संतुष्टि नहीं मिलती , इनको लोगो को बड़े और महत्वपूर्ण काम करने में मज़ा आता है।

अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति

अश्विनी नक्षत्र में जो जन्म लेते है वो रहस्यमयी होते हैं। इनको समझ पाना आम आदमी के बस की बात नहीं होती है। या यु कहे की काफी मुश्किल होता है। ये कब क्या करेंगे इसका अनुमान लगाना भी कठिन होता है। ये जो भी हासिल करने की सोचते हैं उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने से नहीं डरते। ये इस प्रकार के कार्य कर जाते हैं जिसके बारे में कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा पाता।

इनके स्वभाव और व्यक्तित्व की एक बड़ी कमी है कि इन लोगो में उतावलापन बहुत होता है। ये किसी भी बात पर बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते हैं। इनके व्यक्तित्व की एक बड़ी कमी यह भी है कि ये काम को करने से पहले उसके बारे में नहीं सोचते बल्कि बाद में उस पर विचार करते हैं। जो भी इनसे शत्रुता व दुश्मनी करता है उनसे बदला लेने में ये पीछे नहीं हटते, अपने दुश्मनों को पराजित करना इन्हें अच्छी तरह आता है।

अश्विनी नक्षत्र के जातक को दबाव या ताकत से वश में नहीं किया जा सकता। ये प्रेम एवं अपनत्व से ही वश में आते हैं। अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति उत्तम एवं आदर्श मित्र होते हैं। ये छल कपट से दूर रहते हैं तथा सच्ची मित्रता निभाने वाले होते हैं, ये अपने मित्र के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। ये यूं तो बाहर से सख्त दिखते हैं परंतु भीतर से कोमल हृदय के होते हैं। इन व्यक्तियों का बचपन संघर्ष में गुजरता है। ये अपनी धुन के पक्के होते हैं, जो भी तय कर लेते हैं उसे पूरा करके दम लेते हैं।

 

अश्विनी नक्षत्र संपूर्ण फलादेश राशि चक्र मे 00 अंश 13 अंश 20 कला के विस्तार वाला क्षेत्र अश्विनी नक्षत्र कहलाता है। अश्विनी नाम दो अश्विन से बना है। ग्रीक मे इसको कस्टर और पोलुक्स, अरब मंजिल मे अल शरतेैन, चीन के सियु मे ल्यु कहते है। ” “चकलय” और खंडकातक के अनुसार अश्विनी समूह दो अश्वनियो का प्रतीक दो तारो का समूह है। कालब्रुक और बाद की धरणाओ के अनुसार अश्विनी नक्षत्र दो अश्व मुख के प्रतीक तीन तारो का समूह है। देवता-अश्विनी कुमार स्वामी-केतु राशि-मेष 00 अंश से 13 अंश 20 कला भारतीय खगोल मे अश्विनी प्रथम नक्षत्र है। इसके तीन तारे है। इसी से मेष राशि और वसंत विषुव का प्रारम्भ होता है। अश्विनी से लगभग 400 वर्ष पूर्व से गणना की जाने लगी है। मुहूर्त ज्योतिष मे इसे लघु क्षिप्र नक्षत्र कहते है। यह निश्चित, यथार्थ, कोमल, नाजुक कार्यो मे लाभ दायक है। यह शुभ, सात्विक पुरुष नक्षत्र है। इसकी जाति वैश्य, योनि अश्व, योनि वैर महिष गण देव, नाडी आदि है। यह दक्षिण दिशा का स्वामी है। अश्विनीकुमार प्रतीकवाद : अश्विनी कुमार इसके देवता माने जाते है। पौराणिकता अनुसार एक जुड़वा अश्व सिर वाले देवता है, जो आकाश और पृथ्वी पर पहले चिकित्सक है। अश्विनी का अर्थ घोड़ी या घोडी रूप स्त्री और कुमार का अर्थ हमेशा सनातन या युवा होता है। कथानक है कि सूर्य की पत्नी संजना (छाया) छलावे से घोड़ी बनकर विचरण कर रही थी, उसके छल को देखकर सूर्य भी घोडा बन गए और साथ मे विचरण करने लगे। दोनो के सहवास से दो घोडा सर और धड़ मनुष्य रूप मे अश्विनी कुमार का जन्म हुआ। अश्विनी कुमार ज्ञान और गति के देवता माने जाते है। विशेषताऐ : यह जीवन के उत्तरार्ध मे लक्षण परिवर्तन का कारक है। जातक जीवन मे शीध्र उन्नति करता है। जातक सुंदर, उज्ज्वल, बुद्धिमान, होशियार होता है। अश्विनी कुमार को चिकित्सा शिक्षा सूर्य से लेने मे इन्द्र ने अड़चन डाली लेकिन उन्होंने भक्ति और समर्पण से शिक्षा प्राप्त करली। इस कारण से जातक को चिकित्सा शिक्षा मे बाधा आती है, परन्तु जातक की लगन से पूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि अश्विनी जातक का ज्येष्ठा नक्षत्र (देवता-इन्द्र) के जातक से विरोध रहता है। अश्विनी विभूतिया : भारत रत्न रविन्द्रनाथ टैगोर का सायन चन्द्र अश्विनी के चतुर्थ चरण मे था । डा, मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिकन गाँधी) का निरयण लग्न अश्वनी चतुर्थ चरण मे था। एडमंड हिलेरी (एवरेस्ट पर्वतारोही) का निरयण चंद्र अश्विनी द्वितीय चरण मे था। अश्विनी फलादेश : अश्वनी नक्षत्र से लगभग 400 ई.पू. गणना की जाने लगी और यह पहला नक्षत्र माना गया। यह परिवहन का नक्षत्र भी है। जातक सुन्दर, भाग्यवान, कार्यकुशल, स्थूल देह, धनवान, लोकप्रिय होता है। चन्द्रमा के दिन उत्पन्न जातक सैनिक कमाण्डर, चिकित्सक, घोड़ो या पशुओ का स्वामी या व्यापारी होगा। अश्विनी स्वच्छ का प्रतीक है। अतएव स्फूर्ति, शुरुआत का का कारक है। इसकी शुरुआत भीन्न प्रकार की है। जातक चंचल, नायक, खर्चीला, हमेशा युवा दिखने वाला, भ्रष्ट, पथ प्रदर्शक, अदम्य साहसी होता है। पुरुष जातक* सुन्दर मुखाकृति, आंखे बड़ी, चमकीली उन्नत ललाट लम्बी नाक होती है। जातक हठी, शांत, निश्चल, कार्य को अगोचर रूप से करनेवाला होता है। ये लक्षण 14 से 20 अप्रेल अश्विनी मे उच्च का सूर्य और 14 से 28 अक्टूम्बर स्वाति मे नीच का सूर्य मे विशेष परिलक्षित होते है। ये गुणधर्म अन्य माहो मे जन्मे जातक मे कम होते है। जातक विश्वनीय, सच्चामित्र, सलाह मानने वाला, निंदा से डरपोक, समय पर कार्य करनेवाला, अन्धविश्वास रहित, आधुनिक परम्परावादी होता है। 30 वर्ष की उम्र तक अड़चन संघर्ष, 30 से 55 के मध्य जीवन स्थिर होकर उन्नति होती है। सामान्यतया विवाह 26 से 30 वर्ष मे होता है। स्त्री जातक मे गुणदोष पुरुष जातक के समान होते है अंतर इस प्रकार है। स्त्री जातक की आँखे मछली के समान चमकीली होती है। वक्तित्व मे आकर्षण होता है। पवित्र ह्रदय वाली, आधुनिक होते हुए भी परम्परानुसार वरिष्ठो का सम्मान करनेवाली होती है। यह यौन क्रियाओ मे अत्यधिक लिप्त रहती है। यदि नौकरी करती है तो प्रशानिक सेवाओ मे रहती है और 50 की उम्र मे सेवा निवृत्ति लेलेती है। विवाह 23 से 26 के मध्य होता है, यदि विवाह जल्दी हो जाता है, तो तलाक, दीर्घ अवधि का वियोग या वैधव्य होता है। (जातक* वह प्राणी जिसके जन्मांग का विचार किया जा रहा हो उसे जातक कहते है।) आचार्यो अनुसारअश्विनी फलादेश : अश्विनी नक्षत्रोपन्न जातक सुरूप, सुन्दर, सुभग, सब कार्यो मे दक्ष, सुन-समझकर स्वमति से अमल करनेवाला, वस्त्राभूषण युक्त, स्त्रियो का आकर्षण केंद्र, सत्यवादी, तथ्यान्वेषक होता है। – ऋषि नारद जातक राजकीय नौकरी मे हो, तो सरकार इससे विशेष खुश रहती है। रोजगार मे हो, तो उच्च लोगो से संपर्क बनाना इसका शौक होता है। यह नफासत पसंद, मान-सम्मान का विशेष ख्याल रखनेवाला, शूर, निडर, जड़ी-बूटी तथा पारम्परिक चिकित्सा मे रुचिवान होता है। -ऋषि पराशर चन्द्र – यदि चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक विनम्र, आभूषणो का शौकीन, संगीत-कला-परिवार प्रेमी, ईश्वर भक्त, लोकप्रिय, बुद्धिमान होता है। वराहमिहिर अनुसार अश्विनी मे चन्द्र प्रभाव सुखद आभाष, शिष्टाचार और ज्ञान, उत्कृष्टता का कारक है। सूर्य – यदि सूर्य अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक वैभव युक्त, धमंडी, आक्रामक, आतंकवादी, जिद्दी, व्यापारी, नेता, शक्ति और प्रसिद्धि का इच्छुक होता है। लग्न – यदि लग्न अश्विनी नक्षत्र मे हो तो जातक साहसी, महान विचार वाला, यात्रा प्रेमी, चुंबकीय आकर्षण वाला शील युक्त, दक्ष, निडर होता है। यह अत्यधिक भोजन करने वाला, दवाओ का नशेड़ी होता है। (नोबल पुरष्कार विजेता मार्टिन लूथर किंग का जन्म लग्न (निरयण) अश्विनी नक्षत्र था।) चरण फल : प्रत्येक नक्षत्र मे चार चरण होते है और एक चरण 3 अंश 20 कला का होता है। यह नवमांश जैसा ही है यानि इससे राशि के नौ वे भाग का फलित मिलता है। प्रत्येक चरण मे तीन ग्रह का प्रभाव होता है 1- राशि स्वामी, 2- नक्षत्र स्वामी, 3- चरण स्वामी। प्रथम चरण : इसमे मंगल, केतु और मंगल ♂ ☋ ♂ का प्रभाव है। मेष 00 अंश से 03 अंश 20 कला। इसका स्वामी मंगल है। यह शारारिक क्रिया, साहस, प्रेरणा, प्रारम्भ का द्योतक है। जातक मध्यम कद, बकरे जैसा मुंह, छोटी नाक और भुजा, कर्कश आवाज, संकुचित नेत्र, कृश, धायल अथवा नष्ट अंग वाला होता है। इसके गुणदोष – शारारिक सक्रियता, साहस, प्रोत्साहन, आवेगी बली. भावनावश परिणाम की बिना चिंता कार्य है। जातक नृप सामान, निर्भीक, साहसी, अफवाहो के प्रति आकर्षित, मितव्ययी, वासनायुक्त, भावुक होता है। द्वितीय चरण : इसमे मंगल, केतु और शुक्र ♂ ☋ ♀ का प्रभाव है। मेष 03 अंश 20 कला से 06 अंश 40 कला। इसका स्वामी शुक्र है। यह अवबोध, अविष्कार, साकार कल्पना का द्योतक है। जातक श्याम वर्णी, चौड़े कन्धे, लम्बी नाक, लम्बी भुजा, छोटा ललाट, खिले नेत्र, मधुर वाणी, कमजोर जोड़ वाला होता है। इसके गुणदोष – अवबोध, आविष्कारी, अश्विनीकुमार जैसी सदभावना, कल्पनाओ (भौतिक) को साकार करना है। जातक धार्मीक, हंसमुख, धनवान होता है। तृतीय चरण : इसमे मंगल, केतु और बुध ♂ ☋ ☿ का प्रभाव है। मेष 06|40 से 10|00 अंश। इसका स्वामी बुध है। यह विनोद, संचार, फुर्ती, व्यापकता का द्योतक है। जातक काले बिखरे बाल, सुन्दर नेत्र व नाक, गौर वर्ण, वाकपटु, पतले जांध व नितम्ब वाला होता है। इसके गुणदोष – विनोद, आदान-प्रदान, विस्तीर्ण योग्यता, दिमागी फुर्ती है। जातक विद्वान, ज्ञानवान, भोजन प्रेमी, भौतिकवादी, अशांत, तर्क आधारी, साहसिक होता है। चतुर्थ चरण : इसमे मंगल, केतु और चन्द्र ♂ ☋ ☾ का प्रभाव है। मेष 10|00 से 13|20 अंश , इसका स्वामी चन्द्र है। यह चेतना, भावुकता, सहानुभूति का द्योतक है। जातक व्याकुल नेत्र, साहसी, ठिगना, नट अथवा नृत्यक, भ्रमणशील; खुरदरे नख, विरल कड़े रोम, कृश, भाई हीन होता है। इसके गुणदोष – सामूहिक चेतना, महत्व, जानकारी, भावुकता है। जातक ईश्वर से डरने वाला, धार्मिक, पौरुषयुक्त, स्त्री संग प्रेमी, चरित्रवान, गुरुभक्त होता है। नक्षत्र के चरण फल को आचार्यो ने सूत्र रूप मे कहा है परन्तु फलित मे बहुत अंतर है। ☀ यवनाचार्य मतेन – अश्विनी के प्रथम चरण मे तस्कर, द्वितीय मे कामचोर, तृतीय मे सुभग, सुन्दर, चतुर्थ मे सुखी और दीर्धायु होता है। ☀ मानसागराचार्य मतेन – अश्विनी के प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय मे धनवान, तृतीय मे विद्वान, चतुर्थ मे गुरुभक्त होता है। नक्षत्र चरण मे ग्रह फल भातीय मत से सूर्य, बुध, शुक्र की एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि या पाद दृष्टि नही होती क्योकि सूर्य से बुध 28 अंश और शुक्र 48 अंश से अधिक दूर नही हो सकते है। सूर्य : ❉ सूर्य पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक दयालु, कृपालु, मददगार होता है। ❉ सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक क्रूर, रक्तिम नेत्रो वाला, क्रोधी होता है। ❉ सूर्य पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक सह्रदय, राजकीय शक्तियो का उपयोगी होता है। ❉ सूर्य पर शनि की दृष्टि हो, तो जातक निर्धन और कार्य मे उसका मन नही होता है। अश्विनी सूर्य चरण फल प्रथम चरण – जातक वाकपटु, आत्मविश्वासी, उत्साही, शासकीय संस्था मे उच्च पदासीन, समाज मे शक्तिशाली, प्रसिद्ध मंदिरो (विशेषकर पहाड़ स्थित) का तीर्थयात्री, स्पष्टवादी होता है। इसके पत्नी से मधुर सम्बन्ध होते है लेकिन अहंकारवश कुछ समस्याये होती है, पहले पुत्र के जीवन मे बाधाऐ होती है। जातक ह्रष्ट, पुष्ट और स्वस्थ रहता है। द्वितीय चरण – जातक छोटी उम्र मे धनवान हो जाता है किन्तु क़ानूनी उलझन मे धन खोना पड़ता है। विदेश मे रहने पर निर्धन और अस्वस्थ, शासकीय सहायता प्राप्त होता है। परिवार मे विरोधाभास होता है। संधर्ष कर खोया धन प्राप्त करनेवाला, नैत्र रोगी होता है। ❉ मतान्तर – इस चरण मे सूर्य राशि चक्र की परिक्रमा पूर्ण कर विश्राम की अवस्था मे होने के कारण अशुभ परिणाम देता है। सूर्य की सुप्तावस्था मे दुष्ट शक्तिया प्रभावी होने के कारण जातक निर्धन या भिखारी हो जाता है। ❉ इस चरण मे सूर्य से चन्द्रमा युक्त हो, तो दुष्परिणाम गहन होते है। प्रायः 8 वर्ष से पहले बालारिष्ट हो सकता है तथा आयु की दीर्घता भी संदिग्ध होती है। इसके अपवाद के रूप मे यदि मंगल का प्रभाव या दृष्टि हो तो परिणाम अच्छे होते है। तृतीय चरण – जातक धनवान किन्तु समाज मे प्रतिष्ठाहीन, कृषि से सम्पत्तिवान, सम्पदा-जमीन-जायदाद का दलाल, कर्मठ, स्व परिश्रम से व्यवसाय मे उन्नत, साधारण स्वस्थ होता है। इसका पिता क़ानूनी मामले मे धन खोने वाला होता है। चतुर्थ चरण – जातक आध्यात्मिक और दैविक ज्ञानी, कृषि से सम्पत्तिवान, परिवार प्रिय, सेनाध्यक्ष या नेता अत्यधिक धनी नही पर समाज मे प्रतिष्ठित, यात्राप्रेमी, दानी, भूखो को निशुल्क आहार कराने वाला होता है। यदि सूर्य 8-10 अंश का हो, तो अधिक सुखद परिणाम होते है। चन्द्र : ❉ यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक उन लोगो पर कृपालु होता है जो उससे सहायता की अपेक्षा रखते हो। लेकिन उसकी मानसिकता क्रूर होगी। वह सरकारी शक्तियो का उपयोग करेगा। ❉ यदि मंगल से दृष्ट हो, तो कान व दांत की पीड़ा रहेगी तथा समाज के कुछ वर्गों पर निर्भर रहेगा। ❉ यदि बुध से दृष्ट हो, तो प्रसिद्धि प्राप्त करेगा और जीवन के सभी सुख भोगेगा। ❉ यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक बहुत ही विद्वान् और दुसरो को ज्ञान प्रदान करेगा। ❉ यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक स्त्रियो की संगत मे रहेगा और धनवान होगा। ❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो स्वास्थ्य खराब रहेगा, दूसरो के प्रति कठोर और अच्छी संतान के लिए तरसेगा। अश्विनी चन्द्र चरण फल प्रथम चरण – जातक पतला और छोटे कद वाला, सामान्य सुन्दर, मानसिक या रक्त विकार या कफ जन्य रोग से ग्रसित, दुर्बल, कामुक, असफल प्रेमी, कर्कश, अभागा, वस्त्राभूषण का शौकीन, राज्य से लाभी, सेना से सम्बंधित, भूमिलाभी, धनवान होता है। विद्वानो से विचार विमर्श करनेवाला होता है। यदि लग्न और गुरु इस चरण मे हो, तो दीर्धायु होता है। द्वितीय चरण – जातक मोहक, रूपवान, मजबूत हड्डीवाला, मधुर वाणी वाला, धन-वैभव युक्त, संततिवान, ईश्वरभक्त, संगीत और कला प्रेमी, रूपाजीवी, डाक्टर या वैद्य, आथित्य प्रेमी, स्त्रियो का आकर्षण केंद्र होता है। ❉ मतान्तर – जातक लम्बे कद वाला, चतुर, मदिरा आदि का शौकीन, स्त्रियो से परेशान, महत्वाकांक्षी स्वार्थी होता है। चन्द्रमा पर शुक्र की दृष्टि हो, तो जातक भाग्यशाली होगा और पुत्रो के साथ सुखी जीवन व्यतीत करेगा। शनि की दृष्टि होगी तो जातक ईर्ष्यालु, दयनीय, अप्रसन्न होता है और कुअवसरो का सामना करता है। स्त्री जातक मे चन्द्रमा की प्रतियुति मंगल व राहु से हो, तो 30 वर्ष की उम्र मे वैधव्य होगा। तृतीय चरण – जातक गौरवर्णी, सुन्दर, सुदृढ़ अंग-प्रत्यंग, वार्ता कुशल, प्रभावी वक्ता, प्रसन्नचित्त, वणिक, धनवान, विद्वान्, बुद्धिमान, कार्य को कुशलता से निपटाने वाला सत्यवादी होता है। कोई-कोई जातक त्वचा रोगी या त्वचा रोग विशेषज्ञ होता है। चतुर्थ चरण – इस चरण मे सूर्य चन्द्र की युति न हो, तो यह स्थिति बहुत अच्छी है। जातक शुष्क त्वचा, क्रश, सौम्य, विनम्र, स्त्रियो का प्रिय, यशश्वी, राज्य सम्मानी, कन्या संतति वाला, विश्व्वनीय होता है। यदि चन्द्र 12-13 अंश का हो, तो जातक प्रशासनिक सेवा मे अधिकारी या शासन मे उच्च पद पर या डाक्टर होता है। ✷ प्राचीन धरणाओ अनुसार अश्विनी नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अश्विन का प्रमुख कार्य चिकित्सा है। अतः इस चरण मे उत्पन्न डाक्टर चिकित्सा के क्षेत्र मे सफल होते है। यदि लग्न इस चरण मे हो और चन्द्रमा अन्यत्र हो, तो भी वही परिणाम होता है। मंगल ❉ यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो जातक श्रेष्ठ विद्वान तथा माता-पिता का आज्ञाकारी होता है। ❉ यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक दूसरो की स्त्रियो मे रूचि लेने वाला, क्रूर होता है। ❉ यदि बुध से दृष्ट हो, तो जातक वेश्यागामी और व्यर्थ की धूमधाम तथा दिखावा करने वाला होता है। ❉ यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक धन, शक्ति और अधिकार से पूर्ण, गृह स्वामी होता है। ❉ यदि शुक्र से दृष्ट हो, तो जातक को अच्छा भोजन नसीब नही होता है। वह दूसरो की स्त्रियो के पीछे भागेगा और मुसीबत मे पड़ेगा। फिर भी समाज के लिए अच्छे कार्य करेगा। ❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो जातक माता की देखभाल और प्यार से वंचित और धर से निष्काषित होता है। अश्विनी मंगल चरण फल प्रथम चरण – जातक हृष्ट-पुष्ट, कर्मठ, साहसी, निडर, उत्पीड़क, शस्त्र संचालन मे निपुण, उद्विग्न, व्याकुल, युद्धप्रेमी, दुराचारी, साधु का वैरी, सेना या रक्षा अधिकारी, शल्य चिकित्सक होता है। यदि मंगल पाप दृष्ट हो, तो हिंसक, तानाशाह होता है। यदि शासकीय नौकरी मे हो, तो सरकार विशेष प्रसन्न रहती है। द्वितीय चरण – जातक सुदृढ़, सुन्दर, परिवार व गुरुओ का स्नेह भाजन, रतिःक्रीडाप्रेमी, मधुर भाषी, नौकरो से युक्त, धार्मिक, मैत्री पूर्ण व्यवहारी, धनवान होता है। यदि मंगल शुक्र की युति हो, तो लैंगिक सुख या स्त्री प्रसंग मे बाधा या योगाभ्यासी होता है। ❉ मतान्तर प्रायः निर्धन, निसंतान, प्रतिशोधी होगा। आग, दुर्धटना व रोग का भय होगा। किसी-किसी मामले मे कन्या संतति होगी। तृतीय चरण – जातक गोरा, वार्ताकुशल, विद्वानो का आदर सत्कारी, साधु स्वभाव वाला, धैर्यवान, प्रापर्टीब्रोकर, घोड़े आदि पशुओ का व्यवसायी या चिकित्सक या वैद्य, शिल्पज्ञ या शास्त्रज्ञ होता है। ❉ सूर्य की दृष्टि स्वास्थ्य, धन, व सुखी जीवन दायक है। (अनिष्टकारी मंगल पर अनिष्टकारी सूर्य की दृष्टि हो, तो मंगल ज्यादा शक्तिवान हो जाता है। जिस प्रकार उष्ण ही उष्ण को नष्ट करता है) यदि सूर्य या गुरु की दृष्टि नही हो, तो माता का बाल्यकाल मे निधन होता है। वह अति यौन सुख भोगेगा। चतुर्थ चरण – जातक सुन्दर, शांत, सुखी, सम्मानित, स्वाभिमानी, मित्रवत, संतोषी, धन संग्रह, कार्यकुशल, शूरवीर, संतानयुक्त, पालन-पोषण करने वाला होता है। यदि सूर्य, चन्द्र, मंगल की युति हो, तो सुशासक होता है।गुरु की दृष्टि हो, तो विपुल पैतृक सम्पत्ति मिलेगी। अश्विनी के 12-13 अंश के मध्य जन्मा हो, तो निपुण इन्जीनियर होता है। बुध ❉ यदि चन्द्र से दृष्ट हो, तो जातक संगीत, कला प्रेमी तथा इन्ही से आजीविका करने वाला होता है। वाहन, भवन, स्त्री आदि का सुख भोगेगा। ❉ यदि मंगल से दृष्ट हो, तो जातक शासक वर्ग की निकटता से विभिन्न सुविधा प्राप्त करेगा। ❉ यदि गुरु से दृष्ट हो, तो जातक सुपरिवार, संतान, धन से सम्पन्न होगा। ❉ यदि शनि से दृष्ट हो, तो जातक सामाजिक सुकार्यकर्ता, मजबूत कद-काठी का होगा परन्तु परिजनो से उसका निर्वाह नही होगा। अश्विनी बुध चरण फल प्रथम चरण – जातक दुबला-पतला, व्यर्थ बकभक करने वाला, ईर्ष्यालू, कुटिल, मित्रो का अहित करने वाला, विद्वेषी, दण्डित, त्वचा रोगी या रक्तविकारी, अधीनस्थ, चतुर, स्वविचार से तथ्यान्वेषक, स्वादिष्ट भोजन प्रिय, मदिरा और स्त्रियो का शौकीन होता है। द्वितीय चरण – जातक सुन्दर, सौभग्यशाली, वैभवयुक्त, उदार, मित्रो और गुरुओ का सम्मान करने वाला, निष्ठावान, प्रेमाशक्त, रतिप्रिय, साहित्यिक कार्य से लाभ प्राप्त करने वाला, मुंशी, पारम्परिक चिकित्सा प्रेमी होता है। 30 वर्ष की उम्र पश्चात सन्यासी हो सकता है। तृतीय चरण – जातक सौम्य, सुभग, चमकीली त्वचा, राजकुमार, ऐश्वर्यशाली, सभी का हितेषी, सफल चिकित्सक, जड़ी-बूटी का ज्ञाता, चिकित्सा क्षेत्र मे अविष्कारक, दयालु, सुखी होता है। यदि बुध नीच या उग्र ग्रहो से युत हो, तो ऐश्वर्यहीन, तामसी, बकवादी, रोगी होता है। चतुर्थ चरण – जातक निर्धन, दुश्चरित्र, व्यापार मे असफल, प्रेम प्रसंग में बाधा या अवैध संतानी, पापी, धूर्त, कठोर, दुष्ट स्वभावी होता है। यदि बुध शुभ धृष्ट हो, तो विवाह, धारा सभासद, लेखाकार होता है। गुरु ❉ गुरु पर सूर्य की दृष्टि हो, तो धार्मिक, अनैतिक कार्यो से परे, जनता की भलाई करने वाला होता है। ❉ गुरु पर चन्द्र की दृष्टि हो, तो जातक धन, यश प्राप्त करने वाला होता है। ❉ गुरु पर मंगल की दृष्टि हो, तो क्रूर, दूसरो का गर्व चकनाचूर करने वाला, शासक वर्ग से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। ❉ गुरु पर बुध की दृष्टि हो, तो दुर्व्यवहारी, अनावश्यक विवाद पैदा करने वाला होता है। ❉ गुरु पर शुक्र की दृष्टि हो, तो सौन्दर्य प्रसाधन व्यवसायी, स्र्त्री संग रसिक होता है। ❉ गुरु पर शनि की दृष्टि हो, तो परिवार का सुख-चेन लूटने वाला, क्रूर पृवत्ति वाला होता है। अश्विनी गुरु चरण फल प्रथम चरण – जातक मुख रोगी, पापी, व्यसनप्रिय, अज्ञात भय से पीड़ित, धन-धान्य से युक्त, देश मे मान्य, शासन मे अधिकार वाला, विद्वान होता है। इन्हे मान- सम्मान का विशेष ख्याल रहता है। ❉ मतान्तर जातक धर्म-आध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र मे विद्वान, मधुर वाणी से मन जीतने वाला, 36 वर्ष की आयु मे प्रसिद्ध होगा। मित्रो व अन्य की सहायता से उन्नति करेगा। द्वितीय चरण – जातक सुगठित शरीर वाला, मनोहर, तेजस्वी, प्रतिष्ठित, पुण्यात्मा, धार्मिक आस्था युक्त, गुणी, सुखी परिवार वाला, कृषि से धनलाभी, राजमित्र, विलासी, संततिवान, सुनना और सुनकर समझना तथा उसपर अमल करने वाला होता है। कोई-कोई जातक पर स्त्री रत, वेश्यागामी, कर्जदार होता है। तृतीय चरण – जातक सुन्दर, नाजुक, सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने वाला, शास्त्रार्थ मे निपुण, वृद्धजनो का आदर-सत्कार करने वाला, नफासत पसंद, विशेष चाल वाला होता है। यदि शनि, मंगल से युत या दृष्ट हो, तो क्लेश, रोग, शोक, त्रिदोष, हानि होती है। ❉ इस चरण मे कुछ आधारो पर जीवन काल केवल 16 वर्ष होने से “राजाधिराज” योग असम्भव प्रतीत होता है। चतुर्थ चरण – जातक सुन्दर, आथित्यप्रेमी, प्रसन्नचित्त, स्त्रियो का अभीष्ट करने वाला, सौभाग्यशाली, अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलंद करने वाला, शासन से सम्मानी, संतान कर्तव्यपरायण व सट्टे से मुनाफा होता है। शुक्र ❉ शुक्र पर चंद्र की दृष्टि हो, तो उच्च स्थान प्राप्त करने वाला, स्त्रियो के कारण बदनाम होता है। ❉ शुक्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो निर्धन, पारिवारिक सहायता से वंचित, वैवाहिक जीवन क्लेशमय होता है। ❉ शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो, तो ऐश्वर्यवान, अच्छा परिवार, संतान व धन संपन्न होता है। ❉ शुक्र पर शनि की दृष्टि हो, तो धन को छुपाकर रखने वाला, तस्करी और अनैतिक रूप से धन कमाकर दान करने वाला होता है। अश्विनी शुक्र चरण फल प्रथम चरण – जातक मुस्कराता चेहरा, स्थूल शरीर, ईर्ष्या-द्वेष की प्रवृत्ति वाला, भोग-विलाषी, धातु संशोधक या विमान चालक या नाविकीय इंजिनियर, पर स्त्री रत या वैश्यागामी होता है। उसे राजा या डाकुओ (सरकार और असामाजिक तत्व) से कष्ट होता है। द्वितीय चरण – जातक सुन्दर, मनमोहक, युद्ध मे विजयी, सफल डाक्टर या वैद्य, परम्परागत चिकिसा मे पारंगत, आध्यात्मिक, पवित्र, विनम्र, व्रतादि करने वाला, अकस्मात धन प्राप्तक होता है। इसकी सौन्दर्य प्रसाधन से आजीविका होती है। तृतीय चरण – जातक निरोगी, विद्या द्वारा प्रसिद्ध, उत्कृष्ट विद्वान, तीर्थाटन प्रेमी, धार्मिक आस्थावान, धर्म स्थानाश्रयी, निपुण डॉक्टर या शिखर राजनीतिज्ञ, कमीशन एजेंट, जेवरात या फैशन की वस्तुओ का विक्रेता, विलासी होता है। यदि शुक्र कुप्रभाव मे हो, तो अंग भंग या लंगड़ा-लूला होने का खतरा होता है। चतुर्थ चरण – जातक सौन्दर्यवान, धन-वैभव युक्त, निपुण कलाकार, संगीतकार या वाद्यवादक, पत्नी सुन्दर सुशील, मनोकुल होती है। जातक शत्रुहन्ता, मित्रो से सुखी होता है। स्त्री जातक पति का निर्वाह करने वाली और चाहने वाली होती है। शनि ❉ शनि पर सूर्य की दृष्टि हो, तो जातक पशु पालक, दुग्ध पदार्थो का विक्रेता होता है। ❉ शनि पर चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक कुआचरणी, निर्धन क्रूर होता है। ❉ शनि पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातक बड़बोला, दूसरो की सहायता नही करने वाला होता है। ❉ शनि पर बुध की दृष्टि हो, तो जातक अनैतिक कार्यो से धन उपार्जित करने वाला, सुखी वैवाहिक जीवन के लिए तरसने वाला होता है। ❉ शनि पर गुरु की दृष्टि हो, तो जातक उच्च पदवान, धनवान, पत्नी व संतान से सुखी होता है। ❉ शनि पर शुक्र की दृष्टि हो, तोजातक प्रवाशी, अप्रभावि, रतिक्रिया मे रूचिवान होता है। अश्विनी शनि चरण फल प्रथम चरण – जातक क्रश, कठोर, निर्ल्लज, आचरण भ्रष्ट, मंदबुद्धि, अश्लील भाषी, भेद बताने वाला, मर्म स्थान मे रोग, त्वचा रोगी, आत्म बल हीन, बाल्यावस्था मे दुःखी बाद मे सुखी, ऐतिहासिक विषय मे रुचिवान होता है। द्वितीय चरण – जातक श्याम वर्णी, दुर्बल, संयमी, कृतज्ञ, विवेकी किन्तु बदमिजाज, मध्यमावस्था तक असामाजिक कार्यो मे सलग्न, वन पदार्थ या खनिज व्यवसायी, कार्य कुशल लेकिन समस्याओ से धिरा हुआ, वीर्य विकारी होता है। तृतीय चरण – जातक जीवन मे उन्नति करने वाला, सुख वैभव से तृप्त, सौभाग्यशाली, अनुष्ठान मे निष्ठावान, महत्वाकांक्षी मगर बदमिजाज, व्याख्याता, मातहतो से सौहार्द पूर्ण होता है। चतुर्थ चरण – जातक नेत्रो मे आकर्षण वाला, सुखी, अनुसंधानक, धार्मिक मगर जुआरी होता है। जातक का जन्म रात्रि का हो, तो बलिष्ठ होता है। इस चरण मे सूर्य की दृष्टि होने पर पुरुष जातक जमींदार या कृषक होता है। स्त्री जातक अविवाहित रहती है, और विवाह हो भी जाय तो दुर्भाग्य अथवा विपत्ति होती है। चंद्र की दृष्टि हो, तो जातक बदसूरत और दुश्चरित्र होता है। राहु प्रथम चरण – जातक मजबूत देह वाला, बुद्धिमान, पिता का भक्त होता है। राहु आक्रान्त हो, तो दुर्घटनाए होती है। द्वितीय चरण – नाना प्रकार के कष्ट, मानसिक रुग्णता, विदेश यात्रा योग, योजनाओ मे फेरबदल होता है। तृतीय चरण – जातक दीन-हीन, कार्य मे अरूचिवाला, सनकी, दार्शनिक, दाम्पत्य साथी से दुःखी होता है। चतुर्थ चरण – जातक निडर, साहसी, कर्मठ, पेट के रोगो से ग्रस्त होता है। यदि सूर्य से दृष्ट हो, तो उत्तरदायित्व निभाने योग्य होता है। विपत्ति मे कोई-कोई सहायता करता है। केतु प्रथम चरण – जातक अच्छी शिक्षा, उन्नति के लिए उद्यमशील, लोकप्रिय इंजीनियर (मेकेनिकल) होता है। द्वितीय चरण – निम्न जीवन स्तर, स्त्रियो से लगाव, अच्छे जन सम्पर्क वाला होता है। तृतीय चरण – जातक निम्न प्रवत्तियो के लोगो से मेलजोल रखेगा, विपत्ति मे सहयतादारो का प्रतिदानी होगा। चतुर्थ चरण – जातक* जन्म स्थान से दूर, अल्प पारिवारिक सुख वाला, दूसरो पर निर्भर होता है। कुछ की आयु केवल तीस वर्ष होती है। *जातक = वह प्राणी जिसका ज्योतिषीय विचार किया जा रहा हो

‘वराह संहिता’ में ग्रह पीड़ा निवारण के लिए रत्न धारण करने पर बल दिया है। दीर्घकालीन एवं असाध्य रोगों के लिए ‘रुद्रसूक्त’ का पाठ या ‘महामृत्युंजय’ का जाप कराना भी शुभ फल देने वाला होता है।
1. आचार्य वराहमिहिर के अनुसार जब सूर्य जन्म कुंडली की बुरी स्थिति में पड़ा हो और हानिकारक हो रहा हो, जैसे दिल की बीमारी, शासकीय कार्यों में परेशानी, आंखों में कष्ट हो, पेट संबंधी बीमारियां हो, हड्डियों में तकलीफ होती है, उस समय गुड़ का दान करना, गेहूं का दान, लाल रंग की वस्तुओं का दान, तांबे का दान एवं यज्ञ और हवन करना लाभप्रद, शुभ होगा। संकट कम होंगे। रात्रि के समय आग को दूध से बुझाने से अग्निरूपी सूर्य को उसके मित्र दूधरूपी चंद्रमा की सहायता प्राप्त होगी तथा अनिष्ट ग्रह की शांति में सहयोग मिलेगा।
2. यदि चंद्रमा के कारण कष्ट हो रहा है, माता बीमार है, मानसिक चिंता, मानसिक निर्बलता हो, फेफड़ों में रोग हो अथवा धन का नाश हो रहा है, तो चांदी को बहते पानी में बहा देने से चंद्र संबंधित कष्टों का निवारण करने वाला होगा।
3. रात में दूध और पानी एक ही बर्तन में रखकर सिरहाने रखकर सो जाएं एवं प्रात: पीपल के वृक्ष में डाल दें। चंद्र से संबंधित वस्तुएं जैसे पानी, दूध, चांदी अपने से पृथक करें अर्थात किसी को भी दान कर दें। शिवजी को इस ग्रह से संबंधित माना गया है। शिव मे मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है अत: भगवान शिव का दूधमिश्रित जल से पूजन करें तथा रात्रि में दूध नहीं पीएं।
4. यदि मंगल के कारण कष्ट है तो मीठी रोटी (गुड़ की) बनाकर दान करें। रेवड़ी और बताशे पानी में बहाएं तथा हनुमान ही को चोला चढ़ाएं, झंडा चढ़ाएं।
5. बुध ग्रह के कारण परेशानी हो रही है, तब कौड़ियों को जलाकर उस राख को उसी दिन नदी में बहाएं। तांबे के सिक्के में छेद करके (छिद्र) नदी में या बहते पानी में डालें। साबुत मूंग, पन्ना आदि दान करें। फिटकरी पीसकर उससे मंजन करें, ग्रह निवारण होगा।
6. जब गुरु अनिष्टकारी हो तो घर के हर सदस्य से एक-एक मुद्रा इकट्ठा कर मंदिर में गुप्त दान नियमित रूप से करें। गुड़, हल्दी, आटे में मिलाकर ब्रहस्पतिवार के दिन गाय को खिलाएं। चने की दाल, केशर, सोना आदि दान करें। लड्डूगोपाल की पूजा करें।
7.
यदि शुक्र अनिष्टकारी हो तो पशुओं को चारा खिलाएं, गौदान करें। घी, कपूर, सफेद मोती, दही का दान करें। गाय को अपने भोजन से निकालकर खाना दें, तब ही स्वयं भोजन करें।
8. शनि के अनिष्ट फल दूर करने के लिए तेल में अपनी छाया को देखकर तेल दान करें। काली उड़द, लोहा, तेल से बनी वस्तु (खाद्य पदार्थ), चमड़ा, पत्थर, शराब, स्प्रिट आदि का दान करें। कौओं को अपने खाने में से कुछ भा‍ग खिलाएं। काले कुत्ते को मीठी रोटी या गुड़ खिलाएं। चींटियों को काले तिल में गुड़ मिलाकर डालें।
9. यदि राहु के कारण अनिष्टकारी स्थिति बन रही है तो नारियल को नदी में बहाएं। मूली का दान करें। कोयला नदी में बहाएं। सफाई कर्मचारी को रुपए, कपड़े व अनाज का दान करें।
10. जन्म पत्रिका में केतु अनिष्टकारी हो तो कुत्ते को भरपेट भोजन करवाएं। केतु की दशा में पुत्र का व्यवहार बदल जाता है अत: मंदिर में अन्न, वस्त्र, कम्बल आदि का दान करें।
11. आर्थिक स्‍थिति सुदृढ़ करने के लिए, गृह क्लेश शांत करने हेतु पंढेरी (जहां पीने का पानी रखा जाता है) पर प्रतिदिन शाम को शुद्ध घी का दीपक रखकर ईश्वरीय एवं पितरों से अज्ञानतावाश हुए अपराधों के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।
प्रतिदिन गणपति को लाजा (खील) चढ़ाने से भी रोजगार में वृद्धि होती है। प्रतिदिन सूर्योदय के समय अर्घ्य देने से शीघ्र भाग्योदय होता है। प्रतिदिन गणेशजी को दूर्बा अर्पित करने से शीघ्र भाग्योदय होता है। प्रतिदिन एक माह तक सप्तधान्य का चूरा और गुड़ मिलाकर काली चींटियों को डालना क्लेश मुक्तिकारक होता है।
अश्विनी नक्षत्र :

इस नक्षत्र के देव अश्विनी कुमार और स्वामी केतु है | इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक उत्साही और उमंगवान होते हैं | सृजनात्मक कार्य करते हैं | इस राशि और इस नक्षत्र में जन्म लेने वालों का शारीरिक और मानसिक विकास अच्छा होता हैं | इस नक्षत्र का स्वामी केतु होने के कारण इनका काम अचानक बनता है या बिगड़ता है | ये क्रोध ज्यादा करते हैं | ये आर्युवेद में विश्वास करते हैं |

अश्विनी नक्षत्र आकाश मंडल में प्रथम नक्षत्र है। अश्विनी नक्षत्र 3 तारों का समूह है, जो आकाशमंडल में जनवरी के प्रारम्भ में, सूर्यास्त के बाद, सिर पर दिखाई देता है।

अर्थ – अश्व पुरुष
देव – अश्विनी हैं।

  • इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले का व्यक्ति का एक स्वतन्त्र चिन्तन होता है। जन्म लेने वाला व्यक्ति बुद्धिमान होने के साथ ही, उसे आर्थिक दृष्टि से भी जीवन में कोई विशेष चिन्ता नहीं करनी पडती।
  • अश्विनी में अश्विनी कुमारों का व्रत और पूजन किया जाता है।
  • अश्विनी नक्षत्र का देवताकेतु को माना जाता है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आंवला के पेड़ को अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है और अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति आंवला वृक्ष की पूजा करते है।
  • इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति अपने घर में आंवला का वृक्ष लगाते है।
अश्विनी नक्षत्र

भारतीय वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से अश्विनी को पहला नक्षत्र माना जाता है। घोड़े के सिर को अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिह्न माना जाता है जो इस नक्षत्र को घोड़े के बहुत से गुणों के साथ जोड़ता है। उदाहरण के लिए घोड़े को यात्रा का प्रतीक माना जाता है तथा यात्रा अपने आप में किसी प्रकार के आरंभ का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी नक्षत्र का किसी न किसी प्रकार की यात्रा तथा किसी न किसी प्रकार की घटना के आरंभ से सीधा रिश्ता है। इसी प्रकार घोड़ा अपने साहस, गति तथा शक्ति के लिए भी जाना जाता है तथा घोड़े के यह गुण भी अश्विनी नक्षत्र के जातकों में सामान्यता ही पाये जाते हैं। घोड़ा अपनी जिद तथा अड़ियल स्वभाव के लिये भी जाना जाता है तथा घोड़े का यह गुण भी अश्विनी नक्षत्र के माध्यम से व्यवहार में आता है जिसके चलते अश्विनी नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया जिद्दी अथवा अड़ियल स्वभाव के होते हैं तथा इनसे काम निकलवाना कई बार उसी प्रकार से मुश्किल हो जाता है जिस प्रकार किसी अड़ियल घोड़े को सधा कर उस पर सवारी करना। अश्विनी नक्षत्र अपने आप में एक बहुत विलक्षण नक्षत्र है तथा इसके जातक भी बहुत से विलक्षण गुणों के स्वामी होते हैं तथा कुंडली के अच्छा होने की स्थिति में ऐसे जातक अपने जीवन में बहुत से विलक्षण कार्य कर जाते हैं।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी कुमारों को अश्विनी नक्षत्र का देवता माना जाता है। अश्विनी कुमारों को सूर्य देव के पुत्र माना जाता है तथा वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार चिकित्सा शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता हैं जिसके चलते इन्होनें च्यवन ॠषि को वृद्धावस्था से मुक्त करके पुन: युवा बना दिया था। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार स्वभाव से उदार, दूसरों की सहायता को तत्पर रहने वाले तथा स्थान स्थान पर घूमते रहने वाले स्वभाव के हैं तथा अश्विनी कुमारों के चरित्र की यह विशेषताएं अश्विनी नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव मे आने वाले जातकों में भी उपर वर्णित विशेषताएं पायीं जातीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से केतु को अश्विनी नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा केतु के चरित्र की बहुत सी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं। उदाहरण के लिए केतु को किसी प्रकार के आरंभ के साथ जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा इसी प्रकार अश्विनी को भी आरंभ के साथ जुड़ा हुआ नक्षत्र माना जाता है बल्कि अश्विनी तो प्रथम नक्षत्र होने के कारण अपने आप में नक्षत्रों का ही आरंभ दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष में केतु को कई प्रकार के चिकित्सा पद्धतियों के साथ जोड़ा जाता है तथा अश्विनी का भी चिकित्सा क्षेत्र के साथ गहरा संबंध है। इस प्रकार केतु की बहुत सी विशेषताएं इस ग्रह के प्रभाव में आने के कारण अश्विनी नक्षत्र में भी देखीं जातीं हैं।

अश्विनी नक्षत्र के सभी चार चरण मेष राशि में ही स्थित होते हैं जिसके कारण मेष राशि तथा इस राशि के स्वामी मंगल का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव रहता है तथा मेष राशि एवम मंगल ग्रह की कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार होती हैं। मंगल ग्रह के प्रभाव के चलते अश्विनी नक्षत्र में साहस तथा शौर्य जैसी विशेषताएं आ जातीं हैं तथा मेष राशि का अग्नि तत्व अश्विनी को तेज गति से कार्य करने की उर्जा प्रदान करता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार की शक्तियों के प्रभाव में आने के फलस्वरूप अश्विनी इन सभी शक्तियों की विशेषताओं का मिश्रित रूप प्रदर्शित करता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में उपर बताईं गईं विशेषताओं में से बहुत सी विशेषताएं पायीं जातीं हैं। अश्विनी के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने कार्यों को शीघ्रता से आरंभ कर देने में विश्वास रखते हैं तथा इन जातकों को किसी भी प्रकार के कार्य को आरंभ करने से पूर्व प्रतीक्षा करना सामान्यतया बिल्कुल भी पसंद नहीं होता। अश्विनी के जातक समय को व्यर्थ गंवाना बिलकुल भी पसंद नहीं करते तथा गति एवम सपष्टवादिता इन जातकों की मुख्य विशेषताएं होती हैं। अपनी तेज गति तथा नया कार्य करने की विशेषता के कारण अश्विनी जातक कई प्रकार के नए व्यवसाय करने में, नए अविष्कार करने में, नईं खोजें करने में तथा नए प्रयोग करने में प्रत्येक प्रकार के नक्षत्र के जातकों से कई कदम आगे रहते हैं। बातचीत में अश्विनी के जातक बहुत सपष्टवादी होते हैं ऐसे जातक सामान्यतया किसी प्रकार की भूमिका बांधने में समय नष्ट करना पसंद नहीं करते तथा बिना समय गंवाएं सामने वाले व्यक्ति से अपने मन की बात कह देते हैं। अश्विनी जातकों की इस आदत के चलते कई बार सुनने वाला व्यक्ति आहत हो जाता है जिसके चलते इन जातकों को कई बार अशिष्ट अथवा रुखा भी कहा जाता है किन्तु अश्विनी जातक अपने बारे में की जाने वाली ऐसी बातों की तनिक भी चिंता नहीं करते तथा अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करते रहते हैं।

अश्विनी जातक सामान्यतया किसी भी कार्य को करने में बहुत शीघ्रता दिखाते हैं जिसके चलते कई बार ऐसे जातक किसी प्रकार की हानि भी उठाते हैं किन्तु साथ ही साथ अश्विनी जातक अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में अधिक बुद्धिमान भी होते हैं जिसके चलते इन्हें तथ्यों को समझने में अधिक समय नहीं लगता जिससे यह किसी कार्य को शीघ्रता से कर लेने की क्षमता रखते हैं। कुंडली मे अश्विनी नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर अपनी आयु से कम ही दिखते हैं तथा बड़ी आयु में जाकर भी ऐसे जातक अन्य जातकों की तुलना में युवा दिखाई देते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी कुमारों का अपनी आयु से युवा दिखने का कारण अश्विनी कुमारों का इस नक्षत्र पर प्रभाव है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार चिर युवा रहने वाले देवता हैं तथा इनके प्रभाव में आने के कारण अश्विनी के जातक भी अपनी आयु की तुलना में युवा दिखाई देते हैं। कुंडली में अश्विनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्यतया बुद्धिमान, जीवन जीने की कला को जानने वाले, मोहक तथा आकर्षक होते हैं तथा इनका जीवन को जीने का अपना ही एक ढंग होता है। अश्विनी जातकों को रोमांच से भरपूर नए काम करने का तथा रोमांच से भरपूर खेल खेलने का शौक होता है तथा ऐसे जातक बहुत से रोमांचकारी खेलों में हिस्सा लेते हैं। इन जातकों को सामान्यतया खतरों से खेलने का शौक होता है तथा ऐसे जातक नई से नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर रहते हैं तथा अपने इस खतरों से खेलने के शौक के चलते कई बार ये जातक अपने आप को मुसीबत में भी डाल लेते हैं किन्तु मुसीबतें झेलने के बाद भी सामान्यतया ऐसे जातक खतरों से खेलना नहीं छोड़ते। कुंडली में अश्विनी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को मिलनसार बना देता है तथा ऐसे जातक बातचीत करने की कला में भी अच्छे होते हैं जिसके चलते लोग इनके साथ तथा इनकी संगत में रहना पसंद करते हैं।

कुंडली में अश्विनी नक्षत्र के प्रबले प्रभाव के कारण जातक कई प्रकार की नकारत्मक प्रवृतियों का आदी भी हो जाता है। उदाहरण के लिए अश्विनी के प्रबल प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातक प्रत्येक कार्य को शीघ्र से शीघ्र करने की कोशिश में रहते हैं तथा अपनी इस आदत के चलते ऐसे जातक बहुत से ऐसे कार्यों को करने में सक्षम नहीं होते जिन्हें करने के लिए धैर्य तथा सहनशीलता की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि धैर्य तथा सहनशीलता आम तौर पर अश्विनी जातकों के पास बिल्कुल भी नहीं होते। अश्विनी के जातक अधिकतर स्थितियों में शीघ्र परिणामों की अपेक्षा रखते हैं तथा शीघ्र परिणाम प्राप्त न होने की स्थिति में आम तौर पर ये जातक कार्य को अधूरा ही छोड़ देते हैं तथा किसी अन्य कार्य में अपना ध्यान लगा देते हैं। अपनी इस आदत के चलते कई अश्विनी जातक जीवन भर अपने व्यवसाय बदलते रहते हैं तथा जिस भी किसी व्यवसाय से इन्हें कुछ समय तक सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होते, ये उस व्यवसाय को छोड़ कर नए व्यवसाय की खोज में लग जाते हैं। इसलिए बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में अश्विनी के प्रबल प्रभाव वाले जातकों को अपने जीवन में धैर्य तथा सहनशीलता सीखना बहुत आवश्यक है तथा जो अश्विनी जातक अपने भीतर इन गुणों का विकास कर लेने में सक्षम हो जाते हैं वे अपने जीवन में बहुत सफल हो जाते हैं।

कुंडली में अश्विनी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को जिद्दी अथवा बहुत जिद्दी भी बना सकता है जिसके चलते ऐसे जातक एक बार जो निर्णय ले लेते हैं, उसे बदल पाना बहुत कठिन हो जाता है तथा अपनी इस जिद के कारण ये जातक जीवन में कई बार भारी हानि उठाते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह घोड़े का सिर यह दर्शाता है कि इस नक्षत्र का घोड़े के गुणों के साथ गहरा संबंध है तथा जिद्दी होना घोड़े के स्वभाव का एक विशेष गुण है जो अश्विनी के जातकों में भी आ जाता है जिसके चलते अश्विनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों से इनकी जिद के विपरीत कोई कार्य करवाना वैसे ही कठिन हो जाता है जैसे किसी अड़ियल घोड़े को बस में करना। अपनी इसी आदत के चलते अश्विनी के जातक जीवन में बहुत बार अपने सबसे बड़े शुभचिंतकों की सलाह भी नहीं मानते जिसके चलते इन्हें अपने जीवन में कई बार बहुत भारी हानि भी उठानी पड़ती है। किन्तु अपने जीवन में बार बार हानि उठाने के बाद भी अधिकतर अश्विनी जातक अपनी गलतियों से सीख नहीं लेते तथा अपने स्वभाव की कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं करते। जो अश्विनी जातक अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन लाने में सक्षम हो जाते हैं वे दूसरे अश्विनी जातकों की तुलना में जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में अधिक सफल देखे जाते हैं।

आइए अब चर्चा करते हैं अश्विनी नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जानी वाली गुण मिलान की प्रणाली में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी को पुरुष नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस लिंग निर्धारण का कारण अश्विनी के उपर अश्विनी कुमारों, केतु तथा मंगल का प्रभाव मानते हैं क्योंकि ये सभी के सभी ग्रह तथा देव पुरुष लिंग के ही हैं। वैदिक ज्योतिष में अश्विनी को वर्ण से वैश्य माना जाता है जिसका कारण कुछ विद्वान इस नक्षत्र का व्यापार क्षेत्र के साथ जुड़ा होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष अश्विनी नक्षत्र को गण में देव तथा गुण में सात्विक मानता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी अश्विनी नक्षत्र के इस गण तथा गुण निर्धारण का कारण इसके देवता अश्विनी कुमारों को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है

अश्विनी नक्षत्र Ashwini Nakshtra

अश्विनी नक्षत्र राशिचक्र का प्रथम नक्षत्र है। सत्ताईस नक्षत्रों में अश्विनी ही पहला है । ऊपर के ‘तिमिमंडल यां मारमण्डल’ से ये अपनी शक्ति संचय करता है। तिमिमंडल की प्रसूति कुछ रहस्यमय है । कभी-कभी एक पखवाड़े तक दीखता है और फिर नहीं भी दिखता है । इस मंडल की क्षमता ऐंद्रजनिक है । तभी पुराणों में शक्तिशाली मायावी तारा के नाम पर इसका एक नाम मारमण्डल भी पड़ा है । भारतीय पुराण के कामदेव इस मंडल के ‘मार’ यां ‘माया-तारा’ हैं ।

अथर्व-वेद में कहा है – ‘ कामः समुद्रम् धिवेश’। 

कामदेव में समुद्रासन में कल्पना का कारण मेष की पहली राशि मीन है । मीन जलराशि है । तभी माया तारारूपों में कामदेव समुद्र में आसीन है । भव चक्र की प्राचीन संज्ञा इसी नक्षत्र से शुरू होती है । पुराणों में लिखा है कि – विश्वकर्मा की लड़की संज्ञा का विवाह, सूर्य के साथ हुआ किन्तु सूर्य का तेज़ नहीं सह पाने के कारण संज्ञा ने अपने शरीर से छाया नामक एक नारी की सृष्टि की एवं सूर्य के निकट उसे रख वह अश्विनी रूप धारण कर विचरण करने लगी । इस जानकारी के बाद सूर्य अश्व का रूप धारण कर के संज्ञा के साथ मिल जाते हैं । इसके फलस्वरूप सूर्य का वीर्य संज्ञा के गर्भ से अश्विनी और रेवंत नामक दो पुत्र जन्मे ।

यही पुराण में वर्णित अश्विनी कुमारद्वय हैं ।

मेष राशि में अश्विनी नक्षत्र-मंडल के पास-पास दो नक्षत्र हैं । इन नक्षत्रों का मान शून्य अंश से लेकर बीस अंश तक फैला है । ऋग्वेद में इन नक्षत्रों का नाम ‘नासत्त’ और ‘दस्त्र’ है ।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल ( चौतीस सूक्त ) में उल्लेख है कि – ‘आ नासत्त: त्रिविरेका दमैरिह देवेभिमातं मधुपेय: शिना’ ।

आकाश में नक्षत्र-मंडल दृश्यमान है । तभी दस्त्र नाम का उल्लेख है । भवचक्र के प्रथम नक्षत्र में अश्विनी तथा अंतिम नक्षत्र में रेवती के बीच एक ‘निहारिका’ है जिसे किसी पुराण में ‘वृत्त’ और कहीं ‘नमुचि’ नाम दिया गया है ।

वृत्त अथवा नमुचि निहारिका ।

संपूर्ण परिक्रमा अर्थात 360 अंशों को पार कर जाने के बाद सूर्य के पुनः प्रथम अंश में प्रवेश कर इस वृत्त अथवा नमुचि निहारिका का भेदन अथवा छेदन कर अश्विनी में आना होता है ।

इसी का वर्णन पुराणों में वृत्त-संहार यां नमुचि-संहार के रूप में मिलता है ।

वामन-पुराण और महाभारत के ‘शल्य-पर्व’ में कहा है कि – इंद्र ने नमुचि का संहार समुद्र के फेन की तरह वज्रास्त्र द्वारा किया था । देवी भागवत पुराण में कहा है कि – इंद्र ने पहाड़ की तरह समुद्र के फेन का वज्रास्त्र द्वारा संहार किया था ।

वेद में वृत्त अंधकार के अधिदेवता हैं । मेष का नाम वृत्त यां अहि है । इंद्र इस मेष पर वज्र द्वारा आघात कर पृथ्वी पर वर्षा लाते हैं । ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण में नमुचि सोमरस चुराता है । यहाँ सोमरस से तात्पर्य अमृत यां वृष्टि से है ।

समुद्र का फेन निहारिका का परमाणविक पदार्थ होता है । वेद में निहारिका को समुद्र कहा गया है – ‘ अपः- अर्पा वैतरणी कया वृत्त’ । समुद्र का फेन यां निहारिका । यह न जल है न वाष्प । यह न भीगा है न सुखा । सूखने के बाद यह फेन घनीभूत हो जता है । यही निहारिका की प्रवृत्ति है । इसी प्रकार विश्व की सृष्टि होती है ।

विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा मेष के आदि बिन्दु में अवस्थित है । विश्वकर्मा का पुत्र वृत्त भी वहीँ अवस्थित है । भिन्न-भिन्न पुराणों में नक्षत्र-मंडल की कलायें सुंदर भाव में वर्णित है । ये नाक्षत्रिक, वैज्ञानिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक सत्य का अनुसंधान करती हैं । यही उनकी विशेषता है । पुराणों में, कहानियों में अश्विनी नक्षत्र के विषय में इसी रूप में विवरण मिलते हैं ।

जिस जातक का जन्म अश्विनी नक्षत्र में होता है वह अपूर्व रूप से दक्ष और कार्यकुशल होता है । शुभ-ग्रह से युक्त होने पर जातक इंद्र के समान बलशाली और शक्ति संपन्न होता है । पाप-ग्रह से युक्त होने पर उसमे नमुचि यां वृत्त समान आसुरी मनोभाव आते हैं । उच्चत्तम भावसम्पन्न अश्विनी के जातक लोगों की नज़रों से दूर, सुन्दर कार्य करने वाले होते हैं । समुन्द्र यात्रा, नौका चालन, समुद्र यां पृथ्वी के नीचे खोज कार्य, और प्रकृति में ये लोग जादूगर के सामान सिद्ध होते हैं । ये जातक तेज़दीप्त होते हैं । देवतुल्य, सात्विक भाव संपन्न, लंबा चेहरा, अनुनासिक कंठ स्वर, तेज गति वाले, वैरागी स्वभाव और अक्सर सुखी ना रहने वाले होते हैं । विवाहित ना होने पर भी अनेकों का भरण पोषण करने का प्रयास करते हैं । प्रभुता संपन्न स्वभाव होने के बावजूद भी ये खुद विश्वस्त होते हैं । नौकर चाकर इनका कहा मानते हैं । ये लोग श्रमिकों के साथ भी निपुण भाव से कार्य कर सकते हैं । द्रव्यदि के क्रय-विक्रय से इन्हें लाभ होता है । बहरहाल क्रोध सयंम के अभ्यास की इन्हें सदा ही आवश्यकता होती है । इस नक्षत्र की स्त्रियों को प्रसव के समय बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है ।

अशुभ प्रभाव से युक्त अश्विनी के जातक कुटील स्वभाव के होते हैं । ये लोगों की नज़रों से दूर रहकर पाप-कर्म करते हैं । ये जातक चोरी की वृत्ति वाले, अवैध ढंग से वासना की पूर्ति करने वाले और मोहित करके लोगों का सर्वस्व हरण करने में सिद्धहस्त होते हैं । अश्विनी कुमारद्वय, संज्ञा की जुड़वा संतान है । ये देवताओं के वैद्य के रूप में विशेषयता प्रसिद्ध है । इस नक्षत्र के जातक वशिष्ट चिकित्सक होते हैं । जिस जातक के दसवें भाव में अश्विनी नक्षत्र हो और उसमे कोई शुभ ग्रह हो तो ऐसे जातक वशिष्ट चिकित्सक अथवा वशिष्ट इंजीनियर होते हैं । लेकिन दसवें भाव में अगर अशुभ ग्रह होगा तो फिर नाम नहीं होगा ।

इस नक्षत्र के फलस्वरूप जातक को जुड़वा संतान भी हो सकती है । कुम्भ लग्न हो और मंगल, अश्विनी नक्षत्र में हो तो जातक के जुड़वा भाई-बहिन होते हैं । पिता भाव का स्वामी अगर अश्विनी नक्षत्र हो तो पिता यां चाचा जुड़वा संतान होती हैं । पुत्र कारक भाव में इसके होने से जुड़वा संतान हो सकती है । अश्विनी नक्षत्र में शुक्र अथवा चंद्र हो तो जातक की दो पत्नियां यां दो मातायें होने की संभावना होती है । अश्विनी नक्षत्र की महिलायें सुन्दर और धनवती होती है । प्रियजन से संपर्क बनाये रखने की इच्छुक, प्रिय भाषा बोलने की अभ्यस्त और अपने जीवन में सुख-दुःख रुपी उतार-चढ़ाव सदैव देखती हैं । अपने व्यवहार से दूसरों का दिल जीतने वाली, अच्छी बुद्धी से संपन्न होती हैं । देवी-देवताओं – गुरुजन तथा वृद्धजनों के प्रति गहरी आस्था रखती हैं । ये महिलायें प्रत्येक ( गृह ) कार्य में कुशल, शरीर के सौन्दर्याकर्षण से युक्त , सौभाग्यशालिनी, पतिभक्ति-व्रतपरायन, अपने परिवार में आदरणीया तथा अपने जीवनसाथी की अतयंत प्रिय होती है ।

अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न स्त्री-पुरुषों को प्रायः ज्वर, स्वेद, मंदज्वर, कम्पन्न, अरुचि, अंगशोध, एवं योगिनी-दोषज व्याधियों का भय होता है ।

इनकी शान्ति के लिये किसी भी नदी, जलाशय के दोनों किनारों की मिटटी लाकर एक कल्पित योगिनी मूर्ति बनाकर ।
श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प 5 झड़ी, 5 दीपक, आटे का स्वस्तिक 7, कपूर और धूपबत्ती से पूजन करें ।
अश्विनी कुमार की प्रार्थना करते हुए गुड़ और तिल की बली दें ।
यव-घृत और अपामार्ग-मूल का हवन इस मंत्र से करें –
ॐ अश्विना तेजसा चक्षु: प्राणेन सरस्वती वीर्ययम । 
वाचेन्द्रो बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम् 

ॐ अश्विनीकुमारभ्यां नमः ।।

इस मंत्र का 5000 जप प्रशस्त है ।

वात, ज्वर, गात्र-पीड़ा, निंद्रा-भंग और बुद्धि-भ्रम होने पर स्वर्ण-दान, श्री क्षीरमोदक-दान तथा घृतपूर्ण कुम्भ-दान करना श्रेयकर होता है । अशक्त स्तिथि में अपामार्ग की जड़ दायें हाथ में धारण करें ।

अश्विनी नक्षत्र के विषय में | इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है, बड़ी और चमकदार आँखें होती हैं और चौड़ा मस्तक होता है | स्वास्थ्य सामान्यतः अच्छा रहता है | साहित्य और अस्न्गीत में सी जातक की रूचि हो सकती है | शुद्ध हृदय इस जातक की वाणी मधुर होती है | यह जातक विद्वान्, स्थिर प्रकृति, अपने कार्यों में कुशल, विश्वसनीय तथा अपने परिवार में सम्मानित व्यक्ति होता है | आत्मसम्मान की भावना उसमें कूट कूट कर भरी होती है और जब दूसरे उसका सम्मान करते हैं तो उसे बहुत अच्छा लगता है | आर्थिक रूप से सम्भव हो मध्यम स्तर का हो, किन्तु दयालु तथा दानादि करने वाला होता है और धार्मिक प्रकृति का होता है | छोटी से छोटी बातों को बारीकी से देखना इसका स्वभाव होता है और दूसरों की छोटी से छोटी भूल की ओर इशारा करने में इसे संकोच नहीं होता | यह जातक आज्ञाकारी, सत्यवादी, अपने अधीनस्थ लोगों की तथा परिवार के लोगों की देखभाल करने वाला, अच्छे स्वभाव का, कार्य को समय पर पूर्ण करने वाला तथा वेद शास्त्रों का ज्ञाता भी हो सकता है |

यदि जातक की कुण्डली में यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में होगा तो जातक अहंकारी हो सकता है तथा अकारण ही घूमते रहने में इसकी रूचि हो सकती है | अशुभ प्रभाव में होने पर जातक दूसरों को धोखा भी दे सकता है तथा आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित भी रह सकता है | विवाहित व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध बनाना ऐसे जातक अक स्वभाव हो सकता है | गठिया बुखार, शरीर में दर्द अथवा स्मृतिहीनता जैसी समस्या से ग्रस्त हो सकता है |

इस नक्षत्र का प्रथम चरण “तस्करांश” कहलाता है, दूसरा चरण “भोग्यांश”, कहलाता है, तीसरा चरण “विलक्षणान्श” और चतुर्थ चरण “धर्मांश” कहलाता है | प्रथम तीन चरणों में उत्पन्न जातक प्रायः अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से होते हैं और साहसी, धनी, उत्तम भोजन करने वाले, पढ़े लिखे होते हैं किन्तु अकारण ही बेचैन रहते हैं और Restless होते हैं तथा सदा लड़ने को तत्पर रहते हैं | जीवन में समस्त सुखों का उपभोग करते हैं | Highly sexy हो सकते हैं और दूसरों के जीवन साथी के साथ इनके सम्बन्ध हो सकते हैं | चतुर्थ पाद में जन्म लेने वाले जातक प्रायः ईश्वरभक्त होते हैं और धनी तथा दयालु होते हैं |

अधोमुखी यह नक्षत्र तमोगुण प्रधान नक्षत्र है तथा नक्षत्र पुरुष की दाहिनी जँघा में इसका निवास माना गया है | वैदिक पञ्चांग के अनुसार यह नक्षत्र अश्विनी माह का प्रमुख नक्षत्र है – जो सितम्बर-अक्टूबर के मध्य आता है | मेष राशि में 13 डिग्री बीस मिनट तक इसका विस्तार होता है | इस नक्षत्र से सम्बन्धित वस्तुएँ हैं अश्व, उत्तम वस्त्राभूषण, वाहन तथा लोहे और स्टील से निर्मित अन्य वस्तुएँ |

औषधि ग्रहण करने के लिए तथा स्वास्थ्य में सुधार सम्बन्धी कार्य आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र अत्यन्त अनुकूल माना जाता है | इसके अतिरिक्त यात्रा आरम्भ करने के लिए, कृषिकर्म आरम्भ करने के लिए, बच्चे को प्रथम बार विद्यालय भेजने के लिए, गृहनिर्माण आरम्भ करने और गृहप्रवेश के लिए तथा अन्य भी सभी प्रकार के शुभ कार्यों का आरम्भ करने के लिए यह नक्षत्र शुभ माना जाता है | हाथी और घोड़ों की ख़रीद फ़रोख्त के लिए तथा नए वाहन में प्रथम बार यात्रा करने के लिए और नवीन वस्त्राभूषण धारण करने के लिए भी यह नक्षत्र अनुकूल माना गया है | किन्तु विवाह से सम्बन्धित कार्यों के लिए यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता |

यदि यह नक्षत्र अशुभ प्रभाव में हो तो उस अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए घोड़ों के सहित रथ दान करने का अथवा पितृ कर्म करने का सुझाव दिया जाता है | इस युग में रथ घोड़े आदि दान करना सम्भव नहीं अतः ज्योतिषी घोड़े सहित रथ की मूर्ति दान करने का सुझाव देते हैं |

अश्विनी नक्षत्र :-

सभी नक्षत्रों के चार चरण होते है। घोड़े का सिर अश्विनी प्रतीक चिन्ह है। घोड़े को सवारी के लिए इस्तेमाल करते हैं। घोड़ा हमेशा सवारी के लिए तैयार रहता हैं। केतु ग्रह इसके स्वामी हैं जातक जिंदा दिल ,समझदार होते हैं। जो सोचता उसको जल्दी से कार्यरूप देता हैं जिसके कारण नुकसान भी उठता हैं। छोटा कद , पुष्ट देह,सरल ह्रदय,क्रीड़ा प्रेमी होता हैं। किसी कार्य के अदुभुत क्षमता रखा है। यह जातक सारी उम्र कूदता रहता हैं। जिसके हानि भी हो जाती है। इस नक्षत्र वाले जातक सजने -सँवरने में अधिक विश्वास रखते हैं।यह वैश्य जाति का प्रतिनिधि माना जाता हैं।

           अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में बालक /बालिका का जन्म हो। पिता को कष्ट एवं धन हानि आदि अशुभ परिणाम होते हैं। अश्विनी नक्षत्र के दूसरे चरण जन्म लेने वाला धन का अपव्यय करता है। तृतीय चरण मे जन्म लेने वाला जातक पिता के आकस्मिक यात्रा  देता है। चतुर्थ चरण जन्म लेने जातक स्वयं अपने शरीर के लिए अरिष्टकारी कारक होता हैं।
          प्रथम नक्षत्र अश्विनी वैश्य जाति का प्रतिनिधित्व करता है।वाणिज्य करने सभी गुण अश्विनी नक्षत्र वाले जातकों में होते है। इस नक्षत्र के जातकों पुरूष संज्ञक माना जाता हैं। अश्विनी नक्षत्र मंगल की राशि मे सूर्य उच्च स्थान पाता हैं। अश्विनी नक्षत्र का अंग घुटना हैं।घुटने की चोट लगने से घोड़े की तीव्र गति से दौड़ते है उनका घुटने अधिक बली होते है। वात,पित्त,कफ में अश्विनी नक्षत्र वायु का प्रतिनिधितव करता हैं। अश्विनी का स्थान केंद्र होता हैं।
अश्विनी के चार पद :-
1. अश्विनी का प्रथम पद मेष राशि के शून्य अंश से 3 अंश 20 कला तक होने के कारण मेष राशि का प्रथम नवाशं बनता हैं।इस पद के स्वामी मंगल हैं जो जातक को साहस ,उत्साह व बल प्रदान कर अपने क्षेत्र अग्रणी बनता हैं। ऐसे जातक कर्मठ,ऊर्जावान तथा नेतृत्व करने सक्षम होते है।गण्डमूल संज्ञक होने के पिता के लिए कष्ट कारक होता हैं।
   2. द्वितीय पद :-  मेष राशि मे 3 अंश 20 कला से 6 अंश 40 कला तक है। इसका स्वामी शुक्र ग्रह हैं। इस चरण जन्मे बच्चे साधन संपन्न , भोग विलास के प्रेमी तथा धन वैभव युक्त सम्मानित आदमी होता हैं।परन्तु धन का अपव्यय करता हैं।

मेष (Aries)

राशि चक्र की यह पहली राशि है, इस राशि का चिन्ह ”मेढा’ या भेडा है, इस राशि का विस्तार चक्र राशि चक्र के प्रथम 30 अंश तक (कुल 30 अंश) है। राशि चक्र का यह प्रथम बिन्दु प्रतिवर्ष लगभग 50 सेकेण्ड की गति से पीछे खिसकता जाता है। इस बिन्दु की इस बक्र गति ने ज्योतिषीय गणना में दो प्रकार की पद्धतियों को जन्म दिया है। भारतीय ज्योतिषी इस बिन्दु को स्थिर मानकर अपनी गणना करते हैं। इसे निरयण पद्धति कहा जाता है। और पश्चिम के ज्योतिषी इसमे अयनांश जोडकर ’सायन’ पद्धति अपनाते हैं। किन्तु हमे भारतीय ज्योतिष के आधार पर गणना करनी चाहिये। क्योंकि गणना में यह पद्धति भास्कर के अनुसार सही मानी गई है। मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है, तथा इसका स्वामी ’मंगल’ है। इसके तीन द्रेष्काणों (दस दस अंशों के तीन सम भागों) के स्वामी क्रमश: मंगल-मंगल, मंगल-सूर्य, और मंगल-गुरु हैं। मेष राशि के अन्तर्गत अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण और कॄत्तिका का प्रथम चरण आते हैं। प्रत्येक चरण 3.20′ अंश का है, जो नवांश के एक पद के बराबर का है। इन चरणों के स्वामी क्रमश: अश्विनी प्रथम चरण में केतु-मंगल, द्वितीय चरण में केतु-शुक्र, तॄतीय चरण में केतु-बुध, चतुर्थ चरण में केतु-चन्द्रमा, भरणी प्रथम चरण में शुक्र-सूर्य, द्वितीय चरण में शुक्र-बुध, तॄतीय चरण में शुक्र-शुक्र, और भरणी चतुर्थ चरण में शुक्र-मंगल, कॄत्तिका के प्रथम चरण में सूर्य-गुरु हैं।

नक्षत्र चरणफल

  • अश्विनी भदावरी ज्योतिष नक्षत्र के प्रथम चरण के अधिपति केतु-मंगल जातक को अधिक उग्र और निरंकुश बना देता है। वह किसी की जरा सी भी विपरीत बात में या कर्य में जातक को क्रोधात्मक स्वभाव देता है, फ़लस्वरूप जातक बात बात मे झगडा करने को उतारू हो जाता है। जातक को किसी की आधीनता पसंद नहीं होती है। वह अपने अनुसार ही कार्य और बात करना पसंद करता है।
  • दूसरे चरण के अधिपति केतु-शुक्र, जातक को ऐसो आराम की जिन्दगी जीने के लिये मेहनत वाले कार्यों से दूर रखता है, और जातक विलासी हो जाता है।
  • तीसरे चरण के अधिपति केतु-बुध जातक के दिमाग में विचारों की स्थिरता लाता है, और जातक जो भी सोचता है, करने के लिये उद्धत हो जाता है।
  • चौथे चरण के अधिपति केतु-चन्द्रमा जातक में भटकाव वाली स्थिति पैदा करता है, वह अपनी जिन्दगी में यात्रा को महत्व देता है, और जनता के लिये अपनी सहायतायें वाली सेवायें देकर पूरी जिन्दगी निकाल देगा।
  • भरणी भदावरी ज्योतिष के प्रथम चरण के अधिपति शुक्र-सूर्य, जातक को अभिमानी और चापलूस प्रिय बनाता है।
  • दूसरा चरण के अधिपति शुक्र-बुध जातक को बुद्धि वाले कामों की तरफ़ और संचार व्यवस्था से धन कमाने की वॄत्ति देता है।
  • तीसरे चरण के अधिपति शुक्र-शुक्र विलासिता प्रिय और दोहरे दिमाग का बनाता है, लेकिन अपने विचारों को उसमे सतुलित करने की अच्छी योग्यता होती है।
  • चौथे चरण के अधिपति शुक्र-मंगल जातक में उग्रता के साथ विचारों को प्रकट न करने की हिम्मत देते हैं, वह हमेशा अपने मन मे ही लगातार माया के प्रति सुलगता रहता है। जीवन साथी के प्रति बनाव बिगाड हमेशा चलता रहता है, मगर जीवन साथी से दूर भी नहीं रहा जाता है।
  • कॄत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण के अधिपति सूर्य-गुरु, जातक में दूसरों के प्रति सद्भावना और सदविचारों को देने की शक्ति देते हैं, वे अपने को समाज और परिवार में शालीनता की गिनती मे आते है।

 

मेष दैनिक राशिफल आपको अपने नियमित कार्यों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में मदद करेगा। यदि आपकी राशि मेष है, या यूँ कहें कि आप मेष राशि के जातक हैं, तो आपको इस मेष राशिफल के द्वारा आपकी ज़िन्दगी से जुड़ी किसी भी घटना के होने से पहले निर्देशित किया जाएगा, जिससे आप किसी तरह की परेशानी में न फसें और अपनी असफलता को सफलता में बदल सकें। क्यूंकि यदि हमें किसी भी बुरे घटना के बारे में कोई जानकारी हो जाये, तो शायद हम खुद को पहले ही सावधान कर सकते हैं ताकि उस घटना के कारण किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचे। मेष राशिफल का विश्लेषण करने के लिए पहले मेष राशि के बारे में समझें:

मेष राशि चिन्ह

राशि चक्र की पहली राशि मेष है, जिसकी वजह से इस राशि के जातक शिशु की तरह मासूम होते हैं। इस राशि का चिन्ह “मेढ़ा” होता हैं, जो बेहद निडर और साहसी होता है। ये लोग अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीते हैं और अपनी विचारधारा के साथ किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहते हैं।

राशि चक्र का यह पहला बिन्दु हर वर्ष लगभग 50 सेकेण्ड की गति से पीछे खिसकता जाता है। इस बिन्दु की बक्र गति ने ज्योतिषीय गणना में दो प्रकार की पद्धतियों को जन्म दिया है। इस बिन्दु को स्थिर मानकर भारतीय ज्योतिषी अपनी गणना करते हैं। जिसे निरयण पद्धति कहा जाता है और पश्चिम के ज्योतिषी इसमे अयनांश जोडकर ‘सायन’ पद्धति अपनाते हैं लेकिन हमें भारतीय ज्योतिष के आधार पर ही गणना करनी चाहिये।

मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है, और इसका स्वामी ’मंगल’ ग्रह होता है। मेष राशि चिह्न के तहत इस राशि में जन्में जातक जीवन की नई उर्जा से भरे हुए होते हैं। ये लोग आवेगी और आत्मकेन्द्रित होते हैं।

मेष- शारीरिक बनावट

  • मेष राशि के जातक मध्यम कद के होते हैं।
  • ये लोग हमेशा चौकस बने रहते हैं इसीलिए अगर आप इस राशि के जातक को ध्यान से देखें तो इनकी भौंहें हमेशा ऊपर चढ़ी रहती हैं। हर कार्य में इनका ध्यान सतर्कता पर पहले रहता है।
  • इस राशि के जातकों के हाथों की बनावट कोन के आकार जैसी होती हैं और इनकी उंगलियों की अपेक्षा हथेली बड़ी होती है।
  • इनका मस्तिष्क विशाल और चेहरे की आकृति विद्वत्तासूचक होती है।
  • ऐसे लोगों के सिर के किसी भी भाग पर चोट का निशान होता है और छाती या चेहरे पर तिल या मस्से का चिह्न भी रहता है।
  • मेष राशि के लोग सफाई पसंद होते हैं। वे हर काम को साफ-सुथरे ढंग से करना पसंद करते हैं।
  • इन जातकों की आंखें कमजोर रहती हैं।
  • इस राशि का प्रभाव मस्तिष्क पर रहने की वजह से इन लोगों को मानसिक शांति कम रहती है।

मेष- व्यक्तित्व

  • मेष राशि के जातक स्पष्टवादी, सीधा और नेतृत्व करने की भावना रखने वाले होते हैं।
  • मेष राशि के लोगों का स्वभाव उदार होता है।
  • मेष राशि का व्यक्ति उत्तेजना के साथ शीघ्र कार्य करने वाला होता है। ऐसा इसीलिए होता है क्यूंकि मेष का स्वामी ग्रह ‘मंगल’ है, जो अग्नि तत्व प्रधान है।
  • मेष राशि का जातक स्वतंत्र विचारों तथा मौलिकता का समर्थक होता है।
  • इस राशि का व्यक्ति स्वभाव से प्रेमी होता है। उसे स्वार्थ से घृणा होती है।
  • मेष राशि के व्यक्ति में अपने सहयोगियों से काम लेने की अद्भुत क्षमता होती है।
  • इस राशि से जुड़े लोग हमेशा चौकस बने रहते हैं। हर कार्य में इनका ध्यान सतर्कता पर पहले रहता है।
  • मेष राशि वाले कुछ व्यक्ति जिद्दी स्वभाव के भी होते हैं। ये लोग तब तक अपनी गलती नहीं मानते, जब तक उन्हें किसी तरह का भारी नुकसान नहीं उठाना पड़ जाए।
  • मेष राशि के जातकों की कल्पना तथा निरीक्षण शक्ति अच्छी होती है।
  • मेष राशि में “सूर्य” बलवान होता है। और यदि इस राशि में “गुरु” स्थित हो तो शुभ फल की प्राप्ति होती है।

मेष- रुचियाँ/शौक

मेष राशि के लोगों की वैसे क्षेत्रों में अधिक रूचि होती है, जिनमें आसानी से धन मिल सकता हो जैसे- लॉटरी, जुआ आदि।इस राशि के जातक का अनुमान जुआ, लॉटरी और घुड़दौड़ जैसी चीज़ों में बहुत सटीक बैठता है और अधिकांश तौर पर ये लोग जीतते भी हैं। मेष राशि वाले उन क्षेत्रों में रुचि लेते हैं, जिसमें वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सके। ऐसे लोगों का नृत्य, अभिनय आदि जैसे क्षेत्रों में अधिक झुकाव रहता है। कपड़े, फर्निचर और पुस्तकालय आदि कार्यों में भी ये लोग खासा रूचि रखते हैं।

मेष- कमियां

  • मेष राशि के जातक को स्वयं के गुप्त भेदों के प्रकट हो जाने का डर रहता है।
  • इस राशि के लोगों को जल्दी क्रोध आ जाता है और ऐसे लोग अपमान सहन नहीं कर सकते हैं।
  • मेष राशि का व्यक्ति चर्चा के दौरान जोश बहुत जोश दिखाता है।
  • परिवार में अक्सर किसी एक व्यक्ति से इनकी खटपट चला करती है।
  • मेष राशि वाले कुछ व्यक्ति जिद्दी स्वभाव के भी होते हैं। ये लोग तब तक अपनी गलती नहीं मानते, जब तक उन्हें किसी तरह का भारी नुकसान नहीं उठाना पड़ जाए।
  • यदि मेष राशि में “शनि” स्थित हो तो यह अशुभ फल देता है। ऐसे लोग जिनका भला करते हैं, वही इनकी परेशानियों का कारण बनता है।
  • इस राशि वाले पुरुष में एक विशिष्ट गुण होता है कि यदि ये लोग एक बार किसी के हो जाते हैं, तो उन्हें अपना सब कुछ दे बैठते हैं। अपने इस व्यवहार के कारण उन्हें अक्सर हानि उठानी पड़ जाती है।
  • मेष राशि वाला व्यक्ति प्रेम के विषय में दूसरों को मूर्ख बनाता है।
  • इस राशि वाले जातकों को अपनी मनोकांक्षा पूरी करने के लिए- ‘ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः’- मंत्र का 10000 जाप करना चाहिए ।

मेष- शिक्षा एवं व्यवसाय

मेष राशि के अधिकांशतः जातक शिक्षित होते हैं। चूंकि मेष का संबंध मस्तिष्क से होता है इसीलिए ये लोग शिक्षा के क्षेत्र में काफी सफल होते हैं। इस राशि के जातक मेडीकल, इन्जीनियरिंग, राजनीति शास्त्र, रसायन शास्त्र जैसे विषयों का चुनाव करें तो उन्हें विशेष सफलता प्राप्त होती है।

मेष राशि के लोग यदि विद्युत, खनिज, कोयला, खनिज तेल, सीमेंट, मेडिकल स्टोर, आतिशबाजी, जमीन-जायदाद, पहलवानी, खेल-कूद, रंग-व्यवसाय, घड़ियां, कैमिस्ट, रेडियो, तम्बाकू आदि जैसे क्षेत्रों में व्यवसाय करते हैं तो वे अधिक मुनाफ़ा प्राप्त कर उस व्यवसाय को सफलतापूर्ण चला सकते हैं। मेष राशि के जातक व्यवसाय में साझीदारी कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु और मीन राशि वाले लोगों के साथ कर सकते हैं। इस राशि की स्त्रियां भी व्यवसाय के क्षेत्र में काफी सफलता प्राप्त करती हैं।

मेष- प्रेम संबंध

  • मेष राशि का पांचवां स्थान प्रेम संबंध का सूचक है और यह सिंह राशि का स्थान है। इससे यह पता चलता है कि इस राशि का व्यक्ति प्रेमी-स्वभाव का होता है, लेकिन सिर्फ उन्हीं लोगों से प्रेम करता है, जो उनसे प्रेम करते हों।
  • इस राशि के जातक में लोगों को पहचानने की अद्भुत क्षमता होती है। मेष राशि वालों को स्वार्थ से घृणा होती है। ये स्वार्थी लोगों को जल्दी ही पहचान लेता है और उनसे बेहद दूर रहने की कोशिश करत है।
  • मेष राशि वाले व्यक्ति को प्रेम का क्षणिक आनंद ही प्राप्त हो पाता है। मेष राशि वालों को मनचाहा साथी नहीं मिल पाता अर्थात जैसा प्रेम वो चाहते हैं उन्हें वो नहीं मिल पाता।
  • इस राशि के व्यक्ति की मेष राशि वाले पुरुष या स्त्री से ही खूब पटती है।
  • वे स्त्रियां जो मेष राशि की होती हैं वे बेहद स्वाभिमानी होती हैं जिसकी वजह से उन्हें झुकाने का प्रयत्न व्यर्थ जाता है। आप इन स्त्रियों को तोहफे आदि से भी आकर्षित नहीं कर सकते।

मेष- विवाह और दांपत्य जीवन

मेष राशि के पुरुष अपनी पत्नी को हमेशा अधिक सक्रिय और आकर्षक देखना चाहते हैं। ऐसे लोग प्रेम का आश्वासन चाहते हैं। मेष राशि से संबंध रखने वाला पुरुष हो या फिर स्त्री, इन्हें अकेला रहना बिलकुल पसंद नहीं होता है। सूर्य, मंगल और शुक्र का योग इस राशि वालों को सेक्स के विषय में आदर्शवादी बना देता है। इस राशि के जातकों के दाम्पत्य जीवन में गृह कलह रहती है और जीवनसाथी से संबंध अच्छे नहीं होते हैं। मेष राशि के पति-पत्नी में प्रायः असीम प्रेम देखने को मिलता है, लेकिन इनके बीच गृहकलह भी उतना ही ज्यादा होता है।

मेष- घर-परिवार

मेष राशि वाले लोगों को अपने परिवार से प्रेम और आदर मिलता है। इन्हें अपने परिवार, आस-पड़ोस और अपने समाज में भी आदर से देखा जाता है। इस राशि के जातक के प्रशंसक हर जगह होते हैं। मेष राशि वालों में नेतृत्व का गुण होता है जिसकी वजह से उनके परिवार के लोंग उसकी इच्छाओं का आदर और समर्थन करते हैं। ये लोग अपनी संतानों को बहुत प्यार करते हैं।

मेष- इष्ट मित्र

  • मेष राशि वाले जातकों की कुंभ राशि से बहुत अच्छी पटती है। इसके अलावा सिंह, धनु और मिथुन राशि से भी मित्रता रहती है।
  • मेष राशि के लोगों का मिथुन राशि से विवाद रहता है। कर्क और मकर राशि के साथ भी इनकी बिलकुल नहीं बनती है।
  • वृषभ, कन्या और मकर राशियों से इनके लाभप्रद संबंध बनते हैं।
  • कर्क, वृश्चिक और मीन राशि वाले जातकों से सतर्क रहें, अन्यथा ये लोग नुकसान पहुंचा सकते हैं।

मेष – स्वास्थ्य

मेष राशि के जातक स्वस्थ शरीर के स्वामी होते हैं। यदि ये दुर्घटनाओं से बचते रहें, तो बीमारी भी इन्हें ज्यादा परेशान नहीं कर पाती है। बचपन से ही इन्हें शरीर में फोड़े-फुंसी, जलना-कटना आदि जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मेष राशि का प्रभाव मस्तिष्क पर रहता है। इसीलिए इन्हें मानसिक अशांति भोगनी पड़ती है। मेष राशि वाले लोगों को आराम की काफ़ी जरूरत रहती है। इनके लिए प्रातःकाल भ्रमण करना अच्छा रहता है। इस राशि के लोगों को गरम चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

मेष राशि के लोगों में नेत्र से जुड़ी समस्या भी देखने को मिलती है। इन्हें सिरदर्द रहता है और ऑपरेशन का योग भी होता है। मेष राशि वाले लोगों को अपने रक्त की शुद्धता पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अधिकांश रोग इन्हें रक्त की अशुद्धि के कारण होती है। इस राशि के जातक को रक्त शुद्धि के लिए प्रातःकाल उठते ही पानी, दोपहर में छाछ तथा रात्रि में दूध पीना लाभकारी होगा।

मेष- भाग्यशाली अंक

9 का अंक मेष राशि के जातकों के लिए भाग्यशाली होता है। इसीलिए 9 अंक की श्रृंखला 9, 18, 27, 36, 45, 54, 63, 72…इनके लिए शुभ होती है।

मेष- भाग्यशाली रंग

अगर रंग की बात करें तो मेष राशि वालों के लिए लाल और सफेद रंग भाग्यशाली रंग होता है। इन रंगीन के वस्त्र पहनने से इन्हें मानसिक शांति मिलती है। मेष राशि वाले लोगों के लिए जेब में हमेशा लाल रूमाल रखना बहुत फायदेमंद होता है।

मेष – भाग्यशाली दिन

मेष राशि का “मंगल” ग्रह से बहुत ही निकट संबंध होता है, इसीलिए मंगलवार इस राशि के जातकों का भाग्यशाली दिन होता है। इसके साथ ही गुरुवार एवं रविवार भी इनके लिए शुभ दिन होते हैं। मेष राशि वाले लोगों के लिए शुक्रवार का दिन अशुभ रहता है।

मेष – भाग्यशाली रत्न

मेष राशि वाले लोगों के लिए “मूंगा” भाग्यशाली रत्न होता है। इसीलिए मंगल खराब रहने पर इन्हें मूंगा पहनना चाहिए। आप इस रत्न को तांबे की धातु में लगाकर पहन सकते हैं। मेष राशि वाले यदि मूंगा को मंगलवार के दिन अनामिका अंगुली में धारण करें तो यह अधिक लाभप्रद रहता है। रत्न के अलावा अन्य उपाय के रूप में आप मंगलवार को उपवास रख सकते हैं। कहीं-कहीं पर ज्योतिष विधा के अनुसार मेष राशि वाले जातकों के लिए भाग्यशाली रत्न माणिक्य व हीरा बताया जाता है।

ऊपर हमने मेष राशिफल और मेष राशि के जातकों से जुड़ी शारीरिक बनावट, व्यक्तित्व, शौक, कमियां, खूबियां, परिवार, प्रेम संबंध जैसे सभी पहलुओं को अच्छे से जाना। आशा करते हैं कि एस्ट्रोसेज द्वारा दी गयी जानकारी आपको मेष राशि के लोगों को समझने में मददगार सिद्ध होगी।

जिन जातकों के जन्म समय में निरयण चन्द्रमा मेष राशि में संचरण कर रहा होता है, उनकी मेष राशि मानी जाती है, जन्म समय में लगन मे मेष राशि होने पर भी यह अपना प्रभाव दिखाती है। मेष लगन मे जन्म लेने वाला जातक दुबले पतले शरीर वाला, अधिक बोलने वाला, उग्र स्वभाव वाला, रजोगुणी, अहंकारी, चंचल, बुद्धिमान, धर्मात्मा, बहुत चतुर, अल्प संतति, अधिक पित्त वाला, सब प्रकार के भोजन करने वाला, उदार, कुलदीपक, स्त्रियों से अल्प स्नेह, इनका शरीर कुछ लालिमा लिये होता है। मेष लगन मे जन्म लेने वाले जातक अपनी आयु के 6,8,15,20,28,34,40,45,56 और 63 वें साल में शारीरिक कष्ट और धन हानि का सामना करना पडता है,16,21,29,34,41,48 और 51 साल मे जातक को धन की प्राप्ति वाहन सुख, भाग्य वॄद्धि, आदि विविध प्रकार के लाभ और आनन्द प्राप्त होते हैं।

मेष अग्नितत्व वाली राशि है, अग्नि त्रिकोण (मेष, सिंह, धनु) की यह पहली राशि है, इसका स्वामी मंगल अग्नि ग्रह है, राशि और स्वामी का यह संयोग इसकी अग्नि या ऊर्जा को कई गुना बढा देती है, यही कारण है कि मेश जातक ओजस्वी, दबंग, साहसी, और दॄढ इच्छाशक्ति वाले होते हैं, यह जन्म जात योद्धा होते हैं। मेश राशि वाले व्यक्ति बाधाओं को चीरते हुए अपना मार्ग बनाने की कोशिश करते हैं।

मेष जातकों के अन्दर धन कमाने की अच्छी योग्यता होती है, उनको छोटे काम पसंद नहीं होते हैं, उनके दिमाग में हमेशा बडी बडी योजनायें ही चक्कर काटा करती है, राजनीति के अन्दर नेतागीरी, संगठन कर्ता, उपदेशक, अच्छा बोलने वाले, कम्पनी को प्रोमोट करने वाले, रक्षा सेवाओं में काम करने वाले, पुलिस अधिकारी, रसायन शास्त्री, शल्य चिकित्सिक, कारखानों ए अन्दर लोहे और इस्पात का काम करने वाले भी होते हैं, खराब ग्रहों का प्रभाव होने के कारण गलत आदतों में चले जाते हैं, और मारकाट या दादागीरी बाली बातें उनके दिमाग में घूमा करतीं हैं, और अपराध के क्षेत्र मे प्रवेश कर जाते हैं।

स्वास्थ्य और रोग

अधिकतर मेष राशि वाले जातकों का शरीर ठीक ही रहता है, अधिक काम करने के उपरान्त वे शरीर को निढाल बना लेते हैं, मंगल के मालिक होने के कारण उनके खून मे बल अधिक होता है, और कम ही बीमार पडते हैं, उनके अन्दर रोगों से लडने की अच्छी क्षमता होती है। अधिकतर उनको अपनी सिर की चोटों से बच कर रहना चाहिये, मेष से छठा भाव कन्या राशि का है, और जातक में पाचन प्रणाली मे कमजोरी अधिकतर पायी जाती है, मल के पेट में जमा होने के कारण सिरदर्द, जलन, तीव्र रोगों, सिर की बीमारियां, लकवा, मिर्गी, मुहांसे, अनिद्रा, दाद, आधाशीशी, चेचक, और मलेरिया आदि के रोग बहुत जल्दी आक्रमण करते हैं।

अश्विनीभदावरी ज्योतिष नक्षत्र के प्रथम चरण के अधिपति केतु-मंगल जातक को अधिक उग्र और निरंकुश बना देता है। वह किसी की जरा सी भी विपरीत बात में या कर्य में जातक को क्रोधात्मक स्वभाव देता है, फ़लस्वरूप जातक बात बात मे झगडा करने को उतारू हो जाता है। जातक को किसी की आधीनता पसंद नहीं होती है। वह अपने अनुसार ही कार्य और बात करना पसंद करता है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का संक्षिप्त परिचय. मेष राशि वा लग्न राशि चक्र की प्रथम राशि है। इसका विस्तार एक अंश से 30 अंश तक है। राशि का चिन्ह ”मेढा’ या भेडा है। इसका स्वामी ’मंगल’ है। मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है। मेष राशि के अन्तर्गत तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी और कृतिका आते हैं। अश्विनी तथा भरणी नक्षत्र के चारों चरण और कॄत्तिका के प्रथम चरण आते हैं। प्रत्येक चरण 3.20′ अंश का होता है। प्रत्येक नक्षत्र के स्वामी क्रमशः केतु, शुक्र तथा सूर्य हैं।

 

काल पुरुष की जन्म कुंडली में सर्वप्रथम मेष राशि का उदय होता है। जातक के जन्म के समय मे जो लग्न आकाश मे उदित होता है तथा चन्द्रमा जिस राशि में होती है उसी के अनुसार जातक का स्वभाव, रंग-रूप, आकार-प्रकार होता है। यही नही लग्न, लग्नेश, चन्द्र लग्न तथा चन्द्र लग्नेश के साथ सूर्य लग्न और सूर्य लग्नेश तथा उस लग्न में स्थित ग्रह से भी जातक के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी मिलती है।

मेष राशि व लग्न मे जन्म लेने वाला जातक सामान्य शरीर वाला, वाचाल, उग्र स्वभाव वाला, रजोगुणी, बुद्धिमान, चतुर, अहंकारी, धर्मात्मा, अल्प संतति वाला, पित्त प्रधान, भोजन प्रिय, कुलदीपक तथा चंचल स्वभाव का होता है। मेष राशि के जातक सामान्यतः धन, वाहन, भाग्य वॄद्धि इत्यादि अनेक प्रकार के सुख भोगता है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का शरीर विचार

मेष लग्न के जातक शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट होते हैं। इनके त्वचा की रंग लालिमा लिए हुए होता है। जातक की गोल आँखे होती है साथ ही नेत्र में चमक भी होती है। मेष लग्न के जातक देखने अपनी उम्र से कम नज़र आते हैं। मेष राशि का सिर और मुख मंडल पर अधिकार है इसलिये इनके मुख से विशेष शक्ति का आभास होता है। इनकी गर्दन लंबी होती है। ऐसा जातक साधारण कद का होता है। इनके भोंहों के बाल बहुत घने होते है। मुख या माथे पर चोट का कोई निशान होता है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का स्वभाव

मेष अग्नि तत्व वाली राशि है। इसका स्वामी मंगल अग्नि और क्षत्रिय जाति का ग्रह है। राशि और स्वामी का संयोग वयक्ति के अंदर की ऊर्जा को बढा देती है इसी कारण मेष राशि का मनुष्य साहसी,दॄढ इच्छाशक्ति से युक्त, ओजस्वी तथा दबंग स्वभाव के होते हैं।

मेष लग्न के जातको में सांसारिक व भौतिक उपलब्धियों के प्रति जीतनी लालसा होती है उतनी ही मौलिक पवित्रता के प्रति भी होती है। मेष लग्न में जन्म लेने वाले व्यक्ति शक्ति एवं वीरता से परिपूर्ण होते है। इनका स्वभाव सृजनात्मकता से भरा होता है ये हमेशा कुछ नया करना चाहते है। इनके स्वभाव में उग्रता और दबंगता दोनों विद्यमान होता है। दुसरो के ऊपर क्रोध और भावुकता एक साथ लेकर आते है। ये शीघ्र ही दूसरों पर प्रसन्न भी हो जाते हैं। दूसरों की मदद करना इनके स्वभाव में होता है यह गुण आपको समाज में सम्मान दिलाता है। स्वभाव से चंचल तो है ही तथा कामुक व सुंदर स्त्रियों के प्रति शीघ्र ही आकर्षित हो जाते हैं।

स्वभाव से भ्रमणशील होते है परन्तु इनके घुटनों में दर्द गृहस्थाश्रम से ही प्रारम्भ हो जाता है। ऐसा जातक अत्यधिक क्रोधी तथा अपना कार्य चतुरता पूर्वक से निकलवाने में निपुण भी होता है। इनमे एक साथ कई कार्य करने की क्षमता होती है। ये किसी भी विषय पर वाद-विवाद करने से घबराते नही हैं। मेष लग्न के जातकों को जल से भय लगता है।

मेष लग्न व राशि के जातक अपने परिश्रम तथा पराक्रम के बल पर जीवन यात्रा में मान-सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।  इस लग्न के जातक साहसी तथा अभिमानी होते हैं।  ये स्वाभिमानी होते है यही कारण है जहां इन्हें  उचित सम्मान नही मिलता है वहां जाना भी पसंद नही करते हैं।  इन्हें अपनी बात मनवाना अच्छा लगता है। इन्हें अनावश्यक दिखावा से परहेज भी नहीं है।

मेष लग्न व राशि के जातक में आत्मविश्वास की कमी नही होती, शरमाना या झिझकना इनका स्वभाव में नही है तथा लंबे समय तक अपनी रुचि को एक ही विषय या वस्तु पर केन्द्रित नही रख पाते हैं । हां यदि कोई अशुभ ग्रह का लग्न तथा लग्नेश के साथ सम्बन्ध बन रहा है तो उपर्युक्त कथन में कमी हो सकती है। ये कभी कभी अपना उदार स्वभाव भी दिखलाते हैं। दूसरों की मदद करने के कारण मेष लग्न के जातक औरों के लिए आदरणीय भी होते हैं। ऐसे जातक विषय-वासनाओं में विशेष रूप से लिप्त होते हैं। हालांकि ये महशुस भी करते है कि जिस काम में अपने समय को नष्ट कर रहे हैं उससे कोई लाभ नही है बल्कि नुकसान ही है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न जातक का पारिवारिक जीवन

मेष लग्न के जातक या तो अपने भाई बहनों में सबसे बड़े या छोटे होते है। पारिवारक जीवन जीवन सामान्यतः सुखमय ही बीतता है। ये हमेशा सामंजस्य बनाकर चलने की कोशिश करते है।  क्रोधित स्वभाव के कारण परिवार में मनमुटाव देखने में आया है। माता-पिता के प्रति पूर्ण स्नेह होता है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का कर्म विचार

ऐसा कहा जा सकता है जीवन यात्रा में धन के कारण आपका कोई काम रुकता नहीं है। आप धन का व्यय बहुत ही सोच समझकर करते है। शुभ कार्य में खर्च करना आप पसंद करते है। यह भी देखा गया है की जन्म स्थान से दूर जाने पर जातक का भाग्योदय की संभावना बढ़ जाती है।

ऐसा जातक सामान्यतः नौकरी करता है। अध्ययन-अध्यापन में इनकी विशेष रूचि होती है अतः अध्यापक के रूप में कार्य करते है। आप वकालत, प्रशासनिक सेवा, इंजीनियरिंग इत्यादि के क्षेत्र में काम कर सकते है। ऐसे लोग नेतागीरी, संगठन कर्ता, उपदेशक, प्रभावी वक्ता, रक्षा क्षेत्र में काम करने वाले, पुलिस अधिकारी, शल्य चिकित्सिक खोजी पत्रकारिता इत्यादि के क्षेत्र में काम करते है।

मेष लग्न का व्यक्ति अपनी इच्छा की पूर्ति करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है परन्तु किंचित आलसी प्रवृति के कारण कार्य पूरा होने में देर हो जाता है। ये अपना काम पूरी ताकत के साथ करना चाहते है। किंतु लंबे समय तक अपने शौक को कायम रखना इनके वश की बात नही होती। इनका खेल से प्रेम होता है और कमोवेश सभी खेल को खेलना पसंद करते है। किसी एक खेल के ऊपर टिक पाना इनके लिए बहुत ही कठिन है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का संक्षिप्त परिचय

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का आध्यात्मिक सोच

आप के अंदर आध्यात्मिक दृष्टि विद्ध्यमान होती है परन्तु आप इसका विशेष रूप से लाभ नहीं ले पाते है। भगवान् के ऊपर आपका विशवास होता है। अपनी बात के धनी एवं शर्त के कट्टर होते हैं।  अपनी आध्यात्मिक सोच के कारण आप किसी झगडे में पड़ना नहीं चाहते हैं परन्तु यदि कोई भी बात इनको पसंद ना आए तो सामने वाले को सबक सिखाये बिना रहते भी नहीं हैं।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न का स्वास्थ्य और रोग

मेष राशि वाले जातकों का स्वास्थ्य सामान्यतः ठीक रहता है। इनके अन्दर रोगों से लडने की क्षमता विद्द्यमान होती है। सामान्यतः इनके सिर में अवश्य चोट लगती है अतः सर में चोट लगने से बचना चाहिए। मेष से षष्ठ भाव कन्या राशि का है, अतः जातक का पाचन प्रणाली कमजोर होता है। खासकर मल के पेट में जमा होने के कारण सिरदर्द, जलन, तीव्र रोगों, सिर की बीमारियां, लकवा, मिर्गी, मुहांसे, अनिद्रा, दाद खाज-खुजली, पेट दर्द, अल्सर इत्यादि की बिमारी होने का खतरा बना रहता है।

Aries Sign and Ascendant | मेष राशि और लग्न के लिए शुभ और अशुभ ग्रह

शुभ ग्रह | Auspicious Planets

मेष लग्न के लिए मंगल, सूर्य तथा गुरु शुभ ग्रह है इसका मुख्य कारण है की ये ग्रह त्रिकोण भाव के स्वामी होते हैं। मंगल अष्टमेश होने से कभी कभी अशुभता भी देता है है। इसी प्रकार गुरु  भी नवम भाव (त्रिकोण) का स्वामी होने से अति शुभ है। परन्तु 12वें भाव के स्वामी जिस घर में स्थित होता है किंचित अशुभता भी प्रदान करता है। ये तीनों ग्रह मेष लग्न के लिए अपनी दशा-महादशा में शुभ फल प्रदान करते हैं। यदि कुंडली में ये ग्रह 6, 8, 12 भाव में या नीच स्थिति में हैं तो इन्हे मंत्र जाप, पूजा, रत्न इत्यादि से बली करना चाहिए।

अशुभ ग्रह | Inauspicious Planets

मेष लग्न के लिए बुध, शुक्र तथा शनि अशुभ ग्रह है। बुध तीसरे और छठे भाव का स्वामी होने से तथा शु्क्र द्वितीय और सप्तम का स्वामी होने से मारकेश होता है अतः अत्यंत ही अशुभ ग्रह होता है। शनि दशम भाव का स्वामी होकर शुभ है परन्तु आय भाव का स्वामी होकर शुभ हो जाता है। उपर्युक्त तीनों ग्रह मेष लग्न के लिए अकारक ग्रह हैं और अपनी दशा-महादशा में नुकसान पहुँचाते हैं। इनकी अशुभता का निवारण मंत्र, दान और पूजा-पाठ से करना चाहिए