वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।’

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।’ ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ यजुर्वेद के नौवें अध्याय की 23वीं कंडिका से लिया गया है। इसका अर्थ है, ‘हम पुरोहित राष्ट्र को सदैव जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे।’ वाज॑स्ये॒मं प्र॑स॒वः सु॑षु॒वेऽग्रे॒ सोम॒ꣳ राजा॑न॒मोष॑धीष्व॒प्सु। ताऽअ॒स्मभ्यं॒ मधु॑मतीर्भवन्तु व॒यꣳ रा॒ष्ट्रे जा॑गृयाम पु॒रोहि॑ताः॒ स्वाहा॑ ॥२३॥ पद पाठ वाज॑स्यः। इ॒मम्। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वः। सु॒षु॒वे। सु॒सु॒व॒ इति सुसुवे। अग्रे॑। सोम॑म्। राजा॑नम्। ओष॑धीषु। अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। ताः। अ॒स्मभ्य॑म्। मधु॑मती॒रिति॒ मधु॑ऽमतीः। भ॒व॒न्तु॒। व॒यम्। रा॒ष्ट्रे। जा॒गृ॒या॒म॒। पु॒रोहि॑ता॒ इति॑ पु॒रःऽहि॑ताः। स्वाहा॑ ॥२३॥ शिष्ट मनुष्यों को योग्य है कि सब विद्याओं को चतुराई, रोगरहित और सुन्दर गुणों में शोभायमान….

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शुभ दीपावली श्री महालक्ष्मी पूजा

शुभ दीपावली श्री महालक्ष्मी पूजा ॐ श्री गं गणपतये नमः गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधिनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम। अहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्।। (यजुर्वेद 23/19) जय श्री महाकाल ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं, वन्दे जगत्कारणम्। वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं, वन्दे पशूनां पतिम्।। वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं, वन्दे मुकुन्दप्रियम्। वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वन्दे शिवंशंकरम्।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ पयः पृथिव्यां पय औषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः ।पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्‌ ॥ विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूनसि विष्णोर्ध्रुवोऽसि । वैष्णवमसि विष्णवे….

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श्री देवी कवचं

जय माँ हो श्री हरसिद्धि देवी सदा प्रसन्न !! ॐ नमश्चण्डिकायै मार्कण्डेय उवाच ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् । यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १॥ ब्रह्मोवाच अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् । देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥ २॥ प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रिति महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५॥ अग्निना दह्यमानास्तु शत्रुमध्यगता रणे । विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥ ६। न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे । नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न….

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गुरु वसिष्ठ

दशरथ के यहां कोई संतान नहीं हो रही थी। निराश होकर, गुरु वसिष्ठ से कहा। गुरु वसिष्ठ के कहने पर  यज्ञ हुआ, तो राम आए। राम जी को प्रकट कराने के अन्य कई कारण हैं, अन्य कई भूमिकाएं हैं, कई लोगों को श्रेय मिलेगा, लेकिन मुख्य श्रेय गुरु वसिष्ठ को मिलेगा। ईश्वर को प्रगट होना है, तो कोई साधारण घटना नहीं होती। राम के रूप में ईश्वर प्रगट हुए, इसका एक कारण वसिष्ठ भी थे। वसिष्ठ के काल में जितनी महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, वे रामराज्य में सहायक बनीं। एक तरह से वे रामराज्य रूपी महल के संबल थे। भरत को….

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अश्विनी नक्षत्र

अश्विनी       नक्षत्रों में सबसे पहला नक्षत्र (जिसमें तीन तारे होते हैं) एक अप्सरा जो बाद में अश्विनी कुमारों की माता मानी जोने लगी सूर्य पत्नी जो कि घोड़ी के रूप में छिपी हुई थी। सूर्य की पत्नी अश्विनी के यमराज पुत्र। जीवन को व्यवस्थित करने के लिए यदि हम अंतरिक्ष का सहारा लेते हैं, ग्रह-नक्षत्रों पर आश्रित होतें हैं तो इसी परा ज्ञान को ज्योतिष विद्या कहते हैं। मानव शरीर दस अवस्थाओं में विभक्त है भ्रूण शिशु किशोर तरूण गृहस्थ प्रवासी भृतक प्रौढ जरठ एवं मुमूर्षु। इन विभिन्न अवस्थाओं से होता हुआ यही शरीर पूर्णता को प्राप्त….

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वशिष्ठ ऋषि और उनकी वंश परंपरा

वसिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। वसिष्ठ एक सप्तर्षि हैं – यानि के उन सात ऋषियों में से एक जिन्हें ईश्वर द्वारा सत्य का ज्ञान एक साथ हुआ था और जिन्होंने मिलकर वेदों का दर्शन किया (वेदों की रचना की ऐसा कहना अनुचित होगा क्योंकि वेद तो अनादि है)। उनकी पत्नी अरुन्धती है। वह योग-वासिष्ठ में राम के गुरु हैं। वसिष्ठ राजा दशरथ के राजकुल गुरु भी थे। आकाश में चमकते सात तारों के समूह में पंक्ति के एक स्थान पर वशिष्ठ को स्थित माना जाता है। दूसरे (दाहिने से) वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती को दिखाया गया है।….

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परमहंस योगानन्द (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952)एक महान आध्यात्मिक गुरू, योगी, संत, लेखक, दिव्यादृष्टा विचारक

Let my soul smile through my heart and my heart smile through my eyes, that I may scatter rich smiles in sad hearts परमहंस योगानन्द (5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952), बीसवीं सदी के एक महान आध्यात्मिक गुरू, योगी, संत, लेखक, दिव्यादृष्टा विचारक थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को क्रिया योग उपदेश दिया तथा पूरे विश्व में उसका प्रचार तथा प्रसार किया। योगानंद के अनुसार क्रिया योग ईश्वर से साक्षात्कार की एक प्रभावी विधि है, जिसके पालन से अपने जीवन को संवारा और ईश्वर की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। योगानन्द प्रथम भारतीय गुरु थे जिन्होने अपने जीवन के….

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सनातन दस महाविद्या पूजा

                                                        ॐ   श्रीं ॐ गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितम् , उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम् ॥ ॐ ब्रह्मानन्द परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं, तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं नित्यं विमलमचलं, सर्वधीसाक्षिभूतं, भावातीतं त्रिगुणरहितं, सद्गुरू तं नमामि॥ अखण्डानन्दबोधाय, शिष्यसंतापहारिणे। सच्चिदानन्दरूपाय, तस्मै श्री गुरवे नमः ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः ॐ आयातु वरदे देवि! त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि। गायत्रिच्छन्दसां….

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भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

वैदिक मंत्रों में सुख्यात तथा सर्वाधिक चर्चित मंत्र श्रीगायत्री मंत्र है जिसके मंत्रद्रष्टा ॠषि विश्वामित्र बताये जाते हैं । मान्यता है कि वैदिक मंत्रों का अंतर्ज्ञान अलग-अलग ॠषियों को समय के साथ होता रहा और कालांतर में मुनि व्यास ने उन्हें तीन वेदों के रूप में संकलित एवं लिपिबद्ध किया । उक्त मंत्र 24 मात्राओं के गायत्री छन्द में निबद्ध है और शायद इसीलिए इसे गायत्री मंत्र नाम दिया गया है । यह एक रोचक तथ्य है कि श्रीगायत्री मंत्र का उल्लेख तीनों प्रमुख वेदों में है और इस प्रकार लिपिबद्ध किया गया है- तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो….

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महर्षि दयानन्द के शब्दों में – मूर्ति-पूजा वैसे है । जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।

न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस: ।                          – ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3 ) उस ईश्वर की कोई मूर्ति अर्थात् – प्रतिमा नहीं जिसका महान यश है । * वेनस्त पश्यम् निहितम् गुहायाम ।                             – ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 8 ) विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है । * अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते ।   ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता: ।।                            – ( यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 ) अर्थ – जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं ।….

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