तत्वमसि

वेद में कई महावाक्य हैं नेति नेति (यह भी नही, यह भी नहीं) अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) अयम् आत्मा ब्रह्म (यह आत्मा ब्रह्म है) यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे (जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड में है) वेद की  व्याख्या इन महावाक्यों से होती है। उपनिषद उद्घोष करते हैं कि मनुष्य देह, इंद्रिय और मन का संघटन मात्र नहीं है, बल्कि वह सुख-दुख, जन्म-मरण से परे दिव्यस्वरूप है, आत्मस्वरूप है। आत्मभाव से मनुष्य जगत का द्रष्टा भी है और दृश्य भी। जहां-जहां ईश्वर की सृष्टि का आलोक व विस्तार है, वहीं-वहीं उसकी पहुंच है। वह परमात्मा का अंशीभूत आत्मा है।….

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​बाहुबली the conclusion

निर्देशक राजामौली  ने भारतीय संस्कृति इतिहास का गहन अध्ययन व उपयोग कर   फिल्म नहीं, इतिहास बनाया है। बाहुबली भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे भव्यतम आकर्षक फिल्म हे। तीन घंटे में  300 बार रोंगटे खड़े हो जाएं,   फिल्म देखते समय तीन सेकेण्ड के लिए भी परदे से आँख नही हटा सकते। गत वर्षो के सबसे चर्चित प्रश्न “कंटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा” का उत्तर देने  आयी फिल्म  प्रारम्भ से ही संस्कृति और चेतना के सजीव केनवास में बांध देती है, रोचकता इतनी कि पल भर के लिए भी परदे से नजर नही हटा पाते। नायक के रणकौशल प्रदर्शन से….

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आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता, ब्रह्म और जीव मूलतः और तत्वतः एक हैं

आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उनके विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारत में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया….

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वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहते हैं, पौराणिक ग्रंथों मान्यताओ के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं,उनका अक्षय फल मिलता है,इसे अत्यंत स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना जाता हे

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की यह  तिथि अत्यंत स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है। अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी….

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अष्ट चिरंजीवी

सनातन हिंदू संस्कृति के इतिहास और पुराण अनुसार ऐसे आठ महामानव या देवता हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। यह परामनोविज्ञान जैसा है, जो परामनोविज्ञान और टेलीपैथी विद्या जैसी आज के आधुनिक साइंस की विद्या को जानते हैं वही इस पर विश्वास कर सकते हैं।  अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान,….

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शिव ही प्रकृति हे, प्रकृति ही शिव, वह ही लय प्रलय हे, वही आदि सृजन और अनंत हे, वह रूद्र महादेव महेश हे,अमरनाथ केदारेश्वर विश्वनाथ सोमनाथ हे, केलाश मैकाल और ओंकार भी वही हे, वह ही कालो का भी काल, महाकाल हे!

भगवान शिव वन्दे देव उमापतिम सुरगुरुं वन्दे जगत् कारणं,वन्दे पन्नग भूषणं मृग्धरम वन्दे पशूनाम्पतिम ! वन्दे सूर्य शशांक वहिनयनम वन्दे मुकुंदप्रियम,वन्दे भक्त जनाश्रयम च वरदम वन्दे शिवम् शंकरं !! शिव अर्थात शुभ और कल्याणकारी , तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु अर्थात हमारा मन शुभ और कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो कि प्रार्थना शास्त्र करता हे, भवानि शङ्करौ वन्दे श्रध्दा विश्वास रूपिणौ | याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् || ‘भवानीशंकरौ वंदे’ भवानी और शंकर की हम वंदना करते है। ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ अर्थात श्रद्धा का नाम पार्वती और विश्वास का शंकर। श्रद्धा और विश्वास- का प्रतीक विग्रह मूर्ति हम मंदिरों में….

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शुभ् हनुमान् जन्मोत्सव, मनोजवं मारूततुल्य वेगं, जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं, वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपध्दे:

शुभ् हनुमान् जयंती जन्मोत्सव 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 श्री हनुमान मूल मंत्र: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रं ह्रैं ह्रौं ह्रः॥ || मनोजवं मारूततुल्य वेगं, जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं, वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपध्दे: || 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 द्वादशाक्षर हनुमान मंत्र: हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्। फल: से इस मंत्र के बारे शास्त्रो में वर्णित हैं की यह मंत्र स्वतंत शिवजी ने श्रीकृष्ण को बताया और श्रीकृष्ण नें यह मंत्र अर्जुन को सिद्ध करवाया था जिसे अर्जुन ने चर-अचर जगत् को जीत लिया था। प्रेत बाधा दूर करे चमत्कारी हनुमान मंत्र:= हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार हनुमानजी का नाम लेने से भूत-प्रेत आदि सभी बाधाएं दूर हो….

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यज्ञ, योग की विधि है जो परमात्मा द्वारा ही हृदय में सम्पन्न होती है। जीव के अपने सत्य परिचय जो परमात्मा का अभिन्न ज्ञान और अनुभव है, यज्ञ की पूर्णता है

यज्ञ, योग की विधि है जो परमात्मा द्वारा ही हृदय में सम्पन्न होती है। जीव के अपने सत्य परिचय जो परमात्मा का अभिन्न ज्ञान और अनुभव है, यज्ञ की पूर्णता है। यह शुद्ध होने की क्रिया है। इसका संबंध अग्नि से प्रतीक रूप में किया जाता है। यज्ञ का अर्थ जबकि योग है किन्तु इसकी शिक्षा व्यवस्था में अग्नि और घी के प्रतीकात्मक प्रयोग में पारंपरिक रूचि का कारण अग्नि के भोजन बनाने में, या आयुर्वेद और औषधीय विज्ञान द्वारा वायु शोधन इस अग्नि से होने वाले धुओं के गुण को यज्ञ समझ इस ‘यज्ञ’ शब्द के प्रचार प्रसार में….

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महाकाल स्त्रोतम

ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पत महाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुते महाकाल महादेव महाकाल महा प्रभो महाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुते महाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहन महाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुते भवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमः रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते सोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुते यजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमः सर्व….

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स्वस्तिक मंत्र या स्वस्ति मन्त्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। स्वस्ति = सु + अस्ति = कल्याण हो। 

पुरातन वैदिक सनातन संस्कृति का परम मंगलकारी प्रतीक चिह्न ‘स्वस्तिक’ अपने आप में विलक्षण है। यह देवताओं की शक्ति और मनुष्य की मंगलमय कामनाएँ इन दोनों के संयुक्त सामर्थ्य का प्रतीक है। स्वस्तिक का अर्थ सामान्यतय: स्वस्तिक शब्द को “सु” एवं “अस्ति” का मिश्रण योग माना जाता है। यहाँ “सु” का अर्थ है- ‘शुभ’ और “अस्ति” का ‘होना’। संस्कृत व्याकरण के अनुसार “सु” एवं “अस्ति” को जब संयुक्त किया जाता है तो जो नया शब्द बनता है- वो है “स्वस्ति” अर्थात “शुभ हो”, “कल्याण हो”। स्वस्ति मंत्र ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा । स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु ॥ अन्य जानकारी भारतीय….

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